इंस्टाग्राम से टेलीग्राम तक बाल यौन शोषण का कंटेंट का विस्तार
संदर्भ
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग यानी एनएचआरसी ने इंस्टाग्राम पर चलाए गए ऐसे पेड विज्ञापनों के मामले में इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय यानी एमईआईटीवाई, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय यानी एमआईबी और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है, जिनके जरिए कथित तौर पर यूजर्स को ऐसे टेलीग्राम चैनलों तक पहुंचाया गया, जहां बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री यानी सीएसएएम उपलब्ध थी।
आयोग ने संबंधित पक्षों से दो सप्ताह के भीतर एक्शन टेकन रिपोर्ट (एटीआर) मांगी है। इस मामले में एक अहम सवाल यह है कि कथित विज्ञापन मेटा की समीक्षा व्यवस्था से गुजरकर प्लेटफॉर्म पर कैसे बने रहे और कंपनी का ध्यान इस ओर दिलाए जाने के बाद ही उन्हें क्यों हटाया गया।
यह मामला भारत में ऑनलाइन बाल यौन शोषण से जुड़े मामलों की एक बड़ी समस्या को भी सामने लाता है। देश में इस तरह के अपराधों से जुड़े बड़ी संख्या में अलर्ट मिलते हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम मामले एफआईआर, जांच और अभियोजन तक पहुंच पाते हैं।
पॉक्सो के तहत रिपोर्टिंग पर सवाल
एनएचआरसी के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवालों में से एक पॉक्सो एक्ट, 2012 के तहत अनिवार्य रिपोर्टिंग से जुड़ा है। पॉक्सो की धारा 19 के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को आशंका हो कि बच्चे के खिलाफ यौन अपराध होने वाला है या उसे जानकारी हो कि ऐसा अपराध हो चुका है, तो इसकी सूचना विशेष किशोर पुलिस इकाई या स्थानीय पुलिस को देना जरूरी है।
एनएचआरसी ने मेटा से पूछा है कि क्या कथित अपराधों की जानकारी पुलिस या संबंधित अधिकारियों को दी गई थी। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो आयोग यह भी जानना चाहता है कि रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी किस अधिकारी या व्यक्ति की थी।
आयोग का संकेत स्पष्ट है कि कानूनी रिपोर्टिंग दायित्व को केवल कंपनी की आंतरिक शिकायत व्यवस्था, पत्राचार या सरकारी एजेंसियों के साथ बातचीत के जरिए पूरा नहीं माना जा सकता।
क्या एआई प्लेटफॉर्म की कानूनी भूमिका बदल रही है?
इस मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू एआई आधारित प्लेटफॉर्म की कानूनी स्थिति है। एनएचआरसी के समक्ष रखी गई दलील में कहा गया कि मेटा के एआई टूल केवल यूजर की सामग्री को होस्ट नहीं करते, बल्कि कैप्शन बनाने, पोस्ट का समय सुझाने, यूजर एंगेजमेंट बढ़ाने और कंटेंट के मॉनेटाइजेशन में भी भूमिका निभाते हैं।
ऐसे में सवाल है कि जो प्लेटफॉर्म कंटेंट को चुनने, सुझाने, बढ़ावा देने और ज्यादा लोगों तक पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभाता है, क्या उसे अभी भी महज इंटरमीडियरी यानी मध्यस्थ माना जाना चाहिए?
एनएचआरसी ने इसे महत्वपूर्ण नियामकीय सवाल माना है और एमआईबी से इस पहलू की जांच करने को कहा है। बहस मूलतः इस बात पर है कि मौजूदा कानून केवल तीसरे पक्ष की सामग्री को होस्ट करने वाले प्लेटफॉर्म और सामग्री को सक्रिय रूप से क्यूरेट तथा प्रसारित करने वाले प्लेटफॉर्म के बीच पर्याप्त अंतर करता है या नहीं।
साइबरटिपलाइन से एफआईआर तक लंबा रास्ता
ऑनलाइन बाल यौन शोषण के मामलों में साइबरटिपलाइन एक महत्वपूर्ण सूचना स्रोत है। 2025 में भारत से संबंधित करीब 19 लाख साइबरटिपलाइन रिपोर्ट सामने आईं। ये रिपोर्ट तब बनती हैं जब तकनीकी कंपनियों को बच्चों के यौन शोषण या शोषण संबंधी सामग्री यानी सीएसईएएम का संदेह होता है।
तकनीकी कंपनियां ऐसी जानकारी अमेरिका स्थित नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एंड एक्सप्लॉइटेड चिल्ड्रेन (एनसीएमईसी) को भेजती हैं, जो साइबरटिपलाइन संचालित करता है। भारत से जुड़ी रिपोर्ट आगे भारतीय अधिकारियों तक पहुंचती हैं। एनसीआरबी और आई4सी इन सूचनाओं को संसाधित कर संबंधित राज्यों और जिलों तक भेजते हैं।
दिल्ली में आईएफएसओ इकाई रिपोर्ट का सत्यापन कर संबंधित जिले और पुलिस थाने तक सूचना पहुंचाती है। लेकिन साइबरटिपलाइन रिपोर्ट का मतलब तत्काल एफआईआर नहीं होता। पुलिस पहले खाते की जानकारी, आईपी लॉग, ईमेल, फोन नंबर, अकाउंट रिकॉर्ड और डिजिटल हैश वैल्यू जैसे साक्ष्यों की जांच करती है। हैश किसी डिजिटल फाइल के फिंगरप्रिंट की तरह होता है, जिससे समान सामग्री की पहचान में मदद मिलती है।
हर रिपोर्ट कार्रवाई तक क्यों नहीं पहुंचती?
रिपोर्टों की गुणवत्ता अलग-अलग होती है। कुछ मामलों में कार्रवाई के लिए पर्याप्त जानकारी होती है, जबकि कई मामलों में अतिरिक्त सत्यापन की जरूरत पड़ती है। पीड़ित की उम्र की पुष्टि भी बड़ी चुनौती है। खराब गुणवत्ता या धुंधली तस्वीरों में यह तय करना मुश्किल हो सकता है कि संबंधित व्यक्ति नाबालिग है या नहीं।
क्राइम इन इंडिया 2024 के आंकड़ों के अनुसार, आईटी एक्ट के तहत बच्चों के खिलाफ साइबर अपराध से जुड़े 1,238 मामले दर्ज हुए। इनमें 1,099 मामले बच्चों को दर्शाने वाली यौन रूप से स्पष्ट सामग्री के प्रकाशन या प्रसारण से संबंधित थे।
एफआईआर के बाद पुलिस संदिग्ध की पहचान के लिए सब्सक्राइबर जानकारी, आईपी एड्रेस और इंटरनेट सेवा प्रदाता से संबंधित रिकॉर्ड हासिल करती है। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की फोरेंसिक जांच भी की जाती है। डिजिटल साक्ष्यों की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए चेन ऑफ कस्टडी और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 63 के तहत आवश्यक प्रमाणन महत्वपूर्ण होता है।
बदलती तकनीक, बढ़ती चुनौती
साइबरटिपलाइन रिपोर्ट आम तौर पर यह बताती है कि संदिग्ध सामग्री कहां मिली, लेकिन यह जरूरी नहीं कि वह मूल रूप से कहां बनाई या अपलोड की गई। इसके लिए अलग जांच करनी पड़ती है। कई स्तरों से गुजरने वाली रिपोर्टिंग व्यवस्था भी कार्रवाई में देरी का कारण बन सकती है।
इसके अलावा अपराधी अब एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म और एआई से तैयार सामग्री का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में केवल पारंपरिक हैश मैचिंग जैसी तकनीकों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है।
एनएचआरसी की जांच ने दो बड़ी जरूरतों को सामने रखा है - पॉक्सो के तहत अनिवार्य रिपोर्टिंग को प्रभावी बनाना और एआई-संचालित प्लेटफॉर्म की कानूनी जवाबदेही स्पष्ट करना।
ऑनलाइन बाल सुरक्षा के लिए केवल ज्यादा अलर्ट हासिल करना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरी है कि विश्वसनीय सूचना तेजी से सही जांच एजेंसी तक पहुंचे, प्लेटफॉर्म अपनी कानूनी जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से निभाएं और कानून प्रवर्तन एजेंसियां बदलती तकनीक के अनुरूप लगातार अपनी क्षमता विकसित करें। यही डिजिटल दुनिया में बच्चों को सुरक्षित रखने की दिशा में सबसे जरूरी कदम होंगे।