समावेशी विकास के माध्यम से भारत की सीमाओं का सुदृढ़ीकरण
संदर्भ
भारत सात पड़ोसी देशों के साथ 15,000 किलोमीटर से अधिक लंबी अंतरराष्ट्रीय स्थलीय सीमा साझा करता है। इसमें बांग्लादेश के साथ 4,096.7 किलोमीटर, चीन के साथ 3,488 किलोमीटर और पाकिस्तान के साथ 3,323 किलोमीटर की सीमा शामिल है। इसके अलावा नेपाल, म्यांमार, भूटान और अफगानिस्तान के साथ भी भारत की स्थलीय सीमाएं हैं। दशकों तक सीमावर्ती क्षेत्रों के अनेक गांव दुर्गम भूभाग, कमजोर संपर्क व्यवस्था, सीमित बुनियादी ढांचे और रोजगार के कम अवसरों के कारण मुख्यधारा से दूर रहे। इसका असर जनसंख्या पर भी पड़ा और कई इलाकों से पलायन बढ़ा।
इन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार ने वाइब्रेंट विलेजेस प्रोग्राम (वीवीपी) शुरू किया। वर्ष 2023 में शुरू किए गए इस कार्यक्रम का उद्देश्य सीमावर्ती गांवों का समग्र विकास कर उन्हें देश के ‘अंतिम गांव’ के बजाय ‘पहले गांव’ के रूप में विकसित करना है। सरकार का मानना है कि सशक्त और समृद्ध सीमावर्ती समुदाय देश की सुरक्षा की महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
सीमावर्ती ग्रामीणों की भूमिका
सीमावर्ती समुदायों के महत्व का एक ऐतिहासिक उदाहरण 1999 का करगिल संघर्ष है। 3 मई 1999 को स्थानीय निवासियों ने करगिल क्षेत्र में संदिग्ध गतिविधियों की पहली सूचना दी थी। यह घटना बताती है कि सीमावर्ती आबादी सुरक्षा व्यवस्था के लिए कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। इसी सोच के साथ वीवीपी का लक्ष्य सीमावर्ती गांवों में विकास के साथ-साथ सुरक्षा और सामुदायिक भागीदारी को मजबूत करना है।
दो चरणों में पूरे स्थलीय सीमा क्षेत्र पर फोकस
सरकार वीवीपी को दो चरणों में लागू कर रही है। वीवीपी-1 उत्तरी सीमा के गांवों पर केंद्रित है, जबकि वीवीपी-2 को देश की अन्य अंतरराष्ट्रीय स्थलीय सीमाओं तक विस्तारित किया गया है। दोनों चरणों के तहत कुल 2,616 से अधिक गांवों को शामिल करने का लक्ष्य है, जिसके लिए संयुक्त रूप से 11,639 करोड़ रुपये का परिव्यय निर्धारित किया गया है।
वीवीपी-1 केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसे राज्यों के सहयोग से लागू किया जा रहा है। वहीं वीवीपी-2 पूरी तरह केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित केंद्रीय क्षेत्र की योजना है। दोनों का मूल उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में बेहतर जीवन स्थितियां, स्थानीय रोजगार और आजीविका के अवसर तथा मजबूत सामुदायिक ढांचा तैयार करना है।
वीवीपी-1 से उत्तरी सीमाओं में विकास की शुरुआत
वीवीपी के पहले चरण की घोषणा केंद्रीय बजट 2022-23 में की गई थी और इसे 10 अप्रैल 2023 को अरुणाचल प्रदेश के अंजाव जिले के किबिथू में शुरू किया गया। इसके तहत अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, उत्तराखंड और लद्दाख के 19 जिलों में उत्तरी सीमा से लगे 46 ब्लॉकों के गांवों की पहचान की गई। इनमें करीब 1.42 लाख की आबादी वाले 662 रणनीतिक गांवों को व्यापक विकास के लिए प्राथमिकता दी गई।
वीवीपी-1 के लिए 4,800 करोड़ रुपये का परिव्यय रखा गया है, जो वित्त वर्ष 2022-23 से 2026-27 तक लागू है। इसमें 2,500 करोड़ रुपये सड़क संपर्क के लिए निर्धारित किए गए हैं।
किबिथू को कार्यक्रम के शुभारंभ के लिए चुनना भी प्रतीकात्मक था। यह अरुणाचल प्रदेश के अंजाव जिले में स्थित भारत के पूर्वी छोर के महत्वपूर्ण बसे हुए गांवों में से एक है और 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान यहां भीषण संघर्ष हुआ था।
सड़क, इंटरनेट से लेकर पर्यटन और रोजगार तक
वीवीपी-1 के तहत सभी मौसम में उपयोगी सड़कों, पेयजल, बिजली, मोबाइल एवं इंटरनेट कनेक्टिविटी तथा स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं के विकास पर जोर दिया जा रहा है। पर्यटन सुविधाओं और बहुउद्देशीय सामुदायिक केंद्रों के जरिए स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देने का प्रयास भी किया जा रहा है।
आजीविका के लिए ‘हब एंड स्पोक’ मॉडल के तहत सामाजिक उद्यमिता, युवाओं और महिलाओं का सशक्तीकरण, स्थानीय संस्कृति एवं पर्यटन को बढ़ावा तथा ‘एक ब्लॉक-एक उत्पाद’ जैसी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
वीवीपी-2 से पूरे सीमा क्षेत्र तक विस्तार
2 अप्रैल 2025 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वीवीपी-2 को मंजूरी दी। इसे 20 फरवरी 2026 को असम के कछार जिले के नाथनपुर गांव से औपचारिक रूप से शुरू किया गया। इसके लिए वित्त वर्ष 2028-29 तक 6,839 करोड़ रुपये का प्रावधान है।
वीवीपी-2 के तहत 15 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों के अंतरराष्ट्रीय स्थलीय सीमाओं से लगे 334 ब्लॉकों में 1,954 गांवों को चिन्हित किया गया है। उत्तरी सीमा के वे ब्लॉक, जो पहले से वीवीपी-1 में शामिल हैं, दोहराव से बचने के लिए वीवीपी-2 से बाहर रखे गए हैं।
इस चरण में सड़क संपर्क, स्वास्थ्य सेवाएं, वित्तीय समावेशन, कौशल विकास और दूरसंचार के साथ स्मार्ट कक्षाओं, पर्यटन सर्किट, सहकारी समितियों और स्वयं सहायता समूहों के जरिए सतत आजीविका को बढ़ावा दिया जा रहा है।
जुलाई 2026 तक 1,248 परियोजनाओं को मंजूरी
वीवीपी-1 के तहत जुलाई 2026 तक गृह मंत्रालय ने 3,020.32 करोड़ रुपये के परिव्यय वाली 1,248 परियोजनाओं को मंजूरी दी है। इसके अलावा केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों ने 1,655 अतिरिक्त परियोजनाओं को मंजूरी दी है। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 953.47 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं और 283 परियोजनाओं के पूरा होने की सूचना दी गई है।
राज्यवार देखें तो अरुणाचल प्रदेश में 832, उत्तराखंड में 152, हिमाचल प्रदेश में 98, सिक्किम में 87 और लद्दाख में 79 परियोजनाएं मंजूर हुई हैं।
सड़क संपर्क और पर्यटन पर विशेष जोर
कुल 2,481.93 करोड़ रुपये के परिव्यय वाली 111 सड़क परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इनसे ऐसे 134 गांवों को सड़क संपर्क मिलेगा, जहां पहले सड़क सुविधा नहीं थी। इसके साथ 35 लंबी दूरी वाले पुलों को भी मंजूरी दी गई है।
पर्यटन को रोजगार के नए स्रोत के रूप में विकसित करने के लिए 145 करोड़ रुपये की 327 पर्यटन परियोजनाएं मंजूर की गई हैं। इनमें व्यूप्वाइंट, साहसिक पर्यटन, पर्यावरण पर्यटन, इको-रिसॉर्ट, ट्रेक मार्ग और पर्यटक केंद्र शामिल हैं।
विकास के साथ सुरक्षा और पलायन पर भी असर
31 जुलाई 2026 तक वीवीपी-1 के तहत 8,800 से अधिक गतिविधियां आयोजित की गईं। इनमें जागरूकता अभियान, सेवा वितरण शिविर, स्वास्थ्य एवं पशु चिकित्सा शिविर और कौशल प्रशिक्षण शामिल हैं।
कार्यक्रम का असर केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं है। बेहतर सड़क, रोजगार, पर्यटन और सरकारी योजनाओं की पहुंच से सीमावर्ती गांवों में लोगों के रहने की संभावनाएं बढ़ रही हैं। अरुणाचल प्रदेश के कुरुंग कुमे, दिबांग घाटी और शी-योमी जैसे जिलों के कुछ सीमावर्ती गांवों में लोगों के वापस लौटने की प्रवृत्ति को इसी बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
स्थानीय सहकारी समितियां, स्वयं सहायता समूह और किसान उत्पादक संगठन आय के नए स्रोत तैयार कर रहे हैं। वहीं सीमा सुरक्षा बलों द्वारा स्थानीय स्तर पर दूध, सब्जियां, अंडे और अनाज की खरीद गांवों के लिए एक भरोसेमंद बाजार भी तैयार कर रही है।
‘अंतिम गांव’ नहीं, ‘पहले गांव’
वाइब्रेंट विलेजेस प्रोग्राम का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भारत के सीमावर्ती गांव केवल भौगोलिक सीमा पर स्थित बस्तियां नहीं हैं, बल्कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास और सामाजिक स्थिरता के महत्वपूर्ण केंद्र हैं।
बेहतर संपर्क, मजबूत बुनियादी ढांचा, स्थानीय रोजगार, पर्यटन और सरकारी योजनाओं का एकीकृत लाभ सीमावर्ती आबादी को अपने गांवों में रहने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। इससे पलायन पर अंकुश लगाने के साथ सीमा सुरक्षा को भी मजबूती मिलती है।
इस दृष्टि से वीवीपी विकास और सुरक्षा को एक-दूसरे का पूरक बनाता है। जीवंत, आत्मनिर्भर और सशक्त सीमावर्ती गांव न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देंगे, बल्कि 2047 तक सुरक्षित, समावेशी और विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।