चर्चा में क्यों ?
- सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने (बैंगलोर जल आपूर्ति एवं सीवरेज ... बनाम आर. राजप्पा एवं अन्य Bangalore Water Supply & Sewerage Board v. R. Rajappa (1978) मामले में दी गई “उद्योग” (Industry) की व्यापक व्याख्या में संशोधन किया है।
- कोर्ट ने कहा कि संशोधित व्याख्या भविष्य में दर्ज होने वाले नए मामलों पर लागू होगी। यह औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के तहत आने वाले मामलों के लिए प्रासंगिक होगी।
- यह फैसला लंबित या पहले से तय मामलों पर लागू नहीं होगा, जो निरस्त हो चुके औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत थे।

पृष्ठभूमि
- वर्ष 1978 में Bangalore Water Supply मामले में सात-न्यायाधीशों की पीठ ने “उद्योग” शब्द की व्यापक और श्रमिक-पक्षीय व्याख्या की थी।
- इस फैसले के अनुसार, गैर-लाभकारी गतिविधियों में शामिल संगठन भी “उद्योग” की श्रेणी में आ सकते थे, यदि वे निर्धारित “त्रि-परीक्षण (Triple Test)” को पूरा करते हों।
- समय के साथ न्यायालयों के अलग-अलग फैसलों के कारण यह प्रश्न उठा कि क्या सरकारी कल्याणकारी विभागों और धर्मार्थ गतिविधियों को भी “उद्योग” माना जाना चाहिए।
- वर्ष 2005 में पाँच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इस मुद्दे को बड़ी पीठ के पास भेजा। इसके बाद 2017 में इसे नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेजा गया।
1978 का “त्रि-परीक्षण” क्या था?
बैंगलोर वाटर सप्लाइ (Bangalore Water Supply) फैसले के अनुसार, किसी गतिविधि को “उद्योग” मानने के लिए मुख्यतः निम्न शर्तें देखी जाती थीं:
- व्यवस्थित और संगठित गतिविधि का संचालन;
- गतिविधि में नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच सहयोग; तथा
- वस्तुओं या सेवाओं के उत्पादन अथवा वितरण से संबंधित गतिविधि।
इस व्यापक व्याख्या के तहत किसी संगठन को “उद्योग” मानने के लिए लाभ कमाना आवश्यक नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट का नवीनतम फैसला
नौ-न्यायाधीशों की पीठ ने 5:4 के बहुमत से फैसला सुनाया।
प्रमुख निर्णय
- सुप्रीम कोर्ट ने 1978 के त्रि-परीक्षण के मूल ढाँचे को बरकरार रखा। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि इसके कुछ पहलुओं और संबंधित दिशानिर्देशों में और अधिक स्पष्टता एवं संशोधन की आवश्यकता है।
- त्रि-परीक्षण के अंधाधुंध प्रयोग से “उद्योग” की परिभाषा का अनावश्यक विस्तार नहीं होना चाहिए।
- कोर्ट ने वास्तविक औद्योगिक गतिविधियों और कुछ सरकारी कल्याणकारी एवं धर्मार्थ कार्यों के बीच अंतर करने की आवश्यकता को स्वीकार किया।
- यह फैसला भविष्य में लागू होगा।
- यह औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत लंबित या पहले से तय मामलों पर लागू नहीं होगा।
- कोर्ट ने औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 में “उद्योग” की नई वैधानिक परिभाषा की व्याख्या नहीं की।
केंद्र सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि 1978 के फैसले की व्यापक व्याख्या के कारण “उद्योग” की परिभाषा का अत्यधिक विस्तार हो गया था।
केंद्र के अनुसार:-
- राज्य द्वारा संचालित कल्याणकारी गतिविधियों को स्वतः “उद्योग” नहीं माना जाना चाहिए।
- धर्मार्थ और सार्वजनिक कल्याणकारी कार्यों को अलग कानूनी दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।
- त्रि-परीक्षण के अत्यधिक व्यापक प्रयोग से कई ऐसी गतिविधियाँ भी श्रम कानूनों के दायरे में आ सकती हैं, जिन्हें वास्तव में औद्योगिक गतिविधि नहीं माना जाना चाहिए।
अटॉर्नी जनरल ने तर्क दिया कि त्रि-परीक्षण तार्किक रूप से उचित था, लेकिन इसके अंधाधुंध प्रयोग से “उद्योग” की परिभाषा का अनावश्यक विस्तार हुआ।
विवाद की समयरेखा
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वर्ष
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प्रमुख घटनाक्रम
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1978
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सात-न्यायाधीशों की पीठ ने Bangalore Water Supply मामले में “उद्योग” की व्यापक परिभाषा दी।
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1996
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तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने सोशल फॉरेस्ट्री विभाग को “उद्योग” की परिभाषा के अंतर्गत माना।
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2001
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एक अन्य पीठ ने अलग दृष्टिकोण अपनाया, जिससे दोनों फैसलों के बीच स्पष्ट मतभेद सामने आया।
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2005
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पाँच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने मामले को बड़ी पीठ के पास भेजा।
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2017
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सात-न्यायाधीशों की पीठ ने मामले को व्यापक प्रभावों को देखते हुए नौ-न्यायाधीशों की पीठ के पास भेजा।
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2026
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नौ-न्यायाधीशों की पीठ ने 5:4 के बहुमत से 1978 की व्याख्या में संशोधन किया।
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औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 क्या है?
औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 भारत की चार समेकित श्रम संहिताओं में से एक है। इसका उद्देश्य निम्न क्षेत्रों से संबंधित कानूनों को समेकित और सुव्यवस्थित करना है:
- ट्रेड यूनियन;
- औद्योगिक प्रतिष्ठानों में रोजगार की शर्तें;
- औद्योगिक विवादों की जांच एवं समाधान।
यह निम्न तीन कानूनों को समेकित करता है:
- ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926
- औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946
- औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947
फैसले का महत्व
- श्रम कानूनों के दायरे को स्पष्ट करता है :-यह फैसला “उद्योग” की अत्यधिक व्यापक व्याख्या को सीमित करने का प्रयास करता है, जिसके कारण लगभग हर संगठित कर्मचारी गतिविधि इसके दायरे में आ सकती थी।
- श्रमिक-पक्षीय ढाँचे को बरकरार रखता है :-सुप्रीम कोर्ट ने 1978 के त्रि-परीक्षण को पूरी तरह समाप्त नहीं किया, बल्कि उसके अनुप्रयोग को अधिक स्पष्ट किया है।
- सरकारी गतिविधियों के संबंध में स्पष्टता :-यह फैसला यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण है कि सरकार द्वारा संचालित कल्याणकारी, धर्मार्थ और संप्रभु कार्यों को औद्योगिक विवाद तंत्र के अंतर्गत किस सीमा तक लाया जा सकता है।
- भविष्य में लागू होने से कानूनी स्थिरता :-फैसले को भविष्य में लागू करने से पहले से तय विवादों को दोबारा खोलने और लंबित मामलों में अनिश्चितता पैदा होने से बचाया गया है।
- श्रम कानून सुधारों के लिए महत्वपूर्ण :-यह फैसला औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 से औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की ओर बढ़ते भारत के श्रम कानून सुधारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
UPSC प्रारंभिक परीक्षा MCQ
प्रश्न 1. “उद्योग” शब्द की सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई व्याख्या के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- वर्ष 1978 का Bangalore Water Supply & Sewerage Board v. R. Rajappa मामला सात-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दिया गया था।
- इस फैसले में कहा गया था कि किसी गतिविधि को “उद्योग” के रूप में वर्गीकृत करने के लिए लाभ कमाने का उद्देश्य आवश्यक है।
- इस फैसले में यह निर्धारित करने के लिए “त्रि-परीक्षण (Triple Test)” विकसित किया गया कि कोई गतिविधि “उद्योग” के अंतर्गत आती है या नहीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
A. केवल 1 और 3 B. केवल 2 और 3 C. केवल 1 और 2 D. 1, 2 और 3
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FAQs: Supreme Court Modifies ‘Industry’ Definition
Q1. सुप्रीम कोर्ट ने ‘उद्योग’ की परिभाषा से संबंधित किस महत्वपूर्ण फैसले में संशोधन किया है?
उत्तर: सुप्रीम कोर्ट ने 1978 के Bangalore Water Supply & Sewerage Board v. R. Rajappa फैसले में दी गई “उद्योग” की व्यापक व्याख्या को संशोधित किया है।
Q2. 1978 के Bangalore Water Supply मामले की प्रमुख विशेषता क्या थी?
उत्तर: सात-न्यायाधीशों की पीठ ने “उद्योग” की व्यापक और श्रमिक-पक्षीय व्याख्या की थी तथा लाभ कमाने की मंशा को आवश्यक शर्त नहीं माना था।
Q3. 1978 के फैसले का ‘Triple Test’ क्या है?
उत्तर: किसी गतिविधि को उद्योग मानने के लिए तीन प्रमुख आधार थे—
- व्यवस्थित एवं संगठित गतिविधि,
- नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच सहयोग, तथा
- वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन अथवा वितरण।
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