New
Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 6th July 2026, 6:00 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 5th July 2026, 8:00 AM English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 20th July 2026 English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 15th July 2026, 8:00 AM Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 6th July 2026, 6:00 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 5th July 2026, 8:00 AM English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 20th July 2026 English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 15th July 2026, 8:00 AM

तीजन बाई

चर्चा में क्यों ? 

  • छत्तीसगढ़ की प्राचीन लोककला पंडवानी, जिसमें महाभारत की कथा का संगीतमय प्रस्तुतीकरण किया जाता है, को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली प्रसिद्ध लोक कलाकार तीजन बाई का रविवार, 5 जुलाई 2026 को रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईए) में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। लोक कलाकार तीजन बाई 70 वर्ष की थीं। 
  • तीजन बाई ने उस समय सामाजिक परंपराओं को चुनौती दी, जब पंडवानी का मंचन मुख्यतः पुरुष कलाकारों तक सीमित माना जाता था। उन्होंने अपनी दमदार गायकी और प्रभावशाली प्रस्तुति के माध्यम से इस लोककला को देश-विदेश के मंचों तक पहुंचाया। भारतीय लोक संस्कृति में उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण और देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

तीजन बाई के बारे में

  • तीजन बाई छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोककला पंडवानी की प्रख्यात कलाकार थीं। 
  • उनका जन्म 24 अप्रैल 1956 को छत्तीसगढ़ के गनियारी (गनियारी/गनियारी) गांव में हुआ था। 
  • वे अपने पाँच भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं। 
  • वे छत्तीसगढ़ की परधा (Pardh) अनुसूचित जनजाति से संबंध रखती थीं। 

प्रारंभिक जीवन एवं संघर्ष: 

  • तीजन बाई का बचपन आर्थिक और सामाजिक संघर्षों के बीच बीता। उन्होंने मात्र 13 वर्ष की आयु में दुर्ग जिले के समीपवर्ती चंद्रखुरी गांव में अपनी पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी। यहीं से उनके कलात्मक जीवन की शुरुआत हुई।

शिक्षा एवं प्रस्तुति शैली: 

  • तीजन बाई औपचारिक रूप से शिक्षित नहीं थीं। वे पढ़ना-लिखना नहीं जानती थीं और केवल अपने हस्ताक्षर करना जानती थीं। 
  • उनकी प्रस्तुति शैली पांडवानी थी, जिसकी वे अग्रणी एवं प्रसिद्ध प्रस्तोता मानी जाती थीं। उन्होंने 13 वर्ष की उम्र में वेदमती (Vedamati) शैली में पंडवानी का पहला सार्वजनिक गायन किया।
  • उनकी प्रस्तुतियों में तंबूरा ही एकमात्र प्रमुख वाद्य एवं मंच-सहायक (प्रॉप) होता था। अपनी अद्भुत अभिनय क्षमता से वे उसी तंबूरे को कभी भीम की गदा, कभी भगवान कृष्ण की बांसुरी और कभी हाथी की सूंड के रूप में प्रस्तुत कर देती थीं।  

पुरस्कार एवं सम्मान:

तीजन बाई को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए, जिनमें प्रमुख हैं -

  • 1988 – पद्म श्री
  • 1995 – संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
  • 2003 – बिलासपुर विश्वविद्यालय द्वारा मानद डी.लिट. (डॉक्टर ऑफ लेटर्स)
  • 2003 – पद्म भूषण
  • 2016 – एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी शताब्दी सम्मान
  • 2018 – फुकुओका पुरस्कार (जापान)
  • 2019 – पद्म विभूषण 
« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR