संदर्भ
- भारत का समुद्री मत्स्य पालन क्षेत्र एक विशाल और ऐतिहासिक विरासत को समेटे हुए है। देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और करोड़ों लोगों की थाली तक पोषण पहुंचाने के लिए पारंपरिक छोटे मछुआरे और विशाल यंत्रीकृत ट्रॉलर्स हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर समुद्र की लहरों से जूझते हैं।
- हाल ही में भारत सरकार ने देश के समुद्री मत्स्य पालन को लेकर अपने नए अनुमान जारी किए। इस आधिकारिक विज्ञप्ति में दावा किया गया कि भारत का समुद्री मत्स्य क्षेत्र काफी हद तक टिकाऊ (सस्टेनेबल) है। सरकार का यह बयान संकेत देता है कि देश खुद को अंतरराष्ट्रीय मात्स्यिकी के सबसे बड़े अभिशाप (यानी अत्यधिक दोहन-ओवरफिशिंग) से बचाने में सफल रहा है। लेकिन क्या धरातल की हकीकत भी इतनी ही उजली है?
सरकार के आंकड़े बनाम वैश्विक संगठन (एफएओ) की चिंताएं
केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (CMFRI) के डेटा के आधार पर सरकार का दावा है कि अधिकांश व्यावसायिक मछली स्टॉक बेहतर स्थिति में हैं। आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार:
- वर्ष 2022 के दौरान देश के विभिन्न क्षेत्रों में मूल्यांकित किए गए 135 मछली स्टॉकों में से 91.1% पूरी तरह टिकाऊ पाए गए।
- यह रिपोर्ट सुनने में जितनी सुखद लगती है, इस पर पूरी तरह भरोसा करने में उतनी ही बड़ी अड़चनें हैं। संयुक्त राष्ट्र का खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) इस मामले में भारत सरकार जितना आश्वस्त नहीं है।
एफएओ के कंट्री प्रोफाइल की रिपोर्ट:
- उत्पादन में ठहराव: भारत का समुद्री मत्स्य उत्पादन एक सैचुरेशन बिंदु (प्लेटो) पर पहुंच चुका है, क्योंकि अधिकांश प्रमुख प्रजातियों का पहले ही पूरी तरह दोहन हो चुका है।
- अनियंत्रित विस्तार: मत्स्य क्षेत्रों में बिना किसी रोक-टोक के प्रवेश के कारण मध्यम और छोटे ट्रॉलरों की संख्या जरूरत से ज्यादा (ओवरकैपेसिटी) बढ़ गई है। ये आधुनिक जहाज अब तेजी से घटते संसाधनों के लिए तटीय इलाकों के गरीब पारंपरिक मछुआरों के साथ सीधी और असमान प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं।
कार्यप्रणाली पर सवाल:
- केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (CMFRI) की टिकाऊपन आंकने की प्रक्रिया काफी हद तक गोपनीयता के दायरे में है, लेकिन इसकी एक बुनियादी खामी स्पष्ट है। वस्तुतः विश्व के अन्य आधुनिक देश जहां समुद्र के भीतर जाकर वैज्ञानिक तरीकों से मछली के वास्तविक स्टॉक का आकलन (In-sea Stock Assessment) करते हैं, वहीं सीएमएफआरआई आज भी मुख्य रूप से लैंडिंग डेटा (किनारे पर लाई गई मछलियों के वजन) पर निर्भर है।
- वस्तुतः तट पर लाई गई मछलियों की संख्या से पूरे विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) (जो तट से 200 समुद्री मील (371 किमी) तक फैला है) के मत्स्य संसाधन संपन्न होने का सटीक अनुमान लगाना वैज्ञानिक रूप से त्रुटिपूर्ण है।
तटीय पारिस्थितिकी तंत्र (Inshore Ecosystem) का अदृश्य विनाश
- तमिलनाडु के तटों पर पिछले तीन दशकों से काम कर रहे पारंपरिक मछुआरों का जमीनी अनुभव सरकार के कागजी दावों से बिल्कुल अलग है। उनका स्पष्ट मानना है कि जाल में आने वाली मछलियों की मात्रा साल-दर-साल कम हुई है और कई स्थानीय प्रजातियां अब पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं।
- वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं के अनुसार, वास्तविक संकट केवल ओवरफिशिंग का नहीं है, बल्कि तट के करीबी समुद्री तलहटी पर्यावरण (Inshore Benthic Environment) का पूरी तरह नष्ट हो जाना है।
तटीय मत्स्य पर्यावरण के विनाश के मुख्य कारण:
- नदियों पर बांध निर्माण (समुद्र तक प्राकृतिक पोषक तत्वों का न पहुंच पाना)
- मैंग्रोव वनों का अंधाधुंध विनाश (मछलियों के प्राकृतिक प्रजनन स्थलों का खात्मा)
- औद्योगिक, कृषि और शहरी कचरे से बढ़ता समुद्री प्रदूषण
- यंत्रीकृत ट्रॉलिंग (Mechanised Trawling) का अनियंत्रित फैलाव
भारत का महाद्वीपीय शेल्फ (Continental Shelf), जो मछलियों के फलने-फूलने के लिए सबसे अनुकूल जगह है, गुजरात और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों को छोड़कर बाकी उपमहाद्वीप में काफी संकरा है। वस्तुतः प्रादेशिक समुद्र (Territorial Seas - तट से 12 समुद्री मील के भीतर) ही झींगा जैसी मूल्यवान प्रजातियों का मुख्य आश्रय स्थल है, लेकिन अब यह क्षेत्र सबसे ज्यादा त्रस्त है।
यंत्रीकृत ट्रॉलिंग की भारी कीमत और कमजोर कानून
- अर्ध-औद्योगिक ट्रॉलिंग (Semi-industrial Trawling) भारत की मूल पद्धति नहीं है; इसे 1960 के दशक में विदेशों से आयात किया गया था। आज देश में 64,414 यंत्रीकृत मछली पकड़ने वाले जहाज मौजूद हैं और यह संख्या बिना किसी नियमन के प्रतिदिन बढ़ रही है। पुराने जहाजों को बड़ा किया जा रहा है और उनमें शक्तिशाली चीनी इंजन लगाए जा रहे हैं।
- यह विशाल बेड़ा दिन-रात समुद्र की तलहटी को बेरहमी से जोतता रहता है। इसके कारण समुद्र के नीचे का पूरा वनस्पति और समुद्री जीवों का जीवन समाप्त हो रहा है। नतीजतन, पारंपरिक मछुआरों की आजीविका छिन रही है और दोनों पक्षों में हिंसक टकराव बढ़ रहे हैं।
सरकारी प्रयासों की कमजोरी:
- सीमित पाबंदी: वर्ष में दो महीने की मानसून बंदी को छोड़कर, ट्रॉलर्स को रोकने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं हैं।
- अप्रभावी नियम: यंत्रीकृत नौकाओं को तट से 5 समुद्री मील (NM) के दायरे से बाहर रखने का नियम केवल कागजों पर है, क्योंकि तटीय राज्यों के पास इसकी निगरानी (गश्त) के लिए न तो पर्याप्त नावें हैं और न ही स्टाफ।
- मछुआरों की उपेक्षा: प्रबंधन और नीति-निर्माण में स्थानीय मछुआरों को कोई भूमिका नहीं दी गई है।
पारिस्थितिकी के इस विनाश के कारण अब छोटे और बड़े, दोनों ही तरह के मछुआरों को तटीय इलाकों से दूर गहरे समुद्र (Deep-sea) की तरफ धकेला जा रहा है।
नीतिगत पुनर्विचार की तत्काल आवश्यकता
- सरकार अब गहरे समुद्र में मछली पकड़ने की वकालत कर रही है, लेकिन एफएओ की रिपोर्ट आगाह करती है कि गहरे समुद्र के संसाधनों से बेहद मामूली बढ़त ही संभव है, क्योंकि वहां अन्य देश भी पहले से सक्रिय हैं।
- वास्तव में, हमारी मौजूदा नीतियां तटीय जल की समृद्ध क्षमता को खुद अपने हाथों से बर्बाद कर रही हैं। मछुआरों को दूर भेजने के लिए ईंधन और महंगी तकनीक पर अतिरिक्त सब्सिडी दी जा रही है, जबकि जरूरत इस बात की है कि तटीय जल क्षेत्र का स्थानीय स्तर पर सही प्रबंधन किया जाए। इसके लिए प्रदूषण रोकने के साथ-साथ यंत्रीकृत ट्रॉलिंग की संख्या को कड़ाई से सीमित करना होगा।
- यह सिर्फ एक तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी है। ट्रॉलर्स मालिकों का दबदबा नियमों को लागू नहीं होने देता। इसका सबसे बड़ा उदाहरण भारत और श्रीलंका के बीच स्थित पाक खाड़ी (Palk Bay) है, जहाँ भारतीय ट्रॉलर्स अंतरराष्ट्रीय सीमा लांघकर श्रीलंकाई जल क्षेत्र में अवैध शिकार (Piracy) करते हैं, जिससे सीमा के दोनों तरफ के छोटे पारंपरिक मछुआरे तबाह हो रहे हैं। इस कड़वी हकीकत को कच्चातीवु द्वीप के राजनीतिक मालिकाना हक के दावों से बदला नहीं जा सकता।
आगे की राह
- यद्यपि सरकार का आकलन भारतीय समुद्री मत्स्य संसाधनों की एक सकारात्मक तस्वीर प्रस्तुत करता है, किंतु वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं और मछुआरा समुदाय के बीच तटीय समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के निरंतर क्षरण को लेकर गंभीर चिंता बनी हुई है। वस्तुतः भारत में समुद्री मत्स्य क्षेत्र की दीर्घकालिक स्थिरता और व्यावहारिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि देश अपने सर्वाधिक उत्पादक तटीय जल क्षेत्रों के प्रबंधन एवं सुशासन (Governance) को कितना प्रभावी बना पाता है।
- संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने भी इस दिशा में केंद्र और राज्य सरकारों को समुद्री मत्स्य संसाधनों के प्रबंधन की संस्थागत क्षमता सुदृढ़ करने तथा उसे आधुनिक बनाने के लिए व्यापक प्रयास करने की आवश्यकता पर बल दिया है।
- इसके साथ ही, केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (CMFRI) को केवल तट पर उतारी गई मछलियों के आंकड़ों के आधार पर मत्स्य संसाधनों का आकलन करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि समुद्री तल (बेंथिक पर्यावरण) की वास्तविक पारिस्थितिक स्थिति का वैज्ञानिक एवं व्यापक अध्ययन भी करना चाहिए।
- यद्यपि ऐसे साक्ष्य-आधारित नीतिगत सुधार ही भारत की समुद्री मत्स्य संपदा के संरक्षण तथा ब्लू इकोनॉमी (Blue Economy) के सतत एवं संतुलित विकास की आधारशिला सिद्ध हो सकते हैं।