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पश्चिम एशिया संकट और भारत की क्षेत्रीय कूटनीति

संदर्भ

वर्तमान में पश्चिम एशिया (West Asia) में जारी संघर्ष ने न केवल मध्य-पूर्व की स्थिरता को हिला दिया है बल्कि इसका प्रभाव अब दक्षिण एशिया के समुद्री द्वारों तक पहुंच चुका है। हाल ही में हिंद महासागर में ईरानी युद्धपोत ‘डेना (IRIS Dena)’ के डूबने की घटना ने इस संघर्ष को भारत के समुद्री पड़ोस (Maritime Neighbourhood) के अत्यंत निकट ला खड़ा किया है। यह स्थिति भारत की ‘पड़ोस प्रथम’ (Neighbourhood First) नीति और ‘नेट सुरक्षा प्रदाता’ (Net Security Provider) की भूमिका के लिए एक जटिल परीक्षा है। 

पश्चिम एशियाई संकट का दक्षिण एशिया पर बहुआयामी प्रभाव 

पश्चिम एशिया में अस्थिरता केवल कूटनीतिक चिंता नहीं है बल्कि दक्षिण एशिया के लिए एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक खतरा है।

  • ऊर्जा सुरक्षा: भारत अपनी एल.पी.जी. और प्राकृतिक गैस की जरूरतों के लिए होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अत्यधिक निर्भर है। आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान सीधे घरेलू मुद्रास्फीति को प्रभावित करता है।
  • प्रवासी सुरक्षा: पश्चिम एशिया में लगभग 2.5 करोड़ दक्षिण एशियाई (लगभग 1 करोड़ भारतीय) कार्यरत हैं। उनकी सुरक्षा और वहाँ से आने वाला प्रेषण (Remittance) क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
  • आपूर्ति श्रृंखला: उर्वरक एवं खाद्य आपूर्ति पर पड़ने वाला प्रभाव कृषि प्रधान दक्षिण एशियाई देशों के लिए खाद्य सुरक्षा का संकट पैदा कर सकता है। 

कूटनीतिक दुविधा: संतुलन बनाम सक्रियता 

  • हालिया घटनाओं पर भारत की प्रतिक्रिया क्षेत्र के अन्य देशों (पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका) की तुलना में अधिक ‘सतर्क एवं नपी-तुली’ रही है। जहाँ पड़ोसी देशों ने त्वरित व तीखी प्रतिक्रियाएँ दीं, वहीं भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के उल्लंघन और नागरिकों की मृत्यु पर दुख तो जताया किंतु किसी पक्ष की सीधी आलोचना से परहेज किया। 
  • यह रुख भारत के इज़राइल के साथ मजबूत होते रणनीतिक संबंधों और साथ ही ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह जैसे महत्वपूर्ण हितों के बीच ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) बनाए रखने के प्रयास को दर्शाता है। 

हिंद महासागर में सुरक्षा चुनौतियाँ

श्रीलंका के निकट IRIS Dena की घटना ने भारत की समुद्री रणनीति के समक्ष नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

  • नेट सुरक्षा प्रदाता की साख: अमेरिका एवं ईरान के बीच बढ़ते टकराव के बीच भारतीय नौसेना की बचाव भूमिका सराहनीय रही है किंतु भू-राजनीतिक तटस्थता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
  • क्षेत्रीय संस्थाओं की प्रासंगिकता: हिंद महासागर रिम एसोसिएशन (IORA) और कोलंबो सिक्योरिटी कॉन्क्लेव जैसे मंचों को अब सक्रिय सुरक्षा तंत्र में बदलने की आवश्यकता है।
  • क्वाड का संतुलन: क्वाड (QUAD) के वर्तमान अध्यक्ष के रूप में भारत को अपनी ‘हिंद-प्रशांत’ दृष्टि और पश्चिम एशिया के समीकरणों के बीच एक महीन संतुलन साधना होगा। 

ऑल-ऑफ-रीजन (All-of-Region) दृष्टिकोण की आवश्यकता 

  • दक्षिण एशिया वर्तमान में युवाओं के असंतोष, बेरोजगारी एवं राजनीतिक परिवर्तनों (जैसे- नेपाल व बांग्लादेश में बदलाव) से गुजर रहा है। ऐसे में पश्चिम एशिया के झटके क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ा सकते हैं।
  • भारत को ईंधन और खाद्य सहायता के लिए एक ‘क्षेत्रीय आकस्मिक योजना’ तैयार रखनी चाहिए।
  • वर्ष 2021 के वैक्सीन संकट से सबक लेते हुए भारत को पड़ोसी देशों की जरूरतों को अपनी घरेलू प्राथमिकताओं के साथ एकीकृत करना होगा। 

आगे की राह: 2026 की चुनौतियाँ

  • वर्ष 2026 में भारत ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा, जिसमें ईरान एवं संयुक्त अरब अमीरात जैसे परस्पर विरोधी हितों वाले देश शामिल होंगे। भारत के लिए सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह-
    • अपनी पारंपरिक ‘संतुलित विदेश नीति’ की ओर लौटे।
    • दक्षिण एशिया की आर्थिक एवं सुरक्षा चिंताओं को वैश्विक मंचों पर मजबूती से रखे।
    • समुद्री सुरक्षा के लिए ‘नियम-आधारित व्यवस्था’ (Rules-based order) का समर्थन करे। 

निष्कर्ष 

पश्चिम एशिया का संकट भारत के लिए एक ‘दोधारी तलवार’ के समान है। भारत की सुरक्षा और समृद्धि इस बात पर निर्भर करती है कि वह किसी एक पक्ष की ओर झुके बिना क्षेत्र में एक ‘स्थिरता के स्तंभ’ के रूप में उभरे। रणनीतिक संतुलन और सक्रिय पड़ोस कूटनीति ही भारत को इस भू-राजनीतिक भँवर से सुरक्षित निकाल सकती है। 

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