संदर्भ
- यौन हिंसा के मामलों में न्याय केवल इस बात से तय नहीं होता कि अपराध के समय क्या घटित हुआ। कई बार न्याय की प्रक्रिया में पीड़िता का व्यवहार, उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि, आरोपी के साथ उसके संबंध, घटना के तुरंत बाद उसकी प्रतिक्रिया और शिकायत दर्ज कराने में लगने वाले समय को उसकी विश्वसनीयता की कसौटी बना दिया जाता है।
- समाज और अक्सर न्यायिक प्रक्रिया भी यह अपेक्षा करती है कि एक ‘वास्तविक पीड़िता’ डरकर रोएगी, तुरंत विरोध करेगी, फौरन शिकायत दर्ज कराएगी और लंबे समय तक सदमे में दिखाई देगी। लेकिन मानव मनोविज्ञान और आघात (Trauma) की वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल होती है। हर व्यक्ति आघात का सामना अलग तरीके से करता है। इसी पूर्वाग्रह को समझने में अपराधशास्त्री निल्स क्रिस्टी की ‘आदर्श पीड़िता’ (Ideal Victim) की अवधारणा बेहद महत्वपूर्ण है।
आदर्श पीड़िता की अवधारणा
नॉर्वे के प्रसिद्ध अपराधशास्त्री निल्स क्रिस्टी ने वर्ष 1986 में प्रकाशित अपनी पुस्तक From Crime Policy to Victim Policy में ‘आदर्श पीड़िता’ की अवधारणा को विस्तार से समझाया था।
- सहज स्वीकृति: समाज कुछ विशेष प्रकार के व्यक्तियों को सहज रूप से ‘निर्दोष’ और ‘वास्तविक’ पीड़ित मानता है। ऐसी पीड़िता आमतौर पर शारीरिक रूप से कमजोर होती है (जैसे कम उम्र की बच्ची, बहुत बुजुर्ग महिला या दिव्यांग)।
- सम्मानजनक गतिविधि: वह किसी सम्मानजनक गतिविधि में व्यस्त होती है, अपराध के लिए उसे किसी भी रूप में जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता, वह आरोपी को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानती होती और आरोपी समाज की नजरों में स्पष्ट रूप से खतरनाक व बुरा व्यक्ति होता है।
- वास्तविक जीवन की भिन्नता: वास्तविक जीवन में पीड़ित व्यक्ति इस निर्धारित खाके के अनुसार व्यवहार नहीं करते। आरोपी कोई परिचित, सहकर्मी, मित्र या सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित व्यक्ति भी हो सकता है। पीड़िता घटना के बाद सामान्य दिख सकती है, देर से शिकायत कर सकती है या तत्काल शारीरिक विरोध करने में असमर्थ हो सकती है। ऐसे मामलों में समाज का संदेह अक्सर आरोपी से हटकर पीड़िता की ओर मुड़ जाता है।
- क्रिस्टी ने ‘आदर्श अपराधी’ की अवधारणा भी दी है, जिसके तहत अपराधी अनजान, हिंसक और असामाजिक होता है। लेकिन जब आरोपी प्रभावशाली या सम्मानित पृष्ठभूमि से हो, तो उसके खिलाफ आरोप स्वीकार करना लोगों के लिए कठिन हो जाता है।
तरुण तेजपाल मामला और आघात की विविध प्रतिक्रियाएँ
- हाल ही में तरुण तेजपाल मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा पीठ के फैसले ने इस बहस को फिर से जीवंत कर दिया है। हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया जिसमें तेजपाल को बरी किया गया था और उन्हें बलात्कार का दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई।
- हाई कोर्ट ने निचली अदालत के दृष्टिकोण को ‘विकृत’ करार दिया, क्योंकि वह पीड़िता के व्यवहार, जैसे कि लिफ्ट से बाहर आने के बाद शांत और मुस्कुराते हुए दिखने को, उसकी विश्वसनीयता परखने का मुख्य आधार बना रहा था।
- अदालत ने स्पष्ट किया कि आघात का कोई एक निश्चित चेहरा नहीं होता। गंभीर घटना के बाद भी कोई व्यक्ति सामान्य दिख सकता है, अपने काम पर जा सकता है या लोगों से बातचीत कर सकता है, जिसका अर्थ यह कतई नहीं है कि वह मानसिक आघात से नहीं गुजरा है।
ऐतिहासिक उदाहरण: मथुरा और भंवरी देवी मामले
भारतीय न्याय के इतिहास में ऐसे कई मामले रहे हैं जो समाज की रूढ़िवादी सोच और ‘आदर्श पीड़िता’ की तलाश को बेनकाब करते हैं:
- मथुरा मामला (1979): हिरासत में बलात्कार के इस चर्चित मामले में निचली अदालत और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता के पूर्व यौन अनुभव को उसकी सहमति से जोड़कर देखा। इसके अलावा, शरीर पर चोटों के स्पष्ट अभाव और प्रतिरोध न करने को आधार बनाया गया। इस फैसले के बाद देशव्यापी विरोध हुआ और यह सवाल उठा कि क्या बलात्कार की पीड़िता से हर हाल में शारीरिक प्रतिरोध की अपेक्षा करना न्यायसंगत है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने बाद में इस फैसले को न्यायपालिका के लिए ‘संस्थागत शर्मिंदगी का क्षण’ बताया।
- भंवरी देवी मामला (1992): इस सामूहिक बलात्कार मामले ने यह साबित किया कि ‘आदर्श पीड़िता’ की धारणा केवल लिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि जाति और सामाजिक हैसियत भी महिला की विश्वसनीयता को प्रभावित करती है। जयपुर सत्र न्यायालय द्वारा आरोपियों को बरी किए जाने के पीछे के जातिगत पूर्वाग्रहों ने न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। इसी संघर्ष के परिणामस्वरुप कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न के खिलाफ ‘विशाखा दिशानिर्देश’ और वर्ष 2013 का कानून अस्तित्व में आया।
‘ट्रॉमा परफॉर्मेंस’ की अपेक्षा और चरित्र हनन का खतरा
- यौन हिंसा के मामलों में समाज और कभी-कभी न्यायिक प्रक्रिया भी पीड़िता से आघात के एक निश्चित प्रदर्शन यानी ‘ट्रॉमा परफॉर्मेंस’ की उम्मीद करती है। उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह हर बार घटना को बिल्कुल एक जैसे शब्दों में बयां करे, फफक कर रोए और पूरी तरह टूट जाए। भय, शर्म, सामाजिक दबाव और मानसिक तनाव के कारण वास्तविक प्रतिक्रियाएँ इससे भिन्न हो सकती हैं।
- इसके अलावा, अदालती बहसों या फैसलों के दौरान पीड़िता के चरित्र, उसके निजी जीवन या पूर्व आचरण पर सवाल उठाना न्याय के मूल उद्देश्य से भटकाव पैदा करता है। सहमति प्रत्येक विशिष्ट परिस्थिति से जुड़ा प्रश्न है, और किसी महिला का अतीत यह तय नहीं करता कि उसने किसी खास घटना में सहमति दी थी या नहीं।
आगे की राह : न्यायिक संवेदनशीलता
- अदालतों के फैसले केवल कानूनी दस्तावेज नहीं होते, बल्कि वे समाज में लैंगिक समानता की दिशा तय करते हैं। वर्तमान समय में न्यायपालिका इस बात को लेकर अधिक सतर्क हो रही है कि शिकायत में देरी, शारीरिक चोटों का अभाव या गवाही की छोटी-मोटी विसंगतियों के आधार पर पीड़िता के खिलाफ स्वतः प्रतिकूल निष्कर्ष न निकाले जाएं।
- यद्यपि न्याय प्रणाली को ‘परफेक्ट विक्टिम’ या ‘परफेक्ट ऑफेंडर’ की किसी काल्पनिक छवि की तलाश करने के बजाय कानून, ठोस साक्ष्यों और निष्पक्ष प्रक्रिया को केंद्र में रखना चाहिए। पीड़िता को न्याय पाने के लिए किसी विशेष भूमिका का प्रदर्शन करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। लैंगिक संवेदनशील न्याय का अर्थ किसी एक पक्ष के प्रति पूर्वाग्रह रखना नहीं, बल्कि सामाजिक रूढ़ियों से ऊपर उठकर केवल तथ्यों, गरिमा और अधिकारों की रक्षा करना है।