हाल ही में मलयालम भाषी जनता की भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राज्य का नाम बदलकर 'केरलम' करने के प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी है। यह निर्णय न केवल एक नाम परिवर्तन है, बल्कि भारत के भाषाई संघवाद की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।
संवैधानिक एवं कानूनी प्रक्रिया
राज्य का नाम बदलने की शक्ति विशेष रूप से संसद के पास है, जिसका आधार संविधान का अनुच्छेद 3 है। इस प्रक्रिया के मुख्य चरण निम्नलिखित हैं:
- विधेयक का प्रेषण: केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद, 'केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026' को राष्ट्रपति द्वारा केरल विधानसभा को उनके विचारों के लिए भेजा जाएगा।
- परामर्श प्रक्रिया: गृह मंत्रालय (MHA) इस दौरान खुफिया ब्यूरो (IB), भारतीय सर्वेक्षण विभाग और रेल मंत्रालय जैसे प्रमुख विभागों से समन्वय करता है।
- संसदीय संशोधन: विधानसभा की राय प्राप्त होने के बाद, संसद द्वारा संविधान की प्रथम अनुसूची में संशोधन के लिए विधेयक पारित किया जाएगा।
- अंतिम चरण: राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और आधिकारिक अधिसूचना के साथ यह परिवर्तन प्रभावी हो जाएगा।
नाम परिवर्तन के पीछे के तर्क
- भाषाई एकरूपता: 1 नवंबर 1956 को भाषाई आधार पर गठित इस राज्य को मलयालम में हमेशा से 'केरलम' कहा जाता रहा है। वर्तमान प्रस्ताव इस भाषाई वास्तविकता को संवैधानिक मान्यता देता है।
- विसंगति का निवारण: पूर्व में (2023) आठवीं अनुसूची की सभी भाषाओं में नाम बदलने का प्रस्ताव था, जिसे तकनीकी सुधारों के बाद 2024 में केवल 'केरलम' तक सीमित कर सुसंगत बनाया गया।
ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ
‘केरलम' शब्द की जड़ें प्राचीन भारत के इतिहास में गहराई से समाहित हैं:
- शिलालेख प्रमाण: सम्राट अशोक के द्वितीय शिलालेख (257 ई.पू.) में इस क्षेत्र का उल्लेख 'केरलपुत्र' के रूप में मिलता है।
- व्युत्पत्ति: विद्वानों के अनुसार, यह 'चेराम' (प्राचीन साम्राज्य) से निकला है। डॉ. हरमन गुंडर्ट के मत के अनुसार 'केरलम' का अर्थ "जुड़ी हुई भूमि" (चेराम + आलम) है।
- ऐक्य केरल आंदोलन: 1920 के दशक में मालाबार, कोच्चि और त्रावणकोर के एकीकरण के लिए चले संघर्ष का मुख्य नारा ही 'एकीकृत केरलम' की स्थापना था।
प्रशासनिक और राजनीतिक आयाम
- केरल का नाम बदलकर 'केरलम' करने का यह ऐतिहासिक निर्णय प्रधानमंत्री कार्यालय के नवनिर्मित परिसर 'सेवा तीर्थ' में आयोजित केंद्रीय मंत्रिमंडल की पहली बैठक में लिया गया, जो शासन की नई प्राथमिकताओं को दर्शाता है।
- इस बैठक के दौरान मंत्रिमंडल ने "नागरिक देवो भव" के मूल मंत्र से प्रेरित होकर एक विशेष 'सेवा संकल्प' भी अपनाया, जिसमें नागरिक-केंद्रित पारदर्शिता और सेवा-उन्मुख शासन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई गई है। राजनीतिक दृष्टि से इस प्रस्ताव को केरल के सभी दलों का पूर्ण और अटूट समर्थन प्राप्त है, जो इस भाषाई और सांस्कृतिक बदलाव को राज्य की "जनता की सामूहिक इच्छा" के एक सशक्त प्रतिबिंब के रूप में स्थापित करता है।
चुनौतियाँ और रणनीतिक महत्व
- प्रशासनिक पुनर्गठन: सभी सरकारी अभिलेखों, मानचित्रों, डाक दस्तावेजों और शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में बड़े पैमाने पर सुधार की आवश्यकता होगी।
- ऐतिहासिक मिसाल: अतीत में पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के नाम परिवर्तन के प्रस्ताव तकनीकी कारणों से लंबित रहे हैं, अतः इस प्रक्रिया का निर्बाध पूर्ण होना महत्वपूर्ण है।
महत्व
- सहकारी संघवाद: यह केंद्र और राज्य के बीच सामंजस्यपूर्ण संबंधों का उत्कृष्ट उदाहरण है।
- सांस्कृतिक गौरव: यह कदम क्षेत्रीय पहचान को भारतीय संघ की व्यापक संरचना के साथ संरेखित करता है।
निष्कर्ष
केरल का 'केरलम' के रूप में पुनरुद्धार केवल नाम का बदलाव नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत पहचान की संवैधानिक पुनर्स्थापना है। यह भारत की 'विविधता में एकता' के सिद्धांत को और अधिक सुदृढ़ करता है।