संदर्भ
- हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका और सऊदी अरब ने एक दीर्घकालिक नागरिक परमाणु सहयोग समझौते (Civil Nuclear Cooperation Agreement) पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसे दोनों देशों ने ऊर्जा सहयोग और आर्थिक साझेदारी को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम बताया है।
- प्रस्तावित 30 वर्षीय समझौते का उद्देश्य सऊदी अरब के नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में अमेरिकी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाना तथा ऊर्जा क्षेत्र में दीर्घकालिक सहयोग स्थापित करना है। यद्यपि इसे शांतिपूर्ण परमाणु सहयोग की संज्ञा दी गई है, किंतु समझौते की कुछ संभावित व्यवस्थाओं - विशेषकर सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) की अनुमति ने परमाणु अप्रसार, क्षेत्रीय सुरक्षा तथा पश्चिम एशिया में सामरिक संतुलन को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
समझौते की प्रमुख विशेषताएँ
- इस समझौते के अंतर्गत अमेरिकी कंपनियों को सऊदी अरब के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में व्यापक अवसर प्राप्त होंगे। इसके साथ एक द्विपक्षीय सुरक्षा (Safeguards) समझौते पर भी हस्ताक्षर किए गए हैं, जिसका उद्देश्य नागरिक परमाणु कार्यक्रम की निगरानी एवं सुरक्षा सुनिश्चित करना बताया गया है।
- हालाँकि, अमेरिकी मीडिया और कई रणनीतिक विशेषज्ञों ने आशंका व्यक्त की है कि यदि सऊदी अरब को घरेलू स्तर पर यूरेनियम संवर्धन की अनुमति मिलती है, तो भविष्य में वही तकनीक परमाणु हथियार निर्माण की दिशा में भी प्रयुक्त हो सकती है। वस्तुतः यही इस समझौते का सबसे विवादास्पद पक्ष है।
समझौता विवाद का विषय क्यों बना?
1. परमाणु अप्रसार व्यवस्था के समक्ष चुनौती
- यूरेनियम संवर्धन नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का आवश्यक तकनीकी घटक अवश्य है, किंतु यही प्रक्रिया उच्च स्तर पर परमाणु हथियारों के निर्माण का आधार भी बन सकती है। यदि किसी देश को स्वतंत्र रूप से संवर्धन क्षमता प्राप्त हो जाती है, तो वह अपेक्षाकृत कम समय में सैन्य परमाणु कार्यक्रम की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
- इसी कारण अनेक विशेषज्ञों का मत है कि सऊदी अरब को ऐसी क्षमता प्रदान करना परमाणु अप्रसार व्यवस्था (Nuclear Non-Proliferation Regime) के लिए दीर्घकालिक चुनौती उत्पन्न कर सकता है।
2. पश्चिम एशिया में सामरिक संतुलन पर प्रभाव
- पश्चिम एशिया पहले से ही गहरे सामरिक तनाव का क्षेत्र है। इजरायल को व्यापक रूप से परमाणु शक्ति माना जाता है, जबकि ईरान पर लंबे समय से परमाणु हथियार विकसित करने की आशंकाएँ व्यक्त की जाती रही हैं। ऐसे परिदृश्य में सऊदी अरब की संवर्धन क्षमता क्षेत्र में परमाणु प्रतिस्पर्धा (Nuclear Arms Race) को प्रोत्साहित कर सकती है।
- विशेष चिंता का विषय यह है कि यह समझौता ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ा हुआ है तथा यमन के हूती विद्रोहियों की गतिविधियाँ भी क्षेत्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर रही हैं।
3. अमेरिकी घरेलू राजनीति
- इस समझौते को अमेरिकी कांग्रेस की स्वीकृति प्राप्त करनी होगी। यद्यपि रिपब्लिकन पार्टी का प्रभाव मजबूत है, फिर भी सऊदी अरब को लेकर अमेरिकी विधायिका में व्यापक राजनीतिक सहमति नहीं है। इजरायल समर्थक समूहों तथा परमाणु अप्रसार के पक्षधर सांसदों द्वारा इस समझौते का विरोध किया जा सकता है।
123 समझौता : इसका महत्व
- यह समझौता अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1954 की धारा 123 के अंतर्गत किए जाने वाले तथाकथित 123 Agreement पर आधारित है।
- 123 समझौता वह विधिक ढाँचा है जिसके अंतर्गत अमेरिका किसी अन्य देश के साथ नागरिक परमाणु सहयोग स्थापित करता है। इसके माध्यम से परमाणु सामग्री, उपकरण, प्रौद्योगिकी तथा वैज्ञानिक सहयोग का आदान-प्रदान संभव होता है, बशर्ते संबंधित देश अंतरराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार मानकों का पालन करे।
- भारत और अमेरिका के बीच 2008 का ऐतिहासिक असैन्य परमाणु समझौता भी इसी विधिक ढाँचे के अंतर्गत संपन्न हुआ था।
क्या यह समझौता संयुक्त अरब अमीरात मॉडल से भिन्न है?
- वर्ष 2009 में अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच हुए नागरिक परमाणु समझौते को परमाणु अप्रसार की दृष्टि से गोल्ड स्टैंडर्ड माना जाता है। उस समझौते में यूएई ने घरेलू यूरेनियम संवर्धन तथा पुनः प्रसंस्करण (Reprocessing) का अधिकार त्याग दिया था और परमाणु ईंधन आयात करने पर सहमति व्यक्त की थी।
- यदि सऊदी अरब को वास्तव में घरेलू संवर्धन की अनुमति दी जाती है, तो यह समझौता यूएई मॉडल से मूलतः भिन्न होगा तथा अप्रसार व्यवस्था को अपेक्षाकृत कमजोर कर सकता है।
हितों के टकराव का प्रश्न
- इस समझौते ने हितों के टकराव (Conflict of Interest) संबंधी बहस को भी जन्म दिया है। आलोचकों का तर्क है कि ट्रंप संगठन के सऊदी अरब सहित पश्चिम एशिया के कई देशों में व्यापक व्यावसायिक हित हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या अमेरिकी विदेश नीति पूरी तरह राष्ट्रीय रणनीतिक हितों पर आधारित है अथवा उसमें निजी आर्थिक हितों का भी प्रभाव है।
- यद्यपि इस संबंध में कोई प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं है, फिर भी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में ऐसी आशंकाओं का पारदर्शी उत्तर दिया जाना आवश्यक है।
संभावित प्रभाव
इस समझौते के अनेक दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं -
- पश्चिम एशिया में परमाणु प्रतिस्पर्धा तेज हो सकती है।
- ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को और गति प्रदान कर सकता है।
- चीन एवं रूस को क्षेत्र में सामरिक प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।
- वैश्विक परमाणु अप्रसार व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
- अमेरिकी परमाणु उद्योग, विशेषकर वेस्टिंगहाउस जैसी कंपनियों को नए व्यावसायिक अवसर प्राप्त होंगे।
- सऊदी अरब अपने तेल संसाधनों का अधिक भाग निर्यात के लिए सुरक्षित रखते हुए विद्युत उत्पादन में परमाणु ऊर्जा का उपयोग बढ़ा सकेगा।
आगे की राह
इस समझौते की सफलता अंततः इसकी सुरक्षा व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता पर निर्भर करेगी। आवश्यक है कि -
- अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी व्यवस्था को सुदृढ़ बनाया जाए।
- यूरेनियम संवर्धन पर स्पष्ट एवं कठोर सीमाएँ निर्धारित की जाएँ।
- नियमित निरीक्षण एवं पारदर्शी सत्यापन तंत्र सुनिश्चित किया जाए।
- परमाणु सहयोग को केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों तक सीमित रखने हेतु बाध्यकारी प्रावधान लागू किए जाएँ।
- पश्चिम एशिया में क्षेत्रीय सुरक्षा संवाद को प्रोत्साहित किया जाए, जिससे परमाणु प्रतिस्पर्धा को रोका जा सके।
निष्कर्ष
- अमेरिका–सऊदी अरब नागरिक परमाणु समझौता केवल ऊर्जा सहयोग का विषय नहीं है, बल्कि यह वैश्विक परमाणु शासन, पश्चिम एशिया की सामरिक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय अप्रसार व्यवस्था से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है।
- यदि इस समझौते में पर्याप्त सुरक्षा उपाय, प्रभावी निरीक्षण तंत्र तथा कठोर अप्रसार प्रावधान सुनिश्चित नहीं किए गए, तो यह क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन को अस्थिर करने के साथ-साथ परमाणु हथियारों की नई प्रतिस्पर्धा को भी जन्म दे सकता है।
- दूसरी ओर, यदि इसे पारदर्शी, उत्तरदायी और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप लागू किया जाता है, तो यह ऊर्जा सुरक्षा तथा शांतिपूर्ण परमाणु सहयोग का एक संतुलित मॉडल भी बन सकता है। अतः इस समझौते की वास्तविक सफलता उसके विधिक ढाँचे, सुरक्षा प्रावधानों तथा अंतरराष्ट्रीय निगरानी तंत्र की प्रभावशीलता पर निर्भर करेगी।