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भारत के टाइगर रिजर्व को पुनर्जीवित करने की नई रणनीति: संरक्षण का नया रोडमैप

चर्चा में क्यों ?

भारत में बाघ संरक्षण के इतिहास में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए केंद्र सरकार ने राजस्थान के सरिस्का टाइगर रिजर्व में बाघों के पुनर्प्रवेश (Tiger Reintroduction) के 18 वर्ष पूरे होने के अवसर पर दो महत्वपूर्ण रिपोर्टें जारी की हैं।

रिपोर्ट के प्रमुख बिन्दु ?

  • आगामी वर्षों के लिए बाघ संरक्षण का नया रोडमैप प्रस्तुत किया गया है।
  • देशभर में अब तक किए गए 12 बाघ पुनर्प्रवेश (Reintroduction) कार्यक्रमों से मिले अनुभवों और सबकों का विश्लेषण किया गया है।
  • नई रणनीति का मुख्य संदेश स्पष्ट है कि अब केवल बाघों की संख्या बढ़ाना ही लक्ष्य नहीं होगा, बल्कि उन टाइगर रिजर्वों को पुनर्जीवित करना होगा जहां बाघों की संख्या बहुत कम या समाप्त हो चुकी है।
  • वर्तमान में भारत में 3,682 बाघ हैं, लेकिन इनके संतुलित वितरण की चुनौती को देखते हुए सरकार ने 25 प्राथमिकता वाले टाइगर रिजर्व चिन्हित किए हैं, जहां आवास (Habitat), शिकार प्रजातियों (Prey Base) तथा आवश्यक होने पर बाघों के पुनर्प्रवेश पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

भारत में बाघों की संख्या बढ़ी, लेकिन वितरण असंतुलित

  • भारत विश्व का सबसे बड़ा बाघ आवास वाला देश बन चुका है। 
  • पिछले डेढ़ दशक में बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

वर्ष

बाघों की संख्या

2006

1,411

2010

1,706

2014

2,226

2018

2,967

2022

3,682

  • आज देश के 58 टाइगर रिजर्व लगभग 85,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं।
  • हालांकि, कुल संख्या बढ़ने के बावजूद इनका वितरण अत्यंत असमान है।

प्रमुख तथ्य

  • केवल 10-12 टाइगर रिजर्व में देश के लगभग 36% बाघ पाए जाते हैं।
  • 12 टाइगर रिजर्व ऐसे हैं जहां तीन से भी कम बाघ मौजूद हैं।
  • कावल (तेलंगाना), कमलांग (अरुणाचल प्रदेश) तथा डम्पा (मिजोरम) में वर्तमान में कोई बाघ नहीं बचा है।

असमान वितरण क्यों चिंता का विषय है ?

  • जहां बाघों की संख्या बहुत अधिक है, वहां कई नई समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं -
    • युवा बाघ नए क्षेत्र की तलाश में जंगल से बाहर निकल रहे हैं।
    • खेती वाले क्षेत्रों और गांवों में प्रवेश बढ़ रहा है।
    • मानव-बाघ संघर्ष में वृद्धि हो रही है।
    • पशुधन पर निर्भरता बढ़ रही है।
    • रेलवे लाइन, राष्ट्रीय राजमार्ग और नहरों जैसी संरचनाओं से बाघों की मृत्यु का खतरा बढ़ रहा है।
    • दूसरी ओर, जिन टाइगर रिजर्वों में बाघ नहीं हैं, वहां जंगल तो सुरक्षित हैं, लेकिन पर्याप्त शिकार प्रजातियां उपलब्ध नहीं हैं, जिससे बाघों का पुनर्वास कठिन हो जाता है।

'सोर्स' और 'सिंक' आबादी की नई अवधारणा

  • नई संरक्षण नीति का आधार Source Population और Sink Population की अवधारणा है।

Source Population (स्रोत आबादी)

  • ऐसे टाइगर रिजर्व जहां अच्छा आवास उपलब्ध हो,पर्याप्त शिकार प्रजातियां हों,बाघों की संख्या अधिक हो और प्राकृतिक प्रजनन लगातार हो रहा हो।
  • उदाहरण- कॉर्बेट,बांदीपुर और काजीरंगा ये रिजर्व अन्य क्षेत्रों के लिए बाघ उपलब्ध कराने वाले स्रोत माने जाते हैं।

Sink Population (सिंक आबादी)

  • ऐसे क्षेत्र जहां बाघों की संख्या बहुत कम हो,प्रजनन नहीं हो रहा हो,जंगलों के बीच संपर्क (Connectivity) कमजोर हो और शिकार प्रजातियों की कमी हो।
  • यदि इस स्थिति में सुधार नहीं किया गया तो भविष्य में इन क्षेत्रों से बाघ पूरी तरह समाप्त हो सकते हैं।

केंद्र सरकार की नई रणनीति

नई योजना के तहत निम्नलिखित कदम उठाए जाएंगे

1. मजबूत स्रोत आबादी का संरक्षण

  • 13 प्रमुख टाइगर रिजर्व में बाघों की स्वस्थ आबादी को और मजबूत बनाया जाएगा।

2. 25 प्राथमिकता वाले टाइगर रिजर्व का पुनरुद्धार

  • इन रिजर्वों में विशेष ध्यान दिया जाएगा-आवास सुधार,शिकार प्रजातियों की संख्या बढ़ाना,सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करना और आवश्यकता होने पर बाघों का पुनर्प्रवेश

3. 'Recipient Sites' की पहचान

  • ऐसे टाइगर रिजर्व चिन्हित किए गए हैं जहां वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर भविष्य में बाघों को स्थानांतरित किया जा सकता है।

'मेटा-पॉपुलेशन' (Metapopulation) मॉडल पर जोर

  • विशेषज्ञों के अनुसार भारत में बाघों की संख्या लगभग 6% वार्षिक दर से बढ़ रही है।
  • लेकिन यदि अधिकांश बाघ केवल कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित रहेंगे, तो भविष्य में आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity) घट सकती है,मानव-बाघ संघर्ष बढ़ सकता है और स्थानीय स्तर पर विलुप्ति का खतरा बढ़ सकता है।
  • इसीलिए अब उद्देश्य केवल बाघों की संख्या बढ़ाना नहीं बल्कि पूरे परिदृश्य (Landscape) में उनके प्राकृतिक आवागमन को सुनिश्चित करना है।
  • इसके लिए टाइगर रिजर्व,आरक्षित वन और वन्यजीव गलियारे (Wildlife Corridors),मिश्रित उपयोग वाले वन क्षेत्रों को आपस में बेहतर ढंग से जोड़ा जाएगा ताकि बाघ विभिन्न आबादियों के बीच सुरक्षित रूप से आवागमन कर सकें।

58 टाइगर रिजर्व का वैज्ञानिक मूल्यांकन

  • राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने देश के सभी 58 टाइगर रिजर्वों का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया। इस मूल्यांकन में आवास (Habitat) की गुणवत्ता, शिकार प्रजातियों (Prey Base) की उपलब्धता तथा बाघों की वर्तमान आबादी को प्रमुख आधार बनाया गया। 
  • अध्ययन के आधार पर 25 टाइगर रिजर्व ऐसे चिन्हित किए गए, जहाँ इन तीनों में से एक या अधिक पहलुओं में सुधार की आवश्यकता है, ताकि वहां बाघों की स्थायी एवं स्वस्थ आबादी विकसित की जा सके।

किन क्षेत्रों पर सबसे अधिक ध्यान ?

  • मध्य भारत एवं पूर्वी घाट-यह क्षेत्र सर्वाधिक प्राथमिकता वाले टाइगर रिजर्व का समूह है, जहां व्यापक संरक्षण हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
  • उत्तर-पूर्वी भारत एवं ब्रह्मपुत्र बाढ़ मैदान-इन क्षेत्रों में विशाल वन क्षेत्र उपलब्ध हैं। यदि शिकार प्रजातियां, सुरक्षा व्यवस्था और जंगलों के बीच संपर्क बेहतर किया जाए तो यहां बाघों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है।

बाघ पुनर्प्रवेश कार्यक्रमों से मिले महत्वपूर्ण सबक

  • नई रिपोर्ट में पिछले एक दशक से अधिक समय के पुनर्प्रवेश कार्यक्रमों का विश्लेषण किया गया है।

सरिस्का टाइगर रिजर्व (राजस्थान)

  • वर्ष 2008 में भारत का पहला सफल बाघ पुनर्प्रवेश कार्यक्रम।
  • 2012 में यहां पहली बार पुनर्प्रवेशित बाघों से शावकों का जन्म हुआ।

पन्ना टाइगर रिजर्व (मध्य प्रदेश)

  • स्थानीय स्तर पर बाघ समाप्त होने के बाद पुनर्प्रवेश किया गया।
  • 2010 में पहली सफल प्रजनन घटना दर्ज हुई।
  • 2009 से अब तक कुल 10 बाघों का स्थानांतरण किया जा चुका है।
  • इसे भारत के सबसे सफल पुनर्प्रवेश कार्यक्रमों में गिना जाता है।

सतकोसिया टाइगर रिजर्व (ओडिशा)

  • यह परियोजना असफल रही क्योंकि स्थानीय समुदायों का विरोध था।
  • पशुधन पर हमलों से असंतोष बढ़ा।
  • स्थानांतरित एक नर बाघ की फंदे में फंसकर मृत्यु हो गई।

मुकुंदरा हिल्स (राजस्थान)

  • यहां पुनर्प्रवेश की प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी रही क्योंकि अपेक्षित स्तर पर प्रजनन सफलता नहीं मिल सकी।

सबसे बड़ा सबक

केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि टाइगर पुनर्प्रवेश (Tiger Reintroduction) संरक्षण का अंतिम विकल्प (Last Resort) होना चाहिए। इसे तभी लागू किया जाना चाहिए जब संबंधित क्षेत्र में उपयुक्त आवास, पर्याप्त शिकार प्रजातियां, मजबूत सुरक्षा व्यवस्था, स्थानीय समुदायों का सहयोग तथा अनुकूल सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां उपलब्ध हों। सरकार का मानना है कि केवल वैज्ञानिक योजना बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्थानीय लोगों की सहभागिता, विश्वास और समर्थन ही किसी भी बाघ पुनर्प्रवेश कार्यक्रम की दीर्घकालिक सफलता सुनिश्चित करते हैं।

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