चर्चा में क्यों ?
हाल ही में साइंस (Science) पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन ने पृथ्वी के विशाल भूमिगत आर्बस्कुलर माइकोराइज़ल (AM) कवक नेटवर्क का पहला वैश्विक मानचित्र प्रस्तुत किया है। यह शोध उन सूक्ष्म लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण जीवों की व्यापकता को उजागर करता है, जो करोड़ों वर्षों से पौधों के अस्तित्व और विकास में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। इसके बावजूद, अब तक इनके वास्तविक विस्तार और वैश्विक वितरण के बारे में सीमित जानकारी ही उपलब्ध थी।
प्रमुख खोज
- अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने मशीन लर्निंग तकनीक और 16,000 से अधिक मृदा नमूनों (Soil Cores) से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण किया।
- इसके आधार पर ज्ञात हुआ कि विश्वभर की ऊपरी मिट्टी में लगभग 110 क्वाड्रिलियन किलोमीटर लंबी कवकीय हाइफ़ा फैली हुई हैं। यह दूरी पृथ्वी और सूर्य के बीच लगभग एक अरब यात्राओं के बराबर है, जो इस भूमिगत नेटवर्क के विशाल पैमाने को दर्शाती है।
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आर्बुस्कुलर माइकोराइज़ल कवक (एएमएफ) के बारे में
- आर्बुस्कुलर माइकोराइज़ल कवक मिट्टी में पाए जाने वाले कवकों का एक समूह है जो दुनिया भर में लगभग हर जगह मौजूद होते हैं।
- ये कवक कई पौधों की प्रजातियों की जड़ों में बसकर और राइजोस्फी में हाइफे बनाकर उनके साथ सहजीवन बनाते हैं।
- एएमएफ और पौधों के बीच का संबंध आम तौर पर पारस्परिक रूप से लाभकारी सहजीवन होता है, जिसके लाभ शारीरिक, पोषण संबंधी, पारिस्थितिक या इन प्रक्रियाओं के किसी भी संयोजन के रूप में हो सकते हैं।
- ये कवक मिट्टी की स्थिरता बढ़ाने सहित कई पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं में भी सहयोग करते हैं।
- ये कवक अनिवार्य सहजीवी हैं; ये पौधों की जड़ों से जुड़े बिना जीवित नहीं रह सकते क्योंकि ये ऊर्जा के लिए मेजबान पौधों से प्राप्त कार्बन पर निर्भर होते हैं और एक अद्वितीय विकासवादी वंश बनाते हैं जिसे ग्लोमेरोमाइकोटा संघ के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
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कार्बन भंडारण में महत्वपूर्ण योगदान
शोध के अनुसार, इन आर्बस्कुलर माइकोराइज़ल कवकीय नेटवर्कों में लगभग 30 करोड़ टन कार्बन संचित है। यह मात्रा पूरी मानव आबादी के कुल भार की तुलना में लगभग चार से छह गुना अधिक है। इससे स्पष्ट होता है कि ये कवक वैश्विक कार्बन भंडारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
पौधों के साथ सहजीवी संबंध और कार्बन अवशोषण
- आर्बस्कुलर माइकोराइज़ल कवक विश्व की लगभग 70 प्रतिशत पादप प्रजातियों के साथ सहजीवी संबंध स्थापित करते हैं। इस प्रक्रिया में पौधों से कार्बन प्राप्त करने के बदले वे उन्हें आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं।
- इसी जैविक साझेदारी के परिणामस्वरूप ये नेटवर्क प्रतिवर्ष लगभग 4 अरब टन CO₂-समतुल्य कार्बन का अवशोषण करते हैं, जो मानव गतिविधियों से होने वाले कुल कार्बन उत्सर्जन का लगभग 11 प्रतिशत है।
जैव-विविधता के प्रमुख हॉटस्पॉट
- अध्ययन ने उन क्षेत्रों की भी पहचान की है जहाँ आर्बस्कुलर माइकोराइज़ल कवकों की सर्वाधिक सघन उपस्थिति पाई जाती है।
- दक्षिण सूडान, तिब्बती पठार और भारत का बन्नी घासस्थल (Banni Grasslands) जैसे घासभूमि पारितंत्रों में विश्व के लगभग 40 प्रतिशत आर्बस्कुलर माइकोराइज़ल कवकीय नेटवर्क मौजूद हैं। वस्तुतः इस कारण ये क्षेत्र जैव-विविधता के महत्वपूर्ण केंद्र माने जाते हैं।
घासभूमि पारितंत्रों पर बढ़ता खतरा
- हालाँकि, शोधकर्ताओं ने इन पारितंत्रों के सामने मौजूद खतरों को लेकर भी चिंता व्यक्त की है। अध्ययन में पाया गया कि कृषि भूमि में कवकीय घनत्व सामान्यतः प्राकृतिक या जंगली पारितंत्रों की तुलना में लगभग 50 प्रतिशत कम होता है।
- इसके अतिरिक्त, घासभूमियों को कृषि भूमि में परिवर्तित करने की प्रक्रिया वनों की तुलना में चार गुना अधिक तेजी से हो रही है, जिससे ये पारितंत्र गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं।
पर्यावरणीय नीति और जलवायु कार्रवाई में महत्व
- सोसायटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ अंडरग्राउंड नेटवर्क्स (SPUN) ने इस व्यापक भूमिगत संरचना को जीवित अवसंरचना (Living Infrastructure) की संज्ञा दी है।
- अध्ययन के माध्यम से इस नेटवर्क के वास्तविक विस्तार का आकलन कर शोधकर्ताओं ने यह रेखांकित किया है कि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी नीतियों में कवकों की भूमिका को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए।
- यह शोध पर्यावरणीय विमर्श में कवकों को हाशिये से निकालकर जलवायु कार्रवाई के केंद्र में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।