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अयोध्या के राम मंदिर में दान प्रबंधन की जाँच

संदर्भ  

  • अयोध्या स्थित राम मंदिर में हाल ही में दान की कथित चोरी के आरोपों ने देशभर में मंदिरों में दान प्रबंधन की व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है। इस घटना के बाद यह प्रश्न अधिक प्रासंगिक हो गया है कि देश के बड़े धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित नकदी, सोना, चाँदी और बहुमूल्य आभूषणों का प्रबंधन किस प्रकार किया जाता है तथा इनकी सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए किस प्रकार की संस्थागत व्यवस्था अपनाई जाती है। 
  • भारत के प्रमुख मंदिरों- तिरुपति, जगन्नाथ पुरी, माता वैष्णो देवी, सिद्धिविनायक और काशी विश्वनाथ में प्रतिवर्ष श्रद्धालुओं से सैकड़ों करोड़ रुपये की नकद राशि प्राप्त होती है। इसके अलावा बड़ी मात्रा में सोना, चाँदी और अन्य बहुमूल्य आभूषण भी दानस्वरूप मिलते हैं। इतनी विशाल मात्रा में प्राप्त होने वाले दान के कारण इन मंदिरों में वित्तीय प्रबंधन और जवाबदेही की मजबूत व्यवस्था विकसित की गई है। 

दान प्रबंधन की सामान्य प्रक्रिया  

  • देश के अधिकांश बड़े मंदिरों में दान के प्रबंधन की मूल प्रक्रिया लगभग एक जैसी होती है। श्रद्धालुओं द्वारा हुंडी या दान पात्र में डाली गई राशि को सबसे पहले अधिकृत अधिकारियों की उपस्थिति में निकाला जाता है। इसके बाद दान को सुरक्षित तरीके से गणना केंद्र तक पहुँचाया जाता है, जहाँ नकदी, सिक्कों तथा आभूषणों को अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया जाता है। उनकी गिनती और अभिलेखीकरण के पश्चात नकद राशि संबंधित बैंक खातों में जमा कर दी जाती है। इस पूरी प्रक्रिया पर सीसीटीवी कैमरों के माध्यम से लगातार निगरानी रखी जाती है। 
  • यद्यपि दान की गणना और जमा करने की प्रक्रिया अधिकांश मंदिरों में लगभग समान है, लेकिन वास्तविक अंतर उस संस्थागत ढाँचे में दिखाई देता है जिसके माध्यम से इन प्रक्रियाओं का संचालन किया जाता है। 
  • प्रत्येक मंदिर में यह व्यवस्था अलग हो सकती है कि दान की निगरानी कौन करेगा, कर्मचारियों की नियुक्ति किस प्रकार होगी तथा वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कौन-से कानूनी और प्रशासनिक प्रावधान लागू होंगे।  

विभिन्न प्रमुख मंदिरों में दान प्रबंधन की व्यवस्था 

1. अयोध्या का राम मंदिर

  • अयोध्या के राम मंदिर में दान प्रबंधन पूरी तरह ट्रस्ट आधारित प्रणाली के अंतर्गत संचालित होता है। 
  • यहाँ लगभग 35 हुंडियों को ट्रस्ट के अधिकारियों और भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के प्रतिनिधि की उपस्थिति में खोला जाता है। 
  • इसके बाद दान को पिलग्रिम फैसिलिटेशन सेंटर स्थित गणना कक्ष में ले जाया जाता है, जहाँ एसबीआई द्वारा नियुक्त आउटसोर्स कर्मचारियों तथा ट्रस्ट के कर्मचारियों द्वारा एक सेवानिवृत्त बैंकर की देखरेख में नकदी और आभूषणों की गणना की जाती है। पूरी प्रक्रिया की अंतिम जिम्मेदारी ट्रस्ट के एक सदस्य के पास रहती है तथा सत्यापन के बाद राशि ट्रस्ट के एसबीआई खाते में जमा कर दी जाती है। 

2. तिरुपति मंदिर

  • तिरुपति मंदिर में दान प्रबंधन अत्यंत विकसित और बहुस्तरीय संस्थागत व्यवस्था के माध्यम से संचालित होता है। यहाँ प्रसिद्ध परकामनी प्रणाली के अंतर्गत तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् (टीटीडी) के स्थायी वित्तीय कर्मचारी, राष्ट्रीयकृत बैंकों के प्रतिनिधि तथा सत्यापित स्वयंसेवक संयुक्त रूप से दान की गणना करते हैं। 
  • इन स्वयंसेवकों में मुख्य रूप से वर्तमान अथवा सेवानिवृत्त सरकारी एवं बैंक कर्मचारी शामिल होते हैं। पूरी व्यवस्था पर मंदिर का सतर्कता विभाग सीसीटीवी नेटवर्क के माध्यम से निगरानी रखता है। कर्मचारियों के लिए बिना जेब वाले वस्त्र पहनना, प्रवेश और निकास के समय तलाशी देना तथा नकदी को बख्तरबंद वाहनों से परिवहन करना जैसी व्यवस्थाएँ सुरक्षा को और मजबूत बनाती हैं।

3. जगन्नाथ मंदिर, पुरी

  • जगन्नाथ मंदिर, पुरी में दान प्रबंधन की प्रक्रिया विधिक प्रावधानों के अनुरूप संचालित होती है। यहाँ हुंडियाँ मंदिर प्रशासक अथवा किसी राजपत्रित अधिकारी की उपस्थिति में खोली जाती हैं तथा प्रबंध समिति का एक सदस्य स्वतंत्र गवाह के रूप में मौजूद रहता है। 
  • प्रत्येक हुंडी को खोलने से पहले और बाद में सील किया जाता है, सभी विवरण वैधानिक अभिलेखों में दर्ज किए जाते हैं और पूरी प्रक्रिया सीसीटीवी निगरानी में संपन्न होती है। मंदिर प्रशासन ने डिजिटल माध्यम से दान प्राप्त करने की व्यवस्था भी विकसित की है।

4. माता वैष्णो देवी मंदिर

  • माता वैष्णो देवी मंदिर में दान प्रबंधन अपेक्षाकृत कॉरपोरेट शैली के प्रशासनिक मॉडल पर आधारित है। यहाँ दान पात्रों को किसी एक ट्रस्टी के बजाय लेखा अधिकारियों, क्षेत्रीय प्रबंधकों तथा सुरक्षा अधिकारियों की समिति खोलती है। वित्त, सुरक्षा और संचालन के लिए अलग-अलग विभाग कार्यरत हैं, जो श्राइन बोर्ड के अधीन संचालित होते हैं।  
  • पर्वतीय क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दान के सुरक्षित परिवहन के लिए हेलीकॉप्टर सहित विशेष परिवहन साधनों का उपयोग भी किया जाता है।

5. सिद्धिविनायक मंदिर, मुंबई

  • मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर में दान की गणना की पारदर्शिता पर विशेष बल दिया गया है। प्रत्येक गुरुवार को मुख्य हुंडी कार्यकारी अधिकारी, ट्रस्टी, बैंक प्रतिनिधि और लेखा परीक्षक की उपस्थिति में खोली जाती है। पूरी प्रक्रिया सीसीटीवी निगरानी में संपन्न होती है ताकि प्रत्येक चरण का स्वतंत्र सत्यापन सुनिश्चित किया जा सके।

6. काशी विश्वनाथ मंदिर 

  • काशी विश्वनाथ मंदिर की व्यवस्था में जिला प्रशासन की प्रत्यक्ष भागीदारी देखने को मिलती है। मंदिर की 56 दान पेटियाँ उप-जिलाधिकारी (एसडीएम) की देखरेख में खोली जाती हैं। दान की गणना बैंक अधिकारियों और एक सेवानिवृत्त राजपत्रित अधिकारी की उपस्थिति में होती है। 
  • बैंक में जमा राशि की रसीदें लेखा-परीक्षण का आधार बनती हैं, जबकि प्राप्त आभूषणों का मूल्यांकन सरकार द्वारा अनुमोदित मूल्यांककों से कराया जाता है। 

राम मंदिर का संस्थागत ढाँचा क्यों अलग माना जाता है ?  

  • राम मंदिर और अन्य प्रमुख मंदिरों के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर उनकी संस्थागत संरचना में दिखाई देता है। देश के अधिकांश बड़े और पुराने मंदिर विशेष राज्य कानूनों के अंतर्गत संचालित होते हैं। 
  • तिरुपति मंदिर आंध्र प्रदेश के धार्मिक एवं धर्मार्थ संस्थानों से संबंधित अधिनियम के अधीन है, जबकि जगन्नाथ मंदिर, वैष्णो देवी और काशी विश्वनाथ भी अपने-अपने विशेष अधिनियमों के अनुसार संचालित होते हैं। सिद्धिविनायक मंदिर महाराष्ट्र के ट्रस्ट संबंधी कानूनों के अधीन कार्य करता है।
  • इन अधिनियमों के माध्यम से शासी निकायों का गठन, प्रशासकों की शक्तियाँ, वित्तीय प्रक्रियाएँ, सरकारी निगरानी तथा वैधानिक लेखा-परीक्षण की व्यवस्था स्पष्ट रूप से निर्धारित की जाती है।
  • इसके विपरीत, श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र किसी विशेष कानून के तहत गठित संस्था नहीं है, बल्कि एक ट्रस्ट डीड के आधार पर संचालित होता है। परिणामस्वरूप दैनिक प्रशासन, नियुक्तियाँ और वित्तीय प्रबंधन मुख्य रूप से ट्रस्ट के भीतर ही केंद्रित रहते हैं।

प्रबंधन प्रणाली में अंतर 

  • अन्य बड़े मंदिरों में वित्तीय प्रक्रियाओं की निगरानी कार्यकारी अधिकारियों, वैधानिक प्रशासकों, सरकारी नामित सदस्यों, मजिस्ट्रेटों तथा लेखा परीक्षकों जैसे अधिकारियों द्वारा की जाती है, जिनकी भूमिकाएँ कानून द्वारा निर्धारित होती हैं। 
  • दूसरी ओर, राम मंदिर में दान प्रबंधन से जुड़े अनेक प्रमुख पदाधिकारियों का लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अथवा उससे संबद्ध संगठनों से जुड़ाव रहा है। इस कारण निर्णय लेने और वित्तीय प्रबंधन की जिम्मेदारी अपेक्षाकृत सीमित ट्रस्ट संरचना के भीतर केंद्रित रहती है।  

आंतरिक लेखा-परीक्षण में उजागर हुई कमियाँ 

  • राम मंदिर की संस्थागत व्यवस्था को लेकर प्रश्न इसलिए भी उठते रहे हैं क्योंकि नवंबर 2020 में ट्रस्ट द्वारा कराए गए एक निजी आंतरिक लेखा-परीक्षण में प्रबंधन प्रणाली को अत्यधिक  गैर-पेशेवर बताया गया था। 
  • इस रिपोर्ट में व्यवस्थित वित्तीय रिपोर्टिंग के अभाव की ओर संकेत करते हुए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी), स्पष्ट प्रशासनिक पदानुक्रम, औपचारिक मानव संसाधन प्रक्रियाएँ, आभूषणों का व्यवस्थित रजिस्टर तथा लेखांकन और सूचना प्रौद्योगिकी निगरानी को सुदृढ़ बनाने जैसी सिफारिशें की गई थीं। 

सार्वजनिक लेखा-परीक्षण का प्रश्न 

  • एक अन्य महत्वपूर्ण अंतर यह भी है कि अनेक प्रमुख मंदिर बोर्डों के विपरीत राम मंदिर ट्रस्ट पर राज्य अथवा केंद्र सरकार द्वारा अनिवार्य वित्तीय लेखा-परीक्षण की व्यवस्था लागू नहीं होती। सार्वजनिक लेखा-परीक्षण और निगरानी से जुड़े प्रश्न न्यायालयों तक पहुँच चुके हैं। 
  • साथ ही, ट्रस्ट ने अब तक सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं किया है कि वर्ष 2020 के आंतरिक लेखा-परीक्षण में सुझाए गए सभी सुधारों को पूर्ण रूप से लागू किया गया है या नहीं। 

निष्कर्ष 

  • देश के लगभग सभी प्रमुख मंदिर समय-समय पर किसी न किसी विवाद का सामना करते रहे हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि मजबूत संस्थागत व्यवस्थाएँ और जवाबदेही के प्रभावी तंत्र एक ही समय में विकसित नहीं होते, बल्कि अनुभवों और पूर्व में सामने आई कमियों के आधार पर धीरे-धीरे परिपक्व होते हैं।
  • बहुस्तरीय निगरानी, विधिक प्रक्रियाओं का पालन, स्वतंत्र सत्यापन तथा वैधानिक जवाबदेही जैसी व्यवस्थाएँ भी समय के साथ सुदृढ़ हुई हैं। 
  • ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अयोध्या के राम मंदिर में दान प्रबंधन को लेकर चल रही वर्तमान जाँच भविष्य में किस प्रकार के संस्थागत सुधारों का मार्ग प्रशस्त करती है। यदि इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप पारदर्शिता और जवाबदेही को और मजबूत करने वाले सुधार लागू होते हैं, तो यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण और दीर्घकालिक प्रभाव माना जा सकता है।
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