भारत की 2026 की अध्यक्षता में ब्रिक्स (BRICS) समूह ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग एवं संधारणीयता के लिए निर्माण (Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability)’ विषय के साथ वैज्ञानिक सहयोग को अधिक मजबूत करने की दिशा में प्रयासरत है।
यह दिशा 17वें ब्रिक्स सम्मेलन में लिए गए निर्णयों से प्रेरित है जहाँ सदस्य देशों ने डिजिटल असमानता और जलवायु लचीलापन जैसी वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने के लिए विस्तारित सदस्यता के उपयोग पर बल दिया।
BRICS में वैज्ञानिक सहयोग: एक परिचय
BRICS के अंतर्गत वैज्ञानिक सहयोग एक महत्वपूर्ण रणनीतिक आधार है जिसका उद्देश्य सदस्य देशों की अनुसंधान और तकनीकी क्षमताओं को एकजुट कर बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को बढ़ावा देना है।
समय के साथ यह सहयोग केवल बुनियादी विज्ञान तक सीमित नहीं रहा है बल्कि अब नवाचार-आधारित तंत्र और तकनीकी हस्तांतरण पर केंद्रित हो गया है जिससे वैश्विक दक्षिण की पश्चिमी देशों पर निर्भरता कम की जा सके।
अब तक की प्रमुख पहलें
रणनीतिक ढांचा : वर्ष2015 में हुए समझौता ज्ञापन ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार (STI) को सहयोग का केंद्रीय स्तंभ बनाया, जिससे संयुक्त अनुसंधान के लिए संस्थागत ढांचा तैयार हुआ।
कार्ययोजनाएँ : वर्ष 2017–2020 की BRICS नवाचार कार्ययोजना के तहत उद्यमिता नेटवर्क को बढ़ावा देने के साथ-साथ विज्ञान और तकनीक में महिलाओं एवं युवाओं की भागीदारी को प्रोत्साहित किया गया।
संस्थागत व्यवस्थाएँ :BRICS टेक्नोलॉजी ट्रांसफर सेंटर (TTC) और iBRICS पहल के माध्यम से विभिन्न देशों के बीच तकनीकी हस्तांतरण और व्यावसायीकरण को गति मिली।
क्षेत्रीय सहयोग :वर्ष2021 में अंतरिक्ष क्षेत्र में अंतर-सरकारी समझौता तथा सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के लिए ब्रिक्स इंस्टीट्यूट ऑफ फ्यूचर नेटवर्क्स (BRICS Institute of Future Networks) की स्थापना उल्लेखनीय उपलब्धियां हैं।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सहयोग की आवश्यकता
साझा सामाजिक चुनौतियाँ :ऊर्जा, जल और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में समान समस्याओं के समाधान के लिए सहयोग अनिवार्य है। उदाहरण: कोविड-19 के दौरान वैक्सीन अनुसंधान, जैव सुरक्षा और डिजिटल स्वास्थ्य में संयुक्त प्रयास।
तकनीकी आत्मनिर्भरता :सदस्य देश पश्चिमी तकनीकों पर निर्भरता कम करने के लिए सामूहिक क्षमताओं का निर्माण करना चाहते हैं। उदाहरण: वर्ष 2022 में BRICS+ पहल ने वैश्विक दक्षिण के देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा दिया।
वैश्विक आर्थिक शासन में भूमिका :STI सहयोग के माध्यम से सदस्य देश वैश्विक विकास वित्त और नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। उदाहरण: न्यू डेवलपमेंट बैंक जैसे संस्थानों में सामूहिक प्रभाव।
उभरती तकनीकों का नियमन :नई तकनीकों के लिए संतुलित और समावेशी नीतियां विकसित करना आवश्यक है। उदाहरण: वर्ष 2025 की AI घोषणा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को वैश्विक शासन के केंद्र में रखा गया।
भू-राजनीतिक दबावों का समाधान : साझा वैज्ञानिक सहयोग देशों को वैश्विक तनाव, प्रतिबंधों एवं तकनीकी नियंत्रणों से निपटने में मदद करता है।
प्रमुख चुनौतियाँ
असमान भागीदारी : BRICS+ के विस्तार के बाद सभी सदस्य समान रूप से सक्रिय नहीं हैं। उदाहरण: हाल के प्रस्तावों में केवल मिस्र और ईरान की भागीदारी।
नवाचार में अंतर :अधिकांश सदस्य देशों का अनुसंधान व्यय विकसित देशों की तुलना में कम है। उदाहरण: चीन को छोड़कर अन्य देशों का R&D निवेश अपेक्षाकृत कम है।
विविध हित और क्षमताएँ :सदस्य देशों के विकास स्तर और वैज्ञानिक क्षमता में अंतर के कारण साझा रणनीति बनाना चुनौतीपूर्ण होता है।
अवसंरचना की सीमाएँ : महंगे अनुसंधान क्षेत्रों में साझा संसाधनों की कमी के कारण प्रगति धीमी है। उदाहरण: महासागर और ध्रुवीय अनुसंधान।
संस्थागत अस्थिरता :स्थायी प्रबंधन तंत्र की कमी से दीर्घकालिक योजनाओं का क्रियान्वयन प्रभावित होता है। उदाहरण: हर वर्ष बदलने वाली अध्यक्षता प्रणाली।
आगे की दिशा
स्थायी ढांचे की स्थापना :EU के होराइजन कार्यक्रम की तर्ज पर एक केंद्रीय सचिवालय स्थापित किया जाए, जो परियोजनाओं के दीर्घकालिक प्रबंधन और निगरानी का कार्य कर सके।
मेगा-साइंस परियोजनाएँ :बड़े और दीर्घकालिक वैज्ञानिक प्रोजेक्ट शुरू कर संस्थागत सहयोग को गहरा किया जाए।
समावेशी क्षमता निर्माण :नए BRICS+ देशों की नवाचार क्षमताओं को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया जाए।
तकनीकी शासन पर अनुसंधान :उभरती तकनीकों के प्रभाव और उनके नियमन पर शोध को बढ़ावा दिया जाए।
प्रभाव का विस्तार :छोटे नेटवर्क से आगे बढ़कर बायोटेक, जलवायु तकनीक और औद्योगिक नवाचार जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर परियोजनाएँ लागू की जाएं।
निष्कर्ष
ब्रिक्स ने बुनियादी विज्ञान से आगे बढ़कर समाजोपयोगी नवाचार की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। फिर भी, वर्तमान घूर्णन आधारित ढांचा दीर्घकालिक आवश्यकताओं को पूरा करने में सीमित साबित हो सकता है।
भारत की वर्ष 2026 की अध्यक्षता इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है जिसके माध्यम से एक स्थायी और प्रभावी तंत्र विकसित कर BRICS+ समूह के भीतर नवाचार के अंतर को कम किया जा सकता है।