संदर्भ
- हाल के समय में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की टिप्पणियों ने प्रचलित तथाकथित ‘बुलडोज़र न्याय’ की प्रवृत्ति को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। इस व्यवस्था में अपराध के आरोप सामने आते ही संबंधित व्यक्तियों की संपत्तियों को ध्वस्त करने की कार्रवाई की जाती है।
- आलोचकों का कहना है कि ऐसी दंडात्मक कार्यवाही संविधान द्वारा निर्धारित क्रम—आरोप, जाँच, न्यायिक परीक्षण और दंड को दरकिनार कर देती है तथा कार्यपालिका के विवेक को बिना विधिसम्मत प्रक्रिया के दंड में परिवर्तित कर देती है।
- हालाँकि, सर्वोच्च न्यायलय ने वर्ष 2024 में अवैध ध्वस्तीकरण के विरुद्ध स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए थे, फिर भी इस प्रकार की घटनाओं का जारी रहना लोकतांत्रिक ढाँचे में कार्यपालिका की शक्तियों और संवैधानिक संरक्षणों के बीच जारी तनाव को उजागर करता है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष वर्तमान मामला
- हमीरपुर जिले के एक परिवार ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की शरण ली, जब उनके एक संबंधी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने के तुरंत बाद प्रशासन ने उनके आवास और व्यावसायिक प्रतिष्ठान को गिराने की चेतावनी दी।
- याचिकाकर्ता स्वयं आरोपी नहीं थे, इसके बावजूद एफआईआर दर्ज होते ही नगर निकाय द्वारा नोटिस जारी कर संपत्तियों को सील कर दिया गया।
न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ
दंडाधिकार केवल न्यायपालिका का
खंडपीठ ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि इस प्रकार के ध्वस्तीकरण की घटनाएँ सामान्य होती जा रही हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दंड निर्धारित करना और देना न्यायपालिका का विशेषाधिकार है, प्रशासनिक अधिकारियों का नहीं।
संवैधानिक पहलुओं पर प्रश्न
न्यायालय ने पाँच महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए। इनमें यह भी शामिल था कि क्या ऐसी कार्रवाइयाँ सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का उल्लंघन करती हैं तथा क्या वे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का अतिक्रमण करती हैं।
ध्वस्तीकरण से संबंधित विधिक प्रावधान
- उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 और उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 जैसे अधिनियमों के अंतर्गत प्राधिकरणों को अवैध निर्माण हटाने का अधिकार प्राप्त है। परंतु किसी भी ध्वस्तीकरण से पहले निर्धारित विधिक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है, जिसमें शामिल हैं-
- उल्लंघन की स्पष्ट पहचान
- कारणों का उल्लेख करते हुए लिखित नोटिस
- जवाब देने का अवसर
- आपत्तियों पर विचार
- कारणयुक्त और विधिसम्मत आदेश
- इसके अतिरिक्त, अपील करने और नियमितीकरण का अवसर भी उपलब्ध रहता है।
कार्यपालिका की शक्तियों की सीमाएँ
- नगर निगम से संबंधित कानून मूलतः नियामक प्रकृति के होते हैं, न कि दंडात्मक। ये कानून आपराधिक दोष निर्धारित करने का माध्यम नहीं हैं।
- सिर्फ एफ.आई.आर. दर्ज होने मात्र से कोई संपत्ति अवैध घोषित नहीं हो जाती है और न ही तत्काल ध्वस्तीकरण का आधार बनता है।
- ध्वस्तीकरण एक अंतिम नियामक उपाय है और इसे न्यायिक दंड के विकल्प के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता है।
ध्वस्तीकरण पर न्यायालय के दिशा-निर्देश
- In Re: Directions in the Matter of Demolition of Structures (2024) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि संपत्ति का स्वामी किसी अपराध का आरोपी है, उसकी संपत्ति को ध्वस्त नहीं किया जा सकता है।
- आपराधिक दोष सिद्धि केवल विधिवत न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही संभव है।
नगर निकाय शक्तियों की परिधि
नियामक शक्ति, दंड का माध्यम नहीं
यद्यपि नगर निकायों को अवैध निर्माण हटाने की शक्ति प्राप्त है, परंतु इन शक्तियों का उपयोग दंडात्मक उद्देश्य से नहीं किया जा सकता है। ऐसा करना निर्दोषता की धारणा और विधि के शासन को कमजोर करता है।
विधिक आधार से अधिक उद्देश्य की जाँच
न्यायालय केवल प्रयुक्त विधिक प्रावधानों को नहीं देखते हैं, बल्कि कार्रवाई के पीछे की मंशा और समय-सीमा की भी समीक्षा करते हैं। यदि एफआईआर के तुरंत बाद आरोपी से जुड़े व्यक्तियों को लक्षित करते हुए ध्वस्तीकरण किया जाता है तो यह दंडात्मक उद्देश्य का संकेत दे सकता है।
रंगरूपित शक्ति प्रयोग (Colourable Exercise of Power)
- यदि विधिसम्मत नगर निगम शक्तियों का प्रयोग किसी अवैध या अप्रत्यक्ष उद्देश्य से मुकदमे से पूर्व दंड देने के लिए किया जाए, तो इसे ‘रंगरूपित शक्ति प्रयोग’ कहा जाता है।
- ऐसी स्थिति में शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत कमजोर पड़ता है और कार्यपालिका उन परिणामों को लागू करने लगती है जो न्यायपालिका के लिए सुरक्षित हैं।
- केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को उसके आवास या आजीविका से वंचित करना विधिक प्रक्रिया, निर्दोषता की धारणा और शक्तियों के पृथक्करण जैसे मूल संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन है।
व्यापक संवैधानिक प्रभाव
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय की पहल यह महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है कि क्या मात्र ध्वस्तीकरण की धमकी भी मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण हो सकती है; निवारक न्यायिक राहत के मानक क्या होने चाहिए और नगर निकाय शक्तियों के दुरुपयोग की स्थिति में उत्तरदायित्व कैसे तय किया जाए।
- ये प्रश्न केवल सैद्धांतिक नहीं हैं। ध्वस्तीकरण से परिवारों को तत्काल और अपूरणीय क्षति पहुँच सकती है, भले ही बाद में वे निर्दोष सिद्ध हों। इससे निष्पक्ष शासन और विधि के शासन पर जनता का विश्वास भी प्रभावित होता है।
विनियमन और अधिकारों के बीच संतुलन की आवश्यकता
संवैधानिक मर्यादाओं में कानून का पालन
शहरी निकायों का दायित्व है कि वे निर्माण संबंधी नियमों को लागू करें और शहरी व्यवस्था बनाए रखें, परंतु यह सब संवैधानिक सीमाओं और प्रशासनिक निष्पक्षता के अंतर्गत ही होना चाहिए।
विधिक प्रक्रिया का महत्व
संविधान यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी व्यक्ति को विधिसम्मत प्रक्रिया के बिना संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता है। इसमें नोटिस, सुनवाई, कारणयुक्त आदेश और न्यायिक समीक्षा जैसे तत्व शामिल हैं। निर्णय से पूर्व ध्वस्तीकरण इस क्रम को उलट देता है और विधिक प्रक्रिया को कमजोर करता है।
विनियमन और दंड में स्पष्ट अंतर
बुलडोज़र शहरी प्रशासन का एक वैध नियामक साधन हो सकता है परंतु इसे दोष निर्धारित करने या दंड देने के औजार के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता है। जब नियामक शक्तियों को दंडात्मक रूप में इस्तेमाल किया जाता है तो वे विधिक रूप से अस्थिर हो जाती हैं और विधि के शासन के लिए खतरा उत्पन्न करती हैं।