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कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइजेशन

संदर्भ 

आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के संकट से जूझ रही है, भारत ने एक साहसिक लक्ष्य निर्धारित किया है—वर्ष 2070 तक 'नेट-जीरो' उत्सर्जन। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम विकास की गति को धीमा किए बिना इसे हासिल कर सकते हैं? उत्तर शायद उस धुएं में छिपा है जिसे हम अब तक 'कचरा' समझते आए हैं। कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइजेशन (CCU) वह जादुई तकनीक है जो कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) को प्रदूषक से बदलकर एक मूल्यवान संसाधन बनाने की क्षमता रखती है। 

कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइजेशन (CCU) क्या है ? 

  • कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइजेशन (CCU) उन तकनीकों का समुच्चय है जिनके माध्यम से  औद्योगिक इकाइयों या सीधे वातावरण से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को एकत्रित कर उसे उपयोगी वस्तुओं में परिवर्तित किया जाता है।
  • इस प्रक्रिया के तहत वायुमंडल से हटाए गए कार्बन को ईंधन, रसायन, निर्माण सामग्री तथा पॉलिमर जैसे उत्पादों के कच्चे माल के रूप में पुनः आर्थिक तंत्र में शामिल किया जाता है।
  • यह Carbon Capture and Storage (CCS) से भिन्न है, क्योंकि CCS में एकत्रित CO₂ को जमीन के भीतर स्थायी रूप से जमा कर दिया जाता है, जबकि CCU में उसी कार्बन का पुनः उत्पादक उपयोग किया जाता है।

भारत को CCU की आवश्यकता क्यों है ? 

  • भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा CO₂ उत्सर्जक बना हुआ है। देश में उत्सर्जन मुख्य रूप से निम्न क्षेत्रों से उत्पन्न होता है:
    • बिजली उत्पादन
    • सीमेंट निर्माण
    • इस्पात उद्योग
    • रासायनिक उद्योग 
  • यद्यपि नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत भविष्य में उत्सर्जन को कम करने में सहायक हो सकते हैं, फिर भी कई औद्योगिक प्रक्रियाएँ स्वभाव से ही कार्बन-प्रधान हैं और उन्हें पूर्णतः डीकार्बोनाइज करना आसान नहीं है।
  • ऐसे “हार्ड-टू-अबेट” क्षेत्रों में CCU उत्सर्जन में कमी लाने का एक व्यावहारिक और प्रभावी विकल्प प्रदान करता है।
  • यह पहल भारत के 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्य तथा परिपत्र एवं निम्न-कार्बन अर्थव्यवस्था के निर्माण की रणनीति के अनुरूप है। 

भारत की वर्तमान स्थिति 

भारत ने CCU को प्रोत्साहन देने की दिशा में शुरुआती लेकिन महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं:

1. अनुसंधान और विकास को बढ़ावा

  • Department of Science and Technology ने CCU तकनीकों के विकास हेतु एक समर्पित अनुसंधान एवं विकास रूपरेखा तैयार की है।

2. 2030 हेतु मसौदा रूपरेखा

  • Ministry of Petroleum and Natural Gas द्वारा प्रस्तुत 2030 के प्रारूप रोडमैप (CCUS) में उन संभावित परियोजनाओं को चिह्नित किया गया है जिन्हें इस क्षेत्र में लागू किया जा सकता है।

3. निजी क्षेत्र की भागीदारी

  • अंबुजा सीमेंट (अडानी समूह) भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (मुंबई) के साथ मिलकर एक इंडो-स्वीडिश पायलट परियोजना पर कार्य कर रही है, जिसके तहत संचित CO₂ को ईंधन और निर्माण सामग्री में बदला जा रहा है।
  • JK Cement एक परीक्षण मंच (टेस्टबेड) के माध्यम से CO₂ को कैप्चर कर हल्के कंक्रीट ब्लॉक्स तथा ओलेफिन जैसे उत्पादों में उपयोग करने की दिशा में सहयोग कर रही है।
  • Organic Recycling Systems Limited (ORSL) देश का पहला पायलट स्तर का Bio-CCU प्लेटफॉर्म विकसित कर रहा है, जहाँ बायोगैस से प्राप्त CO₂ को बायो-अल्कोहल और विशिष्ट रसायनों में परिवर्तित किया जा रहा है। 

अन्य देशों की पहलें

1. यूरोपीय संघ (EU)

  • यूरोपीय संघ की Bioeconomy Strategy और Circular Economy Action Plan CCU को बढ़ावा देने वाली प्रमुख नीतियाँ हैं। इनका उद्देश्य CO₂ को रसायनों, ईंधनों और सामग्रियों के कच्चे माल में बदलकर परिपत्रता और स्थिरता लक्ष्यों को साकार करना है। 
    • ArcelorMittal और Mitsubishi Heavy Industries, Ltd., क्लाइमेट टेक फर्म D-CRBN के सहयोग से बेल्जियम के गेंट स्थित संयंत्र में कैप्चर किए गए CO₂ को कार्बन मोनोऑक्साइड में परिवर्तित करने की तकनीक का परीक्षण कर रहे हैं। 

2. संयुक्त राज्य अमेरिका

  • अमेरिका CCU परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए कर प्रोत्साहन (टैक्स क्रेडिट) और वित्तीय सहायता प्रदान करता है, विशेषकर CO₂ आधारित ईंधन और रसायनों के उत्पादन हेतु। 

3. संयुक्त अरब अमीरात (UAE)

  • Al Reyadah परियोजना तथा प्रस्तावित CO₂-से-रसायन हब हरित हाइड्रोजन के साथ सीसीयू तकनीक का एकीकरण कर रहे हैं। 

संभावित चुनौतियाँ 

1. लागत संबंधी प्रतिस्पर्धा

  • CO₂ का संग्रहण, शोधन और रूपांतरण अत्यधिक ऊर्जा-आधारित और खर्चीला है। यदि पर्याप्त नीतिगत प्रोत्साहन न मिले, तो सीसीयू आधारित उत्पाद पारंपरिक जीवाश्म-आधारित विकल्पों से प्रतिस्पर्धा में पिछड़ सकते हैं।

2. अवसंरचना की अपर्याप्तता

  • सीसीयू के सफल कार्यान्वयन के लिए आवश्यक है: 
    • औद्योगिक इकाइयों का आपसी निकटता में होना
    • CO₂ के परिवहन की विश्वसनीय व्यवस्था
    • आगे की विनिर्माण प्रक्रियाओं के साथ समन्वय देश के सभी औद्योगिक क्षेत्रों में यह ढाँचा समान रूप से विकसित नहीं है।

3. स्पष्ट मानकों का अभाव

  • मानकीकरण, प्रमाणन प्रणाली और स्पष्ट बाजार संकेतों की कमी निवेशकों के लिए अनिश्चितता उत्पन्न करती है तथा CO₂-आधारित उत्पादों की मांग को सीमित करती है। 

निष्कर्ष

  • भारत ने CCU के लिए नीतिगत रूपरेखाएँ तैयार कर सकारात्मक शुरुआत की है।
    फिर भी, इन योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन, पर्याप्त नीति समर्थन और उद्योगों के बीच समन्वित प्रयासों के बिना जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करना कठिन होगा।
  • इस प्रकार, CCU न केवल उत्सर्जन घटाने का माध्यम है, बल्कि भारत के लिए हरित औद्योगिक विकास का एक महत्त्वपूर्ण अवसर भी प्रस्तुत करता है। 
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