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भारतीय परिवारों की बचत की बदलती प्रवृत्ति और स्वर्ण की ओर झुकाव

संदर्भ  

  • भारतीय परिवार अब अपनी बचत को पारंपरिक साधनों तक सीमित नहीं रख रहे हैं। म्यूचुअल फंड और शेयर बाज़ार में निवेश तेज़ी से बढ़ा है तथा वित्तीय संपत्तियों में इनकी हिस्सेदारी 2022–23 के 7% से बढ़कर 2024–25 में 15% तक पहुंच गई है। इसके विपरीत बैंक जमा में मामूली कमी देखी गई है। 
  • इसके बावजूद सोने के प्रति भारतीयों का पारंपरिक लगाव कमजोर नहीं हुआ है। जनवरी में सोने का आयात 12.07 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो दिसंबर के मुकाबले लगभग तीन गुना अधिक है। 
  • इस बढ़ती मांग का एक प्रमुख माध्यम गोल्ड एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ETF) बनकर उभरा है। यह रुझान दर्शाता है कि घरेलू बचत धीरे-धीरे औपचारिक वित्तीय साधनों की ओर बढ़ रही है, हालांकि इससे आयात दबाव भी बढ़ रहा है। 

गोल्ड ETF: एक छोटे विकल्प से मुख्यधारा निवेश तक 

  • गोल्ड ETF ऐसे म्यूचुअल फंड हैं जो निवेशकों के धन को सोने में लगाते हैं। भौतिक सोना खरीदने की तुलना में इनमें कई लाभ हैं-
    • शुद्धता की जांच की आवश्यकता नहीं 
    • भंडारण या सुरक्षा की चिंता नहीं और 
    • कम राशि से निवेश की सुविधा
  • निवेशकों से प्राप्त पूंजी के आधार पर फंड स्वयं स्वर्ण खरीदता है और उसका प्रबंधन करता है। 

जनवरी में ऐतिहासिक उछाल 

  • वर्ष 2007 में सीमित स्तर पर शुरू हुआ यह निवेश माध्यम अब बड़े पैमाने पर लोकप्रिय हो चुका है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, जनवरी में भारतीय गोल्ड ETF ने 15.52 टन सोना खरीदा, जो पिछले तीन महीनों की कुल खरीद के लगभग बराबर है।
  • AMFI के आँकड़ों के मुताबिक, गोल्ड ETF में शुद्ध निवेश बढ़कर 24,040 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। वहीं, इक्विटी म्यूचुअल फंड में निवेश 14% घटकर 24,029 करोड़ रुपये रह गया। 
  • यह पहली बार था जब गोल्ड ETF ने इक्विटी फंड से अधिक निवेश आकर्षित किया।
  • जनवरी में कुल सोना आयात (करीब 1.1 लाख करोड़ रुपये) का 22% हिस्सा ETF निवेश से संबंधित था। चांदी के मामले में यह अनुपात 52% तक पहुंच गया।

सट्टेबाज़ी और आर्थिक प्रभाव 

  • विशेषज्ञों का अनुमान है कि कीमती धातुओं में यह तेज़ी आंशिक रूप से सट्टा गतिविधियों से प्रेरित हो सकती है।
  • हालांकि, यह प्रवृत्ति भौतिक सोने से वित्तीय उत्पादों की ओर बदलाव को दर्शाता है, फिर भी यह आशंका बनी हुई है कि सोने में अत्यधिक निवेश चाहे वह डिजिटल या भौतिक रूप में हो—अर्थव्यवस्था से पूंजी के बाहर जाने का कारण बन सकता है। 

2008 के बाद का अनुभव: एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य 

  • वैश्विक वित्तीय संकट (2008) के बाद ऊंची मुद्रास्फीति, कमजोर रुपया और धीमी आर्थिक वृद्धि ने लोगों को सुरक्षित निवेश के रूप में स्वर्ण की ओर मोड़ दिया था।
  • उस समय आयात में तेज़ वृद्धि हुई, जिसके परिणामस्वरूप सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक को आयात नियंत्रण तथा भौतिक सोने की मांग को सीमित करने के उपाय अपनाने पड़े। 

सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड योजना: एक नीतिगत प्रयोग 

  • वर्ष 2015 में आरंभ की गई सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) योजना में निवेशकों को स्वर्ण की कीमत से जुड़ा प्रतिफल और अतिरिक्त 2.5% वार्षिक ब्याज दिया जाता था।
  • इस योजना के तहत लगभग 147 टन सोने के समकक्ष 72,274 करोड़ रुपये का निवेश हुआ, जिससे भौतिक आयात की आवश्यकता कम हुई।
  • हालाँकि, सोने की कीमतों में वृद्धि के कारण सरकार पर ब्याज और भुगतान का बोझ बढ़ता गया, जो लगभग 18,000 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष तक पहुंच गया। बढ़ते वित्तीय दबाव के चलते वर्ष 2024 की शुरुआत में यह योजना बंद कर दी गई। 

नई परिस्थितियों में उभरती चुनौतियाँ 

  • हालाँकि, फिलहाल मुद्रास्फीति नियंत्रण में है परंतु वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, नीतिगत अनिश्चितता और शेयर बाज़ार में असमान प्रदर्शन ने स्वर्ण को फिर से सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में लोकप्रिय बना दिया है।
  • जनवरी में गोल्ड ETF के माध्यम से बढ़े आयात ने भारत के वस्तु व्यापार घाटे को लगभग 35 अरब डॉलर तक पहुंचा दिया, जिससे व्यापक आर्थिक चिंताएँ सामने आईं।
  • ऐसे में सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड योजना को संशोधित रूप में पुनः शुरू करना संभवतः चांदी और अन्य धातुओं को शामिल करते हुए आयात दबाव को कम करने और निवेशकों को व्यवस्थित विकल्प प्रदान करने का एक प्रभावी उपाय हो सकता है।
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