संदर्भ
भारत प्रतिवर्ष लगभग 26.4 अरब डॉलर रसोई गैस (LPG) के आयात पर व्यय करता है जिसका बड़ा हिस्सा होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर आता है। देश में 33 करोड़ से अधिक एल.पी.जी. कनेक्शन के बावजूद लगभग 37% घर अब भी लकड़ी व गोबर जैसे पारंपरिक ईंधनों पर निर्भर हैं। इसी बीच एक बड़ा बदलाव सामने आया है जिसमें अब सब्सिडी रहित एल.पी.जी. की तुलना में बिजली से खाना बनाना सस्ता पड़ने लगा है। हालाँकि, यह बदलाव जितना सरल दिखता है उतना सरल नहीं है। करोड़ों घरों को गैस से बिजली की ओर ले जाना बिजली व्यवस्था, लागत एवं मांग के संतुलन से जुड़े कई सवाल खड़े करता है।
गैस आधारित कुकिंग के महंगा होने का कारण
- विगत एक दशक में भारत में एल.पी.जी. कनेक्शन का विस्तार तेजी से हुआ है। वर्ष 2015 में इनकी संख्या लगभग 15 करोड़ थी, वहीं 2025 तक यह बढ़कर 33 करोड़ से अधिक हो गई।
- इसके बावजूद एक बड़ी समस्या बनी हुई है क्योंकि भारत अपनी लगभग 60% एल.पी.जी. और आधी प्राकृतिक गैस आयात करता है। यही वजह है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में हलचल का प्रत्यक्ष प्रभाव घरेलू रसोई तक पहुँचता है। वित्तीय वर्ष 24-25 में एल.पी.जी. और गैस का आयात बिल 26.4 अरब डॉलर तक पहुंच गया जो छह वर्ष पूर्व की तुलना में लगभग 50% अधिक है। ऐसे में गैस आधारित स्वच्छ कुकिंग अब सस्ती नहीं रह गई है।
इलेक्ट्रिक कुकिंग का विकल्प
- हाल के अध्ययनों से संकेत मिलता है कि इलेक्ट्रिक कुकिंग न सिर्फ सस्ती है बल्कि अधिक दक्ष भी है। दिल्ली जैसे शहर में चार सदस्यों वाले परिवार के लिए बिजली से खाना बनाना एल.पी.जी. की तुलना में लगभग 37% और पाइप्ड गैस से 14% सस्ता पाया गया है।
- दक्षता के दृष्टिकोण से भी अंतर स्पष्ट है। इंडक्शन चूल्हे से ऊर्जा का लगभग 85% सीधे बर्तन तक पहुंचता है, जबकि एल.पी.जी. बर्नर केवल 40% ऊर्जा (शेष वातावरण में) का ही उपयोग कर पाते हैं। इसके अलावा इलेक्ट्रिक प्रेशर कुकर जैसे उपकरण ऊर्जा की उपभोग को और कम कर देते हैं।
- हालाँकि, भारतीय रसोई की अपनी जटिलताएँ हैं। यहाँ एक साथ कई चीजें पकती हैं जिसके लिए एक से अधिक बर्नर की जरूरत होती है। मौजूदा सिंगल-प्लेट इंडक्शन इस जरूरत को पूरी तरह पूरा नहीं करते हैं। इसलिए मल्टी-पॉट और पारंपरिक गैस जैसी फ्लेम देने वाली तकनीक पर काम करना जरूरी है।
बिजली की बढ़ती मांग और ‘पीक’ समय का दबाव
- विद्युत उपभोग दिन भर एक समान नहीं रहता है। शाम के समय, विशेषकर 9 से 11 बजे के बीच ज्यादातर घरों में एक साथ उपकरण चलने से मांग अपने चरम पर होती है। इसे ‘पीक’ कहा जाता है।
- भारत में यह पीक मांग लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2014 में जहाँ यह 148 गीगावाट थी, वहीं वर्ष 2025 के अंत तक यह 240 गीगावाट से अधिक हो गई। तापमान बढ़ने के साथ यह अधिक तेजी से बढ़ती है।
- अगर बड़ी संख्या में लोग शाम के समय इलेक्ट्रिक कुकिंग अपनाते हैं तो यह पीक और तीव्र हो सकता है। ऐसी स्थिति में बिजली कंपनियों को महंगी दरों पर बिजली खरीदनी पड़ती है, बैकअप प्लांट चलाने पड़ते हैं या फिर लोड शेडिंग का सहारा लेना पड़ता है।
इस चुनौती में तकनीक का प्रयोग
- इस समस्या का एक समाधान स्मार्ट तकनीक के रूप में सामने आ रहा है। Open ADR जैसी प्रणाली उपकरणों को इस तरह नियंत्रित करती है कि वे आवश्यकता के अनुसार अपनी बिजली उपभोग स्वयं समायोजित कर सकें।
- भारत में इसके शुरुआती प्रयोग हो चुके हैं जिनमें पीक मांग को कम करने में सफलता मिली है। अगर इसे बड़े स्तर पर लागू किया जाए तो बिजली की मांग को बेहतर तरीके से संतुलित किया जा सकता है।
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ओपनएडीआर के बारे में
- ओपनएडीआर एक खुला, अत्यधिक सुरक्षित और दो-तरफ़ा सूचना विनिमय मॉडल तथा वैश्विक स्मार्ट ग्रिड मानक है।
- ओपनएडीआर ऑटो-डीआर और डीईआर प्रबंधन के लिए उपयोग किए जाने वाले संदेश प्रारूप को मानकीकृत करता है ताकि गतिशील मूल्य व विश्वसनीयता संकेतों का आदान-प्रदान बिजली कंपनियों, आई.एस.ओ. एवं ऊर्जा प्रबंधन व नियंत्रण प्रणालियों के बीच एक समान तथा अंतरसंचालनीय तरीके से किया जा सके। पहले से तैनात ऑटो-डीआर प्रणालियाँ स्वचालित तो हैं किंतु मानकीकृत या अंतरसंचालनीय नहीं हैं।
- ओपनएडीआर को विद्युत उद्योग के लिए डीआर एवं डीईआर को स्वचालित व सरल बनाने के लिए बनाया गया था जिसमें गतिशील मूल्य और विश्वसनीयता संकेत होते हैं जो अंतिम उपयोगकर्ताओं को पैसे बचाने तथा ऊर्जा दक्षता को अनुकूलित करने के लिए अपने उपयोग पैटर्न को संशोधित करने की अनुमति देते हैं। साथ ही, स्मार्ट ग्रिड में बिजली वितरण की प्रभावशीलता को बढ़ाते हैं।
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सोलर ऊर्जा और स्थानीय विद्युत व्यापार की भूमिका
- रूफटॉप सोलर और बैटरी सिस्टम के साथ घर में स्वयं विद्युत उत्पन्न करने लगते हैं। दिन में उत्पन्न ऊर्जा को स्टोर करके शाम के समय इस्तेमाल किया जा सकता है जिससे पीक का दबाव कम होता है।
- इसके अलावा, अगर पड़ोसी आपस में अतिरिक्त बिजली का लेन-देन करें, तो स्थानीय स्तर पर ही मांग और आपूर्ति का संतुलन बन सकता है। ऐसे प्रयोग भारत में शुरू हो चुके हैं और इनके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं।
आगे की राह
अगर भारत को बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक कुकिंग अपनानी है तो कुछ अहम कदम उठाने होंगे। एल.पी.जी. सब्सिडी का एक हिस्सा इलेक्ट्रिक उपकरणों पर निवेश किया जा सकता है। सस्ती और उन्नत तकनीक वाले इंडक्शन चूल्हों को बढ़ावा देना होगा। समय के आधार पर बिजली की दरें तय करनी होंगी ताकि पीक समय में खपत कम हो। साथ ही, नए घरों में इलेक्ट्रिक कुकिंग को प्राथमिकता देनी होगी।
निष्कर्ष
- रसोई गैस पर निर्भरता सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं है बल्कि यह रणनीतिक जोखिम भी है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव का प्रभाव सीधे आम लोगों पर पड़ता है। इसके विपरीत बिजली एक ऐसा विकल्प है जिसे देश के भीतर ही सौर एवं अन्य स्रोतों से उत्पन्न किया जा सकता है।
- शहरी भारत इस बदलाव का नेतृत्व कर सकता है जहाँ बिजली की पहुँच व तकनीकी ढांचा पहले से मौजूद है। अब चुनौती तकनीक की नहीं है, बल्कि नीति और क्रियान्वयन की है। आने वाले समय में यह तय करेगा कि भारत ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनता है या फिर बाह्य आघातों के प्रति संवेदनशील बना रहता है।