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स्थानिक प्रजातियाँ

स्थानिक प्रजातियों से तात्पर्य 

  • स्थानिक प्रजातियाँ (Endemic Species) वे जीव हैं जो स्वाभाविक रूप से केवल एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित होते हैं और दुनिया के अन्य हिस्सों में नहीं पाए जाते हैं। 
  • इनका सीमित विस्तार प्राय: लंबे समय तक भौगोलिक अलगाव, विशिष्ट पर्यावरणीय परिस्थितियों और विकासवादी प्रक्रियाओं का परिणाम होता है।
  • इन प्रजातियों में अपने संकीर्ण आवास के अनुसार विशेष गुण विकसित हो जाते हैं किंतु यही विशेषता उन्हें पर्यावरणीय बदलावों के प्रति अधिक संवेदनशील बना देती है।  

स्थानिक प्रजातियों की प्रमुख विशेषताएँ 

  • सीमित भौगोलिक विस्तार: ये प्रजातियाँ केवल एक निश्चित क्षेत्र (जैसे- किसी द्वीप, पर्वत श्रृंखला या वन क्षेत्र) में ही पाई जाती हैं और अन्य स्थानों पर प्राकृतिक रूप से जीवित नहीं रह पातीं हैं।
  • विशेष अनुकूलन क्षमता: इनमें ऐसे विशिष्ट शारीरिक या व्यवहारिक गुण विकसित होते हैं जो उन्हें केवल विशेष पारिस्थितिक परिस्थितियों में ही जीवित रहने योग्य बनाते हैं।
  • विलुप्ति का अधिक खतरा: एक ही क्षेत्र में सीमित होने के कारण आवास का विनाश, प्रदूषण या अन्य पर्यावरणीय संकट इन्हें तेजी से समाप्त कर सकते हैं।
  • विकास की प्रक्रिया: कई प्रजातियाँ पहले व्यापक रूप से फैली हुई थीं किंतु समय के साथ जलवायु परिवर्तन या अन्य कारणों से उनका क्षेत्र सीमित होकर एक स्थान तक रह गया।
  • प्रदूषण का प्रभाव: जल, वायु एवं मृदा में प्रदूषण का सीधा प्रभाव इन पर पड़ता है क्योंकि ये सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन नहीं कर पातीं हैं।
  • स्थानीय जलवायु पर निर्भरता: ये प्रजातियाँ स्थानीय तापमान, वर्षा एवं भोजन की उपलब्धता के अनुसार अत्यधिक अनुकूलित होती हैं जिससे जलवायु परिवर्तन इनके लिए बड़ा खतरा बन जाता है।
  • संरक्षण का महत्व: इन प्रजातियों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है क्योंकि इनके विलुप्त होने से पृथ्वी से एक अनूठी जैविक विरासत हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है। 

भारत में स्थानिक प्रजातियाँ 

  • भारत जैव विविधता से समृद्ध देश है जहाँ कई स्थानिक प्रजातियाँ विशेष रूप से पश्चिमी घाट, हिमालय, उत्तर-पूर्व और द्वीपीय क्षेत्रों में पाई जाती हैं। 
    • एशियाई शेर: केवल गुजरात के गिर क्षेत्र में पाया जाने वाला संकटग्रस्त प्राणी
    • हंगुल (कश्मीर हिरण): कश्मीर के दाचीगाम क्षेत्र तक सीमित
    • लायन-टेल्ड मकाक: पश्चिमी घाट के घने वनों में पाया जाने वाला दुर्लभ प्राइमेट
    • पर्पल फ्रॉग: वर्षा वनों में अधिकतर समय जमीन के नीचे रहने वाला उभयचर
    • संगाई हिरण: मणिपुर के तैरते हुए घास के मैदानों में पाया जाने वाला जीव 
    • नीलगिरी तहर: पर्वतीय ढलानों पर रहने वाली बकरी प्रजाति
    • पिग्मी हॉग: असम के घास के मैदानों में पाया जाने वाला छोटा जंगली सूअर
    • मालाबार ग्रे हॉर्नबिल: पश्चिमी घाट का विशिष्ट पक्षी
    • ब्लैक एंड ऑरेंज फ्लायकैचर: पहाड़ी क्षेत्रों का रंगीन पक्षी
    • नीलगिरी वुड पिजन: घने वनों में रहने वाला पक्षी
    • ब्राउन पाम सिवेट: वृक्षों पर रहने वाला रात्रिचर जीव
    • रेड क्राउन रूफ्ड टर्टल: गंगा नदी तंत्र में पाया जाने वाला कछुआ
    • मालाबार ग्लाइडिंग फ्रॉग: वृक्षों के बीच फिसलने में सक्षम मेंढक
    • नारकोंडम हॉर्नबिल: केवल एक द्वीप तक सीमित दुर्लभ पक्षी
    • कुरिंजी पौधा: 12 वर्षों में एक बार पुष्पित होने वाला पौधा
    • इंडियन पिचर प्लांट: मुख्यतः मेघालय में पाया जाने वाला कीटभक्षी पौधा

विश्व की प्रमुख स्थानिक प्रजातियाँ 

  • विश्व में भी कई प्रजातियाँ भौगोलिक अलगाव के कारण विशिष्ट क्षेत्रों तक सीमित हैं-
    • कंगारू: ऑस्ट्रेलिया का प्रमुख थैलीधारी जीव
    • तस्मानियन डेविल: तस्मानिया द्वीप तक सीमित मांसाहारी प्राणी
    • गैलापागोस कछुआ: गैलापागोस द्वीपों की विशाल कछुआ प्रजाति
    • लीमर: मेडागास्कर में पाए जाने वाले प्राइमेट समूह
    • कोमोडो ड्रैगन: इंडोनेशिया के द्वीपों में पाई जाने वाली विशाल छिपकली
    • जायंट पांडा: चीन के पर्वतीय वनों में पाया जाने वाला भालू
    • बोर्नियन ओरंगुटान: बोर्नियो द्वीप तक सीमित वानर
    • रैफ्लेसिया: विशाल फूल देने वाला परजीवी पौधा
    • नेपेंथेस राजाह: मांसाहारी पिचर प्लांट
    • जायंट सिक्वोया: कैलिफोर्निया के विशाल वृक्ष
    • ब्रिसलकोन पाइन: अत्यंत दीर्घायु वृक्ष प्रजाति 

निष्कर्ष

स्थानिक प्रजातियाँ पृथ्वी की जैव-विविधता का अनमोल हिस्सा हैं। इनका अस्तित्व सीमित क्षेत्रों तक होने के कारण ये पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होती हैं। इसलिए इनके संरक्षण के लिए ठोस प्रयास आवश्यक हैं ताकि पारिस्थितिक संतुलन एवं जैव-विविधता को सुरक्षित रखा जा सके। 

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