वैज्ञानिक जगत में दशकों से कोशिकाओं की आंतरिक संरचना को उजागर करने वाले फ्लोरेसेंट प्रोटीन अब एक क्रांतिकारी बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। हालिया शोध बताते हैं कि ये चमकदार संकेतक अब केवल दृश्य चित्र बनाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये जीवित कोशिकाओं के भीतर जटिल क्वांटम गणना और संवेदन (sensing) करने में भी सक्षम हैं।
फ्लोरेसेंट प्रोटीन क्या है ?
फ्लोरोसेंट प्रोटीन (एफपी) वृहद अणु प्रोब होते हैं जिन्हें ऐसे प्रोटीन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो कुछ अमीनो अम्ल अवशेषों से फ्लोरोफोर के स्वतः निर्माण के माध्यम से प्रतिदीप्ति उत्पन्न करने में सक्षम होते हैं।
इससे विशिष्ट आणविक प्रक्रियाओं, अंगों और जीवों को उनकी प्राकृतिक अवस्था में देखा जा सकता है।
उच्च क्वांटम उपज, प्रकाश स्थिरता और विविध उत्सर्जन स्पेक्ट्रम के कारण इनका व्यापक रूप से जैविक अध्ययनों में उपयोग किया जाता है।
एक ऐतिहासिक उपलब्धि से क्वांटम भविष्य तक
फ्लोरेसेंट प्रोटीन ने जीवविज्ञान को वह 'दृष्टि' प्रदान की, जिसके लिए 2008 में रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार दिया गया। कैंसर कोशिकाओं की निगरानी से लेकर मस्तिष्क के न्यूरल नेटवर्क की मैपिंग तक, इनकी भूमिका अद्वितीय रही है।
लेकिन प्रतिष्ठित पत्रिका Natureमें प्रकाशित दो नवीन अध्ययनों ने एक चौंकाने वाला तथ्य सामने रखा है: इन प्रोटीनों को आनुवंशिक रूप से संशोधित (Genetically Modified) कर उन्हें 'क्वांटम सेंसर' में बदला जा सकता है।
अब तक क्वांटम तकनीक को प्रयोगशालाओं के शून्य से नीचे के तापमान और नियंत्रित वातावरण की वस्तु माना जाता था। यह धारणा थी कि जीवित कोशिका का गर्म और गतिशील वातावरण 'क्वांटम अवस्थाओं' के लिए घातक है। इन नए अध्ययनों ने इस मिथक को तोड़ दिया है।
चमक के पीछे छिपा क्वांटम तंत्र: स्पिन और रेडिकल पेयर
जब कोई फ्लोरेसेंट प्रोटीन प्रकाश अवशोषित करता है, तो उसके इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर उच्च ऊर्जा स्तर पर चले जाते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान कुछ विशेष प्रोटीनों में 'रेडिकल पेयर' (Radical Pair) का निर्माण होता है।
इलेक्ट्रॉन स्पिन:इन अणुओं में मौजूद इलेक्ट्रॉनों के 'स्पिन' (Spin) आपस में जुड़े रहते हैं।
चुंबकीय संवेदनशीलता:सूक्ष्म चुंबकीय प्रभाव भी इन इलेक्ट्रॉनों के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। यही कारण है कि बाहरी चुंबकीय क्षेत्र में परिवर्तन होने पर प्रोटीन की चमक (Fluorescence) की तीव्रता बदल जाती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसी तंत्र के माध्यम से कई प्रवासी पक्षी और जानवर पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को महसूस कर पाते हैं।
शोध के दो प्रमुख स्तंभ: EYFP और MagLOV
1. शिकागो विश्वविद्यालय: प्रोटीन बना 'क्विबिट' (Qubit)
प्रिट्ज़कर स्कूल ऑफ मॉलिक्यूलर इंजीनियरिंग के शोधकर्ताओं ने EYFP (एन्हांस्ड येलो फ्लोरेसेंट प्रोटीन) के साथ प्रयोग किया। उन्होंने लेज़र पल्स और माइक्रोवेव तरंगों का उपयोग करके प्रोटीन के इलेक्ट्रॉन स्पिन को नियंत्रित किया।
उपलब्धि: उन्होंने सफलतापूर्वक वह क्रम पूरा किया जो एक क्वांटम कंप्यूटर के 'क्विबिट' के लिए आवश्यक होता है।
परिणाम:यह प्रभाव न केवल ठंडे वातावरण में बल्कि ई-कोलाई बैक्टीरिया के भीतर सामान्य तापमान पर भी देखा गया, जो जैविक परिवेश में क्वांटम स्थिरता का प्रमाण है।
2. ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय: MagLOV का विकास
ऑक्सफोर्ड की टीम ने पौधों के प्रोटीन का उपयोग कर 'MagLOV' नामक एक नया प्रोटीन परिवार विकसित किया।
तकनीक:आनुवंशिक इंजीनियरिंग और चयन प्रक्रिया के माध्यम से ऐसे संस्करण तैयार किए गए जो रेडियो तरंगों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं।
महत्व: ये प्रोटीन रेडियो तरंगों के माध्यम से अपनी चमक को नियंत्रित कर सकते हैं, जिससे कोशिकाओं के भीतर की हलचल को 'मैग्नेटिक रेजोनेंस' के जरिए सीधे देखा जा सकता है।
जैविक परिवेश में इसकी महत्ता क्यों है?
हीरे (Diamond) जैसे ठोस पदार्थों से बने पारंपरिक क्वांटम सेंसर अत्यधिक सटीक तो होते हैं, लेकिन उन्हें कोशिकाओं के भीतर सटीक स्थान पर फिट करना मुश्किल होता है। इसके विपरीत, प्रोटीन आधारित सेंसर के कई लाभ हैं:
स्व-निर्माण:कोशिकाएं स्वयं डीएनए निर्देशों के आधार पर इन्हें बना सकती हैं।
सटीक लक्ष्यीकरण:इन्हें विशिष्ट एंजाइमों या कोशिका के अंगों (जैसे माइटोकॉन्ड्रिया) से जोड़ा जा सकता है।
सूक्ष्म अध्ययन: ये एंजाइम प्रतिक्रियाओं, मुक्त कणों (Free Radicals) के निर्माण और श्वसन जैसी प्रक्रियाओं के दौरान होने वाले इलेक्ट्रॉनिक परिवर्तनों को मापने में सक्षम हैं।
भविष्य की संभावनाएं और चुनौतियां
शोधकर्ताओं ने दिखाया कि 'लॉक-इन डिटेक्शन' तकनीक का उपयोग कर शोर वाले वातावरण में भी स्पष्ट इमेजिंग प्राप्त की जा सकती है। यह तकनीक भविष्य में निम्नलिखित क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है:
दवाओं का प्रभाव:यह ट्रैक करना कि दवाएं आणविक स्तर पर प्रोटीन संरचना को कैसे बदलती हैं।
जैव-रासायनिक निगरानी:कोशिकाओं के भीतर तापमान और विद्युत क्षेत्र का रियल-टाइम मापन।
उन्नत निदान:एमआरआई जैसी उच्च-स्तरीय इमेजिंग को नैनो-स्तर पर ले जाना।
हालाँकि, अभी भी 'कोहेरेंस टाइम' (Coherence time) का कम होना और 'फोटोब्लीचिंग' (प्रोटीन की चमक का फीका पड़ना) जैसी तकनीकी बाधाएं मौजूद हैं। फिर भी, जिस तरह फ्लोरेसेंट प्रोटीनों को प्रयोगशाला का अनिवार्य हिस्सा बनने में समय लगा, वैसे ही ये जैविक-क्वांटम हाइब्रिड सेंसर भविष्य की चिकित्सा और जीवविज्ञान की नई दिशा निर्धारित करेंगे।