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वन अधिकार अधिनियम (FRA)

संदर्भ 

  • भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक मील का पत्थर स्थापित करते हुए, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006, किसी भी पुराने विरोधाभासी कानून या अदालती आदेश से ऊपर है। अदालत ने उत्तर प्रदेश की थारू जनजाति के दावों को खारिज करने वाले जिला स्तरीय समिति (DLC) के फैसले को रद्द करते हुए जनजातीय समुदायों के संवैधानिक अधिकारों को पुनः स्थापित किया है। 

निर्णय की पृष्ठभूमि और कानूनी विवाद 

  • यह मामला लखीमपुर जिले की पलिया कलां तहसील का है, जहाँ मार्च 2021 में जिला स्तरीय समिति (DLC) ने थारू समुदाय के वन अधिकारों के दावों को अस्वीकार कर दिया था। 
  • समिति ने अपने फैसले का आधार सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2000 के एक पुराने अंतरिम आदेश को बनाया था, जो वनों के पुनर्वर्गीकरण पर रोक लगाता था।
  • हालाँकि, इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि कानूनी संप्रभुता (Legal Sovereignty) हमेशा बाद में बने विशेष कानूनों के पास होती है।  

थारू जनजाति के बारे में 

  • आदिवासी थारू जनजाति भारत-नेपाल की सीमा के दोनों तरफ तराई क्षेत्र में, घने जंगलों के बीच निवास करती है जो कि भारत की प्रमुख जनजातियों में से एक उत्तर भारत की प्रमुख जनजाति है। 
  • उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र के तीन ज़िलों लखीमपुर खीरी, बहराइच व गोण्डा में थारू जनजाति निवास करती है। 
  • थारू जनजाति राणा, कठरिया, चौधरी तीन जनजातियों में बँटी है। थारू जनजाति के लोग अवध की संस्कृति को अपनाते हुए अपने को राजस्थान के राजपूत राजा महाराणा प्रताप सिंह का वंशज मानते हैं। 
  • थारू हिन्दू धर्म को मानते हैं, व हिन्दू धर्म के सभी त्योहारों को परम्परागत ढंग से मनाते हैं। 
  • ये लोग रीति-रिवाज, पहनावा, लोक नृत्य, गायन परम्परागत ढंग से करते हैं। 
  • ये अपने सभी त्योहार मिलकर गाँव के सभी लोग एकत्रित होकर समवेत नृत्य व गायन के साथ मनाते हैं। 
  • थारू जनजाति लोक कला व हस्तशिल्प में बहुत पारंगत है-ये लोग टोकरी बुनना, रस्सी बुनना, डलिया बुनना, चटाई बुनना, कम्बल, बैग, दरी, लहँगा, ओढ़नी आदि परम्परागत ढंग से बनाते हैं। 
  • थारू जनजाति के लोगों का प्रमुख व्यवसाय कृषि, पशुपालन, मछली मारना है। 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के प्रमुख तर्क  

  • अधिनियम की सर्वोच्चता : न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वन अधिकार अधिनियम की धारा 4 के तहत नॉटविद्स्टैंडिंग (Notwithstanding) क्लॉज है, जिसका अर्थ है कि यह कानून पुराने सभी नियमों (जैसे भारतीय वन अधिनियम, 1927) पर प्रभावी होगा। 
  • समय का सिद्धांत : कोई भी पुराना अदालती आदेश, जो बाद में बने संसद के कानून (FRA 2006) के विपरीत हो, वह स्वतः ही प्रभावहीन हो जाता है। 

वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 एक संक्षिप्त परिचय  

  • यह अधिनियम केवल एक कानून नहीं, बल्कि वनवासी समुदायों के साथ सदियों से हुए ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने का एक माध्यम है। 

अधिनियम के मुख्य स्तंभ 

  • लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण: यह कानून ग्राम सभा को सबसे शक्तिशाली इकाई मानता है, जिसे वन अधिकारों के दावों की जांच और शुरुआत करने का अधिकार है।
  • पारिस्थितिक संतुलन: यह इस धारणा को तोड़ता है कि जनजाति वनों के लिए खतरा हैं; इसके बजाय, यह उन्हें वनों के संरक्षक के रूप में मान्यता देता है। 

समुदायों को मिलने वाले प्रमुख अधिकार 

  • पट्टा अधिकार (Title Rights) : खेती की जा रही भूमि पर 4 हेक्टेयर तक का मालिकाना हक।
  • सामुदायिक संसाधन : शहद, बांस और जड़ी-बूटियों जैसे उत्पादों के संग्रह और विक्रय का अधिकार।
  • आवास और चराई : विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) के लिए सुरक्षित आवास और पशुओं के लिए चराई के अधिकार।
  • बेदखली पर रोक : जब तक अधिकारों के सत्यापन की प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक किसी भी वनवासी को उसकी जमीन से हटाया नहीं जा सकता। 

व्यापक कानूनी प्रभाव और अन्य राज्यों का संदर्भ 

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय देश के अन्य राज्यों के लिए एक नजीर (Precedent) बनेगा। पूर्व में, मद्रास उच्च न्यायालय जैसे कुछ न्यायालयों ने राज्य के पुराने वन कानूनों (जैसे तमिलनाडु वन अधिनियम, 1882) को प्राथमिकता दी थी, जिससे वनवासियों की बेदखली के मामले बढ़े थे। 
  • इसके विपरीत, जनवरी 2026 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय और अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि
  • संरक्षित क्षेत्रों (Tiger ReservesSanctuaries) में भी परंपरागत चराई और निस्तार के अधिकार सुरक्षित हैं।
  • प्रशासनिक अधिकारियों को वन अधिकारों के मामलों में संवेदनशील और कानूनी रूप से अद्यतन रहने की आवश्यकता है।  

निष्कर्ष 

  • इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह फैसला न केवल थारू जनजाति के लिए राहत की खबर है, बल्कि यह भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे को भी मजबूत करता है। यह संदेश साफ है विकासात्मक और कानूनी प्रक्रियाओं में हाशिए पर खड़े समुदायों के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
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