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वैश्विक संघर्ष और भारत की ऊर्जा सुरक्षा

संदर्भ 

  • पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष ने यह सिद्ध कर दिया है कि भू-राजनीतिक अस्थिरता कितनी तेजी से घरेलू अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करती है। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, वर्तमान आर्थिक संकट 1973, 1979 और 2022 के संयुक्त झटकों से भी अधिक गंभीर है। कच्चे तेल की कीमतें 109 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचने के बाद, भारत जैसे तेल आयात पर निर्भर देशों के लिए ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ अब सिर्फ कम कीमत पर ईंधन हासिल करना नहीं रह गया है, बल्कि यह अब आर्थिक स्थिरता और लचीलेपन का पर्याय बन चुका है। 

ऊर्जा बाजार में व्यवस्था परिवर्तन और वैश्विक प्रतिक्रिया 

  • रूस-यूक्रेन युद्ध ने ऊर्जा निर्भरता के खतरों को वैश्विक पटल पर उजागर किया। इसके बाद दुनिया भर में ऊर्जा आपूर्ति के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव आया है। 
  • यूरोपीय देशों ने रूस पर अपनी गैस निर्भरता को 45% से घटाकर 12% कर दिया है। गैस की खपत में 20% की कमी आई है, और सुरक्षा के लिए अतिरिक्त एलएनजी (LNG) क्षमता को प्राथमिकता दी जा रही है। 

प्रमुख देशों की रणनीतियाँ   

  • चीन : सालाना 25 मिलियन मीट्रिक टन एलएनजी अनुबंधों की गारंटी।
  • दक्षिण कोरिया : समुद्री चोकपॉइंट्स (जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य) के बाहर से 273 मिलियन बैरल तेल की आपूर्ति सुनिश्चित की। 
  • जापान : 254 दिनों की खपत के बराबर (470 मिलियन बैरल) का विशाल भंडार तैयार किया। 

भारत की स्थिति: बढ़ती मांग और रणनीतिक विकल्प 

भारत वर्तमान में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है। अपनी जरूरतों का 85% से अधिक आयात करने के बावजूद, भारत ने संकटों का सामना कुशलता से किया है :

  • आपूर्ति विविधीकरण : 2022 से पहले रूस से तेल आयात केवल 2% था, जो वित्त वर्ष 2025 तक बढ़कर 36% हो गया। इसके अलावा इराक, सऊदी अरब, यूएई और अमेरिका जैसे देशों से भी आपूर्ति सुनिश्चित कर भारत ने भौगोलिक विविधता बनाए रखी है। 
  • मांग का केंद्र : चीन में मांग स्थिर होने के साथ, भारत वैश्विक तेल मांग की वृद्धि का मुख्य इंजन बन गया है। ओपेक (OPEC) के अनुसार, 2026 तक भारत की खपत 6 एमबी/डी (मिलियन बैरल प्रति दिन) तक पहुँचने का अनुमान है। 

संरचनात्मक जोखिम और उभरती चुनौतियाँ  

भले ही भारत ने विकल्पों की उपलब्धता बढ़ाई है, लेकिन कुछ बुनियादी जोखिम अब भी बरकरार हैं : 

  • अत्यधिक आयात निर्भरता : घरेलू उत्पादन सीमित होने के कारण कच्चे तेल पर निर्भरता लगभग 89% तक पहुँच गई है, जिससे विदेशी विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। 
  • चोकपॉइंट्स का खतरा : भारत के तेल आयात का 45% होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है। तनाव के समय भारतीय जहाजों को सुरक्षा देने के लिए ऑपरेशन संकल्प जैसे नौसैनिक अभियानों की आवश्यकता पड़ती है।
  • ऊर्जा परिवर्तन और नई निर्भरता : सौर ऊर्जा और ईवी (EV) के विस्तार से तेल की खपत तो कम होगी, लेकिन लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के लिए निर्भरता बढ़ेगी। वर्तमान में चीन इन खनिजों के वैश्विक प्रसंस्करण का 91% नियंत्रित करता है, जबकि भारत अपनी जरूरतों का 5% से भी कम संसाधित कर पाता है। 

भविष्य की राह: सुरक्षा से आत्मनिर्भरता की ओर 

भारत के लिए आगामी रणनीति केवल आपूर्तिकर्ता बदलने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। अगले चरण में निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान देना अनिवार्य है :

  • रणनीतिक भंडार (Strategic Reserves) : आपातकालीन स्थिति के लिए तेल और गैस के सुरक्षित भंडार की क्षमता में वृद्धि करना।
  • समुद्री सुरक्षा : आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा के लिए नौसैनिक क्षमता को और अधिक सुदृढ़ बनाना। 
  • खनिज सुरक्षा : महत्वपूर्ण खनिजों के लिए चीन से इतर आपूर्ति श्रृंखला विकसित करना और घरेलू स्तर पर प्रसंस्करण (Processing) नेटवर्क खड़ा करना। 
  • परिवहन सुधार : परिवहन क्षेत्र में वैकल्पिक ईंधन और बिजली के उपयोग को बढ़ाकर तेल की खपत कम करना। 

निष्कर्ष

  • भारत ने वैश्विक उथल-पुथल के बीच सामरिक स्फूर्ति और तत्परता दिखाकर अपनी आर्थिक वृद्धि को बनाए रखा है। हालांकि, दीर्घकालिक सुरक्षा तभी संभव है जब हम भविष्य के संकटों की आर्थिक लागत को कम करने के लिए संरचनात्मक आत्मनिर्भरता और महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति सुनिश्चित करें।
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