चर्चा में क्यों?
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का प्रभाव अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। विश्व बैंक समूह की नवीनतम ‘ग्लोबल इकोनॉमिक प्रॉस्पेक्ट्स’ रिपोर्ट के अनुसार, ऊर्जा कीमतों में तेज वृद्धि, बढ़ती मुद्रास्फीति तथा ऋण लेने की ऊंची लागत के कारण वर्ष 2026 में वैश्विक आर्थिक विकास दर घटकर 2.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह कोविड-19 महामारी के बाद वैश्विक विकास का सबसे निम्न स्तर होगा।

प्रमुख बिन्दु
- रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक अर्थव्यवस्था की विकास दर 2025 में 2.9 प्रतिशत रहने के बाद 2026 में घटकर 2.5 प्रतिशत हो सकती है।
- हालांकि 2027 में इसमें मामूली सुधार होकर 2.8 प्रतिशत तक पहुंचने की संभावना है, लेकिन यह 2010 के दशक की औसत विकास दर से काफी कम रहेगी।
- विश्व बैंक ने यह भी बताया कि जनवरी 2026 के बाद से विश्व की लगभग दो-तिहाई अर्थव्यवस्थाओं के विकास अनुमानों में गिरावट दर्ज की गई है।
ऊर्जा संकट और बढ़ती मुद्रास्फीति
- रिपोर्ट में कहा गया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में उत्पन्न व्यवधानों के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हुए हैं।
- इसके परिणामस्वरूप तेल की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
- अनुमान है कि 2026 में ब्रेंट कच्चे तेल की औसत कीमत 94 डॉलर प्रति बैरल रहेगी, जो 2025 की तुलना में लगभग 36 प्रतिशत अधिक होगी।
- ऊर्जा की बढ़ती लागत का असर कृषि क्षेत्र पर भी पड़ेगा। उर्वरकों की कीमतों में वृद्धि से खाद्य पदार्थों की लागत बढ़ सकती है, जिससे वैश्विक मुद्रास्फीति 2025 के 3.3 प्रतिशत से बढ़कर 2026 में 4 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है।
विकासशील देशों पर अधिक दबाव
- विश्व बैंक के अनुसार, विकासशील अर्थव्यवस्थाएं इस मंदी से सबसे अधिक प्रभावित हो सकती हैं।
- इन देशों की विकास दर 2025 के 4.4 प्रतिशत से घटकर 2026 में 3.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो महामारी के बाद का सबसे निचला स्तर होगा।
- रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि चीन और भारत को छोड़कर अधिकांश विकासशील देशों के लिए विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ प्रति व्यक्ति आय के अंतर को कम करना और अधिक कठिन हो सकता है।
- 2028 तक इन देशों में आय अभिसरण (Income Convergence) की प्रक्रिया लगभग एक दशक तक ठहर सकती है।
दक्षिण एशिया सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला क्षेत्र
- वैश्विक मंदी के बावजूद दक्षिण एशिया दुनिया का सबसे तेजी से विकसित होने वाला क्षेत्र बना रहेगा।
- हालांकि क्षेत्रीय विकास दर 2025 के 7 प्रतिशत से घटकर 2026 में 6.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
- वर्ष 2027 में इसके पुनः बढ़कर 6.9 प्रतिशत तक पहुंचने की संभावना है।
- दूसरी ओर, संघर्ष से सबसे अधिक प्रभावित पश्चिम एशियाई और खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं में तेज गिरावट देखने को मिल सकती है।
- खाड़ी देशों की विकास दर 2025 के 3.9 प्रतिशत से घटकर 2026 में लगभग शून्य हो सकती है।
- हालांकि पुनर्निर्माण गतिविधियों और व्यापार में सुधार के साथ 2027-28 में इसमें पुनः तेजी आने की उम्मीद है।
संकट गहराने पर और गंभीर हो सकती है स्थिति
- विश्व बैंक ने आगाह किया है कि यदि ऊर्जा आपूर्ति में और अधिक व्यवधान उत्पन्न होते हैं या वैश्विक वित्तीय बाजारों में गंभीर संकट पैदा होता है, तो 2026 में वैश्विक विकास दर घटकर केवल 1.3 प्रतिशत रह सकती है।
- ऐसे परिदृश्य में वैश्विक मुद्रास्फीति बढ़कर 4.4 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
100 अरब डॉलर तक सहायता देने को तैयार विश्व बैंक
- संभावित आर्थिक संकट से निपटने के लिए विश्व बैंक समूह ने कहा है कि वह अगले 15 महीनों में 100 अरब डॉलर तक का वित्तपोषण, गारंटी और निजी क्षेत्र को सहायता उपलब्ध कराने के लिए तैयार है।
- वर्तमान में संस्था 50 से 60 अरब डॉलर की तत्काल सहायता प्रदान कर रही है, जिसमें 25 अरब डॉलर की पूर्व-स्वीकृत वित्तीय सहायता शामिल है।
- विश्व बैंक समूह के अध्यक्ष अजय बंगा ने कहा कि विकासशील देशों के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, आर्थिक स्थिरता बनाए रखने तथा रोजगार और विकास के अवसरों को संरक्षित रखने की है।
- उन्होंने कहा कि वर्तमान संकटों के बावजूद दीर्घकालिक विकास की संभावनाओं को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।
बढ़ता सार्वजनिक ऋण भी चिंता का विषय
- रिपोर्ट में बढ़ते सार्वजनिक ऋण को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण जोखिम बताया गया है।
- विकासशील देशों में सरकारी ऋण 2010 में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 40 प्रतिशत से कम था, जो अब बढ़कर 70 प्रतिशत से अधिक हो गया है।
- इससे उधारी की लागत बढ़ रही है और सरकारों की स्वास्थ्य, शिक्षा तथा अवसंरचना क्षेत्रों में निवेश करने की क्षमता प्रभावित हो रही है।
- विश्व बैंक ने देशों को मजबूत राजकोषीय नियम अपनाने, घरेलू राजस्व संग्रह बढ़ाने, अर्थव्यवस्था में विविधीकरण लाने तथा निजी निवेश को प्रोत्साहित करने की सलाह दी है, ताकि भविष्य में आने वाले आर्थिक झटकों का बेहतर ढंग से सामना किया जा सके।