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ग्रेट निकोबार परियोजना       

संदर्भ 

  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने 81,000 करोड़ की लागत वाली ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना को हरी झंडी दे दी है। न्यायाधिकरण ने इस परियोजना को सामरिक और आर्थिक दृष्टि से अपरिहार्य माना है। यह फैसला पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में विकास और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है।

ग्रेट निकोबार परियोजना के बारे में

  • 910 वर्ग किमी में फैला ग्रेट निकोबार द्वीप, जहाँ भारत का दक्षिणतम सिरा इंदिरा पॉइंट स्थित है, अब एक वैश्विक व्यापार और रक्षा केंद्र के रूप में उभरने को तैयार है।
  • नीति आयोग द्वारा परिकल्पित इस परियोजना का क्रियान्वयन 'अंडमान और निकोबार द्वीप एकीकृत विकास निगम' (ANIIDCO) कर रहा है।

परियोजना के चार मुख्य स्तंभ

यह परियोजना 166 वर्ग किमी क्षेत्र में फैली है और इसके चार प्रमुख घटक हैं:

  1. अंतर्राष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट: गलाथिया बे (Galathea Bay) में प्रस्तावित यह बंदरगाह बड़े मालवाहक जहाजों के लिए एक प्रमुख केंद्र बनेगा। इसका लक्ष्य कोलंबो, सिंगापुर और पोर्ट क्लैंग जैसे वैश्विक बंदरगाहों को कड़ी प्रतिस्पर्धा देना है।
  2. एकीकृत टाउनशिप: लगभग 149 वर्ग किमी में विकसित होने वाला यह क्षेत्र आवासीय, वाणिज्यिक और पर्यटन गतिविधियों का केंद्र होगा, जो भविष्य की आर्थिक गतिविधियों को आधार प्रदान करेगा।
  3. दोहरे उपयोग वाला हवाई अड्डा: नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए निर्मित यह हवाई अड्डा सामरिक निगरानी और कनेक्टिविटी को मजबूत करेगा।
  4. गैस और सौर ऊर्जा संयंत्र: 450 MVA क्षमता का यह संयंत्र पूरे द्वीप के लिए स्वच्छ और विश्वसनीय ऊर्जा सुनिश्चित करेगा।

सामरिक और भू-राजनीतिक महत्व

  • ग्रेट निकोबार की स्थिति इसे वैश्विक समुद्री मानचित्र पर 'गोल्डन गेट' बनाती है:
    • मलक्का जलडमरूमध्य की निकटता: यह दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है, जहाँ से वैश्विक व्यापार का 30% और तेल व्यापार का एक-तिहाई हिस्सा गुजरता है।
    • हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दबदबा: यहाँ मजबूत बुनियादी ढाँचा होने से भारत हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सक्रियता पर बेहतर निगरानी रख सकेगा।
    • रक्षा सुदृढ़ीकरण: INS बाज़ और अंडमान-निकोबार कमान के साथ मिलकर यह नया केंद्र त्रि-सेवा कमान की शक्ति को और बढ़ाएगा।

पर्यावरणीय और सामाजिक चिंताएँ

1. पारिस्थितिक प्रभाव

  • वन भूमि: परियोजना के लिए 130 वर्ग किमी वन क्षेत्र का उपयोग होगा और लगभग 10 लाख पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है।
  • जैव-विविधता: यह द्वीप 'सुंडालैंड हॉटस्पॉट' का हिस्सा है। यहाँ 'निकोबार मेगापोड' पक्षी और दुनिया के सबसे बड़े लेदरबैक कछुओं के प्रजनन स्थल (गलाथिया बे) को खतरा होने की आशंका है। 

2. जनजातीय समुदायों पर प्रभाव

  • शोम्पेन जनजाति: यह आदिम जनजाति बाहरी दुनिया से बहुत कम संपर्क रखती है। जनसंख्या में वृद्धि और निर्माण गतिविधियों से उनकी जीवनशैली और स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है।
  • निकोबारी समुदाय: सुनामी के बाद विस्थापित हुए इस समुदाय की भूमि अधिकारों और पुनर्वास की माँगें अभी भी चर्चा का विषय हैं। 

3. जनसांख्यिकीय दबाव

  • वर्तमान में द्वीप की आबादी मात्र 8,500 है, जिसके 2050 तक बढ़कर 6.5 लाख होने का अनुमान है। यह तीव्र वृद्धि द्वीप के सीमित संसाधनों और पारिस्थितिकी पर भारी दबाव डाल सकती है। 

निष्कर्ष

  • NGT ने स्पष्ट किया है कि सामरिक महत्व के बावजूद पर्यावरणीय सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। इसके लिए लिटिल निकोबार जैसे पड़ोसी द्वीपों पर नए वन्यजीव अभयारण्य बनाने और वनीकरण के उपाय प्रस्तावित किए गए हैं।
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