- हक्की-पिक्की जनजाति कर्नाटक की एक प्रमुख आदिवासी समुदाय है, जिसकी विशिष्ट संस्कृति, भाषा और जीवनशैली इसे अन्य जनजातियों से अलग बनाती है।
- हाल ही में इस समुदाय के आठ सदस्य मध्य अफ्रीका में संकट में फँस गए हैं, क्योंकि वे हर्बल उत्पाद बेचने के लिए गए थे और उनका वीज़ा समाप्त हो गया है।
- इस घटना ने हक्की-पिक्की जनजाति की सामाजिक-आर्थिक स्थिति और उनकी पारंपरिक आजीविका पर फिर से ध्यान आकर्षित किया है।
- ‘हक्की-पिक्की’ शब्द कन्नड़ भाषा से लिया गया है। इसमें ‘हक्की’ का अर्थ ‘पक्षी’ और ‘पिक्की’ का अर्थ ‘पकड़ना’ होता है।
- इस प्रकार, हक्की-पिक्की का शाब्दिक अर्थ “पक्षी पकड़ने वाले” होता है।
- ऐतिहासिक रूप से यह समुदाय पक्षियों को पकड़ने और बेचने का कार्य करता रहा है, हालांकि आधुनिक समय में वे हर्बल उत्पाद, जड़ी-बूटियाँ और पारंपरिक औषधियाँ बेचने का काम भी करते हैं।
- भारत सरकार ने हक्की-पिक्की समुदाय को अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe) के रूप में मान्यता दी है, जिससे उन्हें शिक्षा, रोजगार और कल्याणकारी योजनाओं में विशेष अधिकार प्राप्त हैं।

भाषा और सांस्कृतिक पहचान
हालाँकि हक्की-पिक्की समुदाय दक्षिण भारत में रहता है, जहाँ मुख्य रूप से द्रविड़ भाषाएँ बोली जाती हैं, फिर भी यह समुदाय एक इंडो-आर्यन भाषा बोलता है, जिसे विद्वानों ने ‘वागरी’ नाम दिया है।
- वे अपने परिवार और समुदाय के भीतर वागरी भाषा में बातचीत करते हैं।
- बाहरी समाज और दैनिक कार्यों में वे कन्नड़ भाषा का उपयोग करते हैं।
- यूनेस्को ने ‘वागरी’ को लुप्तप्राय भाषाओं की सूची में शामिल किया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह भाषा धीरे-धीरे विलुप्त होने के खतरे में है।
रीति-रिवाज और सामाजिक व्यवस्था
- हक्की-पिक्की जनजाति मुख्य रूप से हिंदू परंपराओं का पालन करती है और दिवाली, होली, दशहरा जैसे प्रमुख हिंदू त्योहार मनाती है।
- उनकी सामाजिक संरचना कबीले (Clan) आधारित है। वे अपने ही कबीले में विवाह को प्राथमिकता देते हैं और परंपरागत रूप से चचेरे भाई-बहनों के बीच विवाह भी प्रचलित रहा है।
- यह समाज मातृसत्तात्मक (Matrilineal) है, जिसका अर्थ है कि परिवार की वंशावली और संपत्ति महिला के पक्ष से आगे बढ़ती है। इस समुदाय में दूल्हा दुल्हन के परिवार को दहेज देता है, जो भारतीय समाज में प्रचलित दहेज प्रथा के विपरीत है।
आजीविका और आधुनिक चुनौतियाँ
परंपरागत रूप से हक्की-पिक्की लोग:
- पक्षी पकड़ने
- जड़ी-बूटियाँ बेचने
- पारंपरिक औषधियाँ बनाने
- वन उत्पादों का व्यापार करने
जैसे कार्य करते रहे हैं।
हालाँकि, बदलते कानूनों, वन संरक्षण नियमों और आधुनिक अर्थव्यवस्था के कारण उनकी पारंपरिक आजीविका प्रभावित हुई है। कई लोग अब व्यापार के लिए अन्य देशों में जाते हैं, जैसा कि हाल की घटना में देखा गया, जहाँ आठ सदस्य मध्य अफ्रीका में फँस गए।
वर्तमान संकट और चिंता
हाल ही में हक्की-पिक्की समुदाय के आठ लोग हर्बल उत्पाद बेचने के लिए मध्य अफ्रीका गए थे, लेकिन उनका वीज़ा समाप्त हो गया, जिसके कारण वे वहाँ फँस गए। इस घटना ने उनकी आर्थिक असुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय यात्रा से जुड़े जोखिमों को उजागर किया है।
इससे यह सवाल भी उठता है कि:
- क्या सरकार को ऐसे समुदायों के लिए बेहतर यात्रा और व्यापार सहायता प्रदान करनी चाहिए?
- क्या उनकी पारंपरिक आजीविका को संरक्षित करने के लिए विशेष योजनाएँ बनानी चाहिए?