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भारत में लू (Heatwave): कारण, प्रभाव और निवारण के प्रभावी उपाय

संदर्भ 

  • हाल ही में आंध्र प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (APSDMA) ने राज्य के 14 मंडलों में गंभीर हीटवेव (लू) की चेतावनी जारी की है, जबकि 28 अन्य मंडलों में भी ऐसी परिस्थितियाँ बनने की संभावना व्यक्त की गई है।  

हीटवेव (लू) के बारे में 

हीटवेव क्या है ? 

  • हीट वेव असामान्य रूप से उच्च तापमान की वह स्थिति है, जिसमें तापमान सामान्य से अधिक रहता है। ऐसी परिस्थिति में वायु का तापमान मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत खतरनाक हो सकता है। इसे किसी क्षेत्र में वास्तविक तापमान या उसके सामान्य स्तर से विचलन के आधार पर परिभाषित किया जाता है। 

भारत में हीटवेव से जुड़े प्रमुख तथ्य  

  • हालिया स्थिति: आंध्र प्रदेश के 207 से अधिक मंडलों में तापमान 41°C से ऊपर दर्ज किया गया है।
  • सर्वाधिक तापमान: मान्यम जिले के सलूर में 45.2°C तापमान रिकॉर्ड किया गया।
  • वर्तमान प्रभाव: श्रीकाकुलम और पार्वतीपुरम मान्यम जिलों के 14 मंडलों में भीषण गर्मी का असर देखा जा रहा है।
  • आर्थिक प्रभाव: अनुमान है कि हीटवेव जैसी आपदाएँ भारत की जीडीपी (GDP) को हर वर्ष लगभग 2% तक प्रभावित करती हैं और राजस्व हानि का कारण बनती हैं।  

हीटवेव के प्रमुख कारण 

  • जलवायु परिवर्तन: वैश्विक जलवायु पैटर्न में बदलाव के कारण चरम मौसमीय घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है।
  • एंटीसाइक्लोनिक परिसंचरण: हवा का नीचे की ओर प्रवाह वायुमंडल को गर्म करता है और बादलों के निर्माण को रोकता है।
  • अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव: शहरी क्षेत्रों में कंक्रीट संरचनाएँ और तेजी से हो रहा शहरीकरण गर्मी को अवशोषित कर तापमान को बढ़ा देते हैं।
  • एल नीनो मोडोकी प्रभाव: समुद्री तापमान में बदलाव के कारण वायुमंडलीय पैटर्न प्रभावित होता है, जिससे भारत में गर्म और शुष्क हवाएँ बढ़ सकती हैं।  

हीटवेव से उत्पन्न चुनौतियाँ 

  • स्वास्थ्य पर प्रभाव: अत्यधिक गर्मी और नमी से हीटस्ट्रोक, निर्जलीकरण और मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। 
  • कृषि क्षेत्र पर असर: खेतों में कार्यरत किसान अधिक जोखिम में रहते हैं; आंधी-तूफान के दौरान पेड़ों के नीचे शरण लेना भी खतरनाक हो सकता है। 
  • आर्थिक उत्पादकता में गिरावट: निर्माण और कृषि जैसे क्षेत्रों में कार्य समय घटने से उत्पादन प्रभावित होता है।
  • बिजली व्यवस्था पर दबाव: कूलिंग उपकरणों की बढ़ती मांग से विद्युत ग्रिड पर दबाव बढ़ता है, जिससे बिजली आपूर्ति बाधित हो सकती है।

सरकारी प्रयास 

  • अर्ली वार्निंग सिस्टम: आंध्र प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (APSDMA) द्वारा जिलों और मंडलों को समय-समय पर वास्तविक समय में चेतावनियाँ जारी की जाती हैं। 
  • जन जागरूकता अभियान: नागरिकों को नींबू पानी, छाछ और नारियल पानी जैसे पेय पदार्थों के सेवन की सलाह दी जाती है। 
  • राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन (NIP): आपदा-रोधी और जलवायु-सहनीय बुनियादी ढांचे के विकास को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। 
  • हीट एक्शन प्लान (HAP): कूल रूफ्स और सार्वजनिक कूलिंग केंद्रों जैसी सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है। 

आगे की रणनीति 

  • शहरी हरितीकरण: शहरों में हरियाली और जल निकायों को बढ़ाकर अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव को कम किया जा सकता है।
  • लचीला अवसंरचना विकास: जलवायु-प्रतिरोधी संरचनाओं को परियोजनाओं में शामिल करना आवश्यक है।
  • स्थानीय कूलिंग उपाय: पारंपरिक जलपान विधियों को प्रोत्साहित करते हुए सार्वजनिक पेयजल सुविधाओं का विस्तार किया जाना चाहिए।
  • डेटा-आधारित नीति निर्माण: रेजिलिएंस कॉस्ट-बेनेफिट एनालिसिस (RCBA) जैसे उपकरणों के माध्यम से पूर्व-निवारक उपायों के आर्थिक लाभों का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। 

निष्कर्ष 

  • आंध्र प्रदेश में बार-बार उत्पन्न हो रही भीषण हीटवेव यह स्पष्ट करती है कि केवल तात्कालिक स्वास्थ्य उपाय पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि दीर्घकालिक संरचनात्मक लचीलापन भी आवश्यक है।
  • प्रभावी आपदा प्रबंधन और जलवायु-अनुकूल अवसंरचना के संयोजन से भारत अपने नागरिकों और अर्थव्यवस्था को बढ़ते तापमान के प्रभावों से बेहतर सुरक्षा प्रदान कर सकता है। भविष्य की सुरक्षा और विकास सुनिश्चित करने के लिए आज ही सक्रिय और दूरदर्शी कदम उठाना अत्यंत आवश्यक है। 
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