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भारत में हीटवेव को प्राकृतिक आपदा का दर्जा

संदर्भ 

भारत में बढ़ती गर्मी अब केवल मौसमी असुविधा नहीं रह गई है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि, अर्थव्यवस्था, श्रम उत्पादकता और शहरी जीवन के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। इसी पृष्ठभूमि में हीटवेव और आकाशीय बिजली को अधिसूचित प्राकृतिक आपदाओं की सूची में शामिल करना भारत की आपदा प्रबंधन व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव है। इसका महत्व केवल राहत और मुआवजे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के अनुरूप आपदा जोखिम न्यूनीकरण और वित्तीय नियोजन की दिशा में भी बड़ा कदम है। 

हीटवेव को आपदा घोषित करने का महत्व 

  • गृह मंत्रालय द्वारा हीटवेव को अधिसूचित प्राकृतिक आपदा की श्रेणी में शामिल किए जाने से राज्यों को इससे निपटने के लिए अधिक स्पष्ट वित्तीय आधार मिला है। पहले कोई राज्य हीटवेव को ‘स्थानीय आपदा’ घोषित करके राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) का उपयोग कर सकता था, लेकिन इसके लिए वार्षिक एसडीआरएफ आवंटन की 10% सीमा जैसी बाधाएँ थीं। परिणामस्वरूप हीटवेव को बाढ़ और चक्रवात जैसी अन्य अधिसूचित आपदाओं की तुलना में अपेक्षाकृत कमजोर वित्तीय व्यवस्था प्राप्त थी। नई व्यवस्था इस असमानता को दूर करती है। 
  • यह परिवर्तन 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों से भी जुड़ा है। आयोग ने 2026-27 से 2030-31 की अवधि के लिए राज्यों के आपदा कोषों हेतु लगभग ₹2.04 लाख करोड़ की सिफारिश की है। इसमें लगभग ₹1.6 लाख करोड़ एसडीआरएफ तथा शेष राशि राज्य आपदा न्यूनीकरण कोष (SDMF) के लिए है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय आपदा कोषों के लिए ₹79,406 करोड़ की सिफारिश की गई है। इस वित्तीय ढाँचे का उद्देश्य आपदा के बाद राहत देने के साथ-साथ आपदा के जोखिम को पहले से कम करना है।  

बढ़ता हीट रिस्क : भारत के सामने नई चुनौती 

  • जलवायु परिवर्तन ने भारत में अत्यधिक गर्मी की समस्या को अधिक गंभीर बना दिया है। एक आकलन के अनुसार देश के 57% से अधिक जिले उच्च या बहुत उच्च हीट रिस्क की स्थिति में हैं और इन क्षेत्रों में देश की लगभग तीन-चौथाई आबादी निवास करती है।
  • गर्मी का प्रभाव केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है। गर्म दिनों के साथ बहुत गर्म रातों और आर्द्रता में वृद्धि भी महत्वपूर्ण है। दिनभर अत्यधिक गर्मी झेलने के बाद रात में शरीर को पर्याप्त राहत न मिलने से हीट स्ट्रेस का खतरा बढ़ जाता है। विशेष रूप से बुजुर्ग, बच्चे, गर्भवती महिलाएँ, बाहरी काम करने वाले श्रमिक और पहले से स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोग अधिक जोखिम में रहते हैं। 
  • तेजी से बढ़ते शहरों में स्थिति और जटिल है। कंक्रीट की इमारतें, डामर की सड़कें, सीमित हरित क्षेत्र और वाहनों तथा एयर-कंडीशनिंग से निकलने वाली गर्मी शहरी हीट-आइलैंड प्रभाव को बढ़ाती है। परिणामस्वरूप शहर अपने आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक गर्म हो सकते हैं।
  • स्वास्थ्य संबंधी आंकड़े इस चुनौती की गंभीरता को रेखांकित करते हैं। 2024 की भीषण गर्मी के दौरान हजारों गर्मी-संबंधी बीमारियाँ दर्ज की गईं। वर्तमान निगरानी व्यवस्था में भी मार्च से जुलाई के बीच हजारों हीटस्ट्रोक मामले और मौतें दर्ज हुई हैं। वास्तविक स्वास्थ्य प्रभाव इससे कहीं अधिक हो सकता है, क्योंकि अत्यधिक गर्मी हृदय, फेफड़े और गुर्दे से संबंधित बीमारियों को भी बढ़ा सकती है। 

आपदा वित्त : राहत से जोखिम न्यूनीकरण तक 

  • हीटवेव को अधिसूचित आपदा का दर्जा मिलने का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह है कि भारत की नीति का फोकस केवल आपदा के बाद राहत देने के बजाय जोखिम को पहले से कम करने पर केंद्रित किया जा सकता है।
  • एसडीआरएफ के माध्यम से गर्मी से होने वाली पात्र क्षति के लिए राहत और मुआवजा दिया जा सकता है। इनमें मानव जीवन की हानि, फसल और पशुधन की क्षति तथा अन्य स्वीकृत नुकसान शामिल हो सकते हैं। वहीं राज्य आपदा न्यूनीकरण कोष का उपयोग दीर्घकालिक जोखिम न्यूनीकरण के लिए किया जा सकता है।  
  • इसके अंतर्गत कूलिंग सेंटर, शीतलन आश्रय, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, कूल रूफ, ऊर्जा-कुशल भवन, शहरी हरित क्षेत्र, जल निकायों का संरक्षण, प्रकृति-आधारित समाधान और हीट-रिस्क मैपिंग जैसी परियोजनाएँ विकसित की जा सकती हैं।
  • इस प्रकार आपदा प्रबंधन की अवधारणा ‘राहत-केंद्रित’ दृष्टिकोण से आगे बढ़कर ‘रोकथाम, अनुकूलन और लचीलापन-केंद्रित’ बन सकती है। यह बदलाव जलवायु परिवर्तन के युग में विशेष रूप से आवश्यक है।

हीट एक्शन प्लान की भूमिका 

  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने राज्यों, जिलों और शहरों को हीट एक्शन प्लान (HAP) तैयार करने की सलाह दी है। एचएपी का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर हीट रिस्क और संवेदनशील आबादी की पहचान करना तथा अल्पकालिक, मध्यमकालिक और दीर्घकालिक उपायों की रूपरेखा तैयार करना है। 
  • हालाँकि, योजनाओं की संख्या और उनका प्रभावी क्रियान्वयन अभी अपर्याप्त है। 23 हीटवेव-प्रवण राज्यों में लगभग 300 शहरों और जिलों के पास एचएपी हैं, जबकि बड़ी संख्या में शहरी स्थानीय निकाय और जिले अभी इनके दायरे से बाहर हैं। 
  • इसके पीछे वित्तीय संसाधनों की कमी, तकनीकी क्षमता का अभाव और विभागों के बीच समन्वय की कमजोरी जैसे कारण हैं। इसलिए केवल एचएपी तैयार करना पर्याप्त नहीं है। योजनाओं को स्पष्ट बजट, जिम्मेदार संस्थाओं, समयसीमा और मापनीय परिणामों से जोड़ना होगा। 

प्रमुख चुनौतियाँ 

  • पहली चुनौती स्थानीय संस्थागत क्षमता की है। अनेक नगर निकायों के पास हीट-रिस्क का वैज्ञानिक आकलन करने और वित्त-पोषण योग्य परियोजनाएँ तैयार करने की पर्याप्त विशेषज्ञता नहीं है।
  • दूसरी चुनौती स्वास्थ्य संबंधी डेटा की है। हीटवेव से होने वाली मौतों और बीमारियों का वास्तविक आकलन कठिन है। केवल हीटस्ट्रोक को दर्ज करना पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि गर्मी हृदय, श्वसन और गुर्दे की बीमारियों को भी प्रभावित करती है। बेहतर डेटा के बिना राहत और नीति-निर्माण दोनों प्रभावित होंगे। 
  • तीसरी चुनौती क्षेत्रीय विविधता की है। भारत में गर्मी का स्वरूप हर क्षेत्र में अलग है। शुष्क और गर्म दिल्ली के लिए प्रभावी उपाय अधिक आर्द्र कोलकाता या तटीय क्षेत्रों में समान रूप से उपयोगी नहीं हो सकते। इसलिए ‘एक समाधान सबके लिए’ के बजाय स्थानीय जलवायु और सामाजिक परिस्थितियों पर आधारित रणनीति आवश्यक है। 
  • चौथी चुनौती वित्तीय अभिसरण की है। हीटवेव से निपटने को केवल आपदा प्रबंधन विभाग की जिम्मेदारी नहीं माना जा सकता। स्वास्थ्य, आवास, जल, ऊर्जा, शहरी विकास और ग्रामीण विकास की योजनाओं को भी इससे जोड़ा जाना चाहिए। 

आगे की राह 

  • भारत को हीटवेव प्रबंधन के लिए बहु-स्तरीय रणनीति अपनानी होगी। प्रत्येक उच्च जोखिम वाले जिले और शहरी स्थानीय निकाय के लिए प्रभावी एचएपी तैयार किया जाना चाहिए। इन योजनाओं को पर्याप्त बजट और स्पष्ट जवाबदेही से जोड़ना आवश्यक है।
  • एसडीएमएफ के माध्यम से दीर्घकालिक ताप-लचीलापन परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। शहरों में वृक्षारोपण, जल निकायों का संरक्षण, कूल रूफ, हरित-नीला बुनियादी ढाँचा और ऊर्जा-कुशल भवनों को बढ़ावा दिया जा सकता है।
  • साथ ही स्वास्थ्य निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना होगा, ताकि गर्मी से संबंधित प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष स्वास्थ्य प्रभावों का विश्वसनीय डेटा उपलब्ध हो। विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, एनजीओ और निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता का उपयोग स्थानीय निकायों की तकनीकी क्षमता बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।
  • इसके अतिरिक्त पैरामीट्रिक इंश्योरेंस जैसे वित्तीय साधनों पर भी विचार किया जाना चाहिए। इसमें पूर्व-निर्धारित तापमान सीमा पार होने पर नुकसान का लंबा आकलन किए बिना स्वतः भुगतान किया जा सकता है। इससे आपदा के समय वित्तीय सहायता तेजी से उपलब्ध हो सकती है।  

निष्कर्ष 

  • हीटवेव को अधिसूचित प्राकृतिक आपदा का दर्जा देना भारत की आपदा प्रबंधन व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण संस्थागत बदलाव है। इससे अत्यधिक गर्मी को केवल मौसमी घटना नहीं, बल्कि गंभीर आपदा और विकास संबंधी चुनौती के रूप में स्वीकार किया गया है। साथ ही राज्यों को राहत, अनुकूलन और दीर्घकालिक जोखिम न्यूनीकरण के लिए वित्तीय संसाधनों का बेहतर उपयोग करने का अवसर मिलता है।
  • हालाँकि, इस नीति की वास्तविक सफलता केवल अधिक धन उपलब्ध कराने से सुनिश्चित नहीं होगी। इसके लिए वैज्ञानिक जोखिम आकलन, स्थानीय स्तर पर प्रभावी हीट एक्शन प्लान, मजबूत स्वास्थ्य निगरानी, पर्याप्त तकनीकी क्षमता और विभिन्न सरकारी योजनाओं के बीच वित्तीय अभिसरण आवश्यक है।
  • अंततः भारत को ऐसी रणनीति अपनानी होगी जिसमें आपदा आने के बाद राहत देने के बजाय आपदा बनने से पहले जोखिम को कम किया जाए। यही दृष्टिकोण बढ़ते जलवायु परिवर्तन के दौर में भारत को अधिक सुरक्षित, स्वस्थ और जलवायु-लचीला बनाने की दिशा में निर्णायक साबित होगा।
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