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आईबीसी बनाम पीएमएलए: क्या दिवालियापन का संरक्षण आपराधिक संपत्तियों को ईडी से बचा सकता है?

संदर्भ  

  • दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) और धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के बीच अधिकार-क्षेत्र को लेकर लंबे समय से कानूनी बहस चलती रही है। इस बहस पर राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) ने हाल ही में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि आईबीसी के तहत लागू मोराटोरियम (स्थगन अवधि) उन संपत्तियों की रक्षा नहीं करता, जिन्हें धन शोधन निवारण अधिनियम के अंतर्गत अपराध से अर्जित संपत्ति (Proceeds of Crime) माना गया है।  
  • यह निर्णय सिद्धि विनायक लॉजिस्टिक्स लिमिटेड से जुड़े मामले में दिया गया। कंपनी के दिवाला प्रक्रिया में प्रवेश करने के बाद भी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने उसकी संपत्तियों को कुर्क किया था। 30 जून को दिए गए अपने फैसले में एनसीएलएटी की प्रधान पीठ ने कहा कि संसद ने आईबीसी को इस उद्देश्य से नहीं बनाया कि वह एक ऐसी पवित्र गंगा बन जाए, जो कॉरपोरेट देनदार के कथित आपराधिक कृत्यों को धोकर अवैध संपत्ति को वैध बना दे।

क्या है पूरा मामला ? 

  • यह मामला सिद्धि विनायक लॉजिस्टिक्स लिमिटेड के प्रमोटरों पर लगे गंभीर आरोपों से जुड़ा है। उन पर 1,600 करोड़ रुपये से अधिक के बैंक ऋण घोटाले, जालसाजी, आपराधिक षड्यंत्र और ऋण राशि के दुरुपयोग के आरोप हैं। 
  • वर्ष 2017 में ईडी ने पीएमएलए के तहत जांच शुरू करते हुए कंपनी की कुछ संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क कर लिया। इसके कुछ समय बाद कंपनी के विरुद्ध कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) शुरू हुई, जिसके साथ ही आईबीसी की धारा 14 के तहत मोराटोरियम प्रभावी हो गया। 
  • आईबीसी में मोराटोरियम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दिवाला समाधान प्रक्रिया के दौरान कंपनी की परिसंपत्तियां सुरक्षित रहें। इस अवधि में कंपनी के विरुद्ध ऋण वसूली, सुरक्षा हितों के प्रवर्तन, संपत्तियों की बिक्री या हस्तांतरण तथा कुछ अन्य कानूनी कार्रवाइयों पर रोक रहती है, ताकि लेनदारों के हितों की रक्षा की जा सके।

आईबीसी (IBC) धारा 14 (मोराटोरियम): इसके तहत दिवाला प्रक्रिया के दौरान ऋण वसूली, संपत्ति की बिक्री या हस्तांतरण जैसी सभी कानूनी कार्रवाइयों पर रोक लग जाती है।

  • इसके बावजूद, मोराटोरियम लागू रहने के दौरान ईडी ने कंपनी के एक बैंक खाते से 2.29 करोड़ रुपये निकाल लिए। बाद में वर्ष 2019 में, जब कंपनी परिसमापन (लिक्विडेशन) की प्रक्रिया में थी, तब ईडी ने कंपनी के 6,000 से अधिक वाहनों को भी अस्थायी रूप से कुर्क कर लिया। 
  • कंपनी के परिसमापक ने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में यह कहते हुए चुनौती दी कि ईडी की कार्रवाई आईबीसी के मोराटोरियम का उल्लंघन है, क्योंकि इससे लेनदारों के लिए उपलब्ध संपत्तियां कम हो रही हैं। हालांकि, एनसीएलटी ने यह याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद मामला एनसीएलएटी पहुँचा। 

आईबीसी और पीएमएलए के बीच विवाद क्यों ? 

इस विवाद की जड़ दोनों कानूनों के अलग-अलग उद्देश्यों में निहित है। 

  • आईबीसी का मुख्य उद्देश्य वित्तीय संकट से जूझ रही कंपनियों का समाधान करना, उनकी परिसंपत्तियों का संरक्षण करना और लेनदारों को व्यवस्थित ढंग से उनका बकाया दिलाना है। इसी कारण धारा 14 के तहत मोराटोरियम लागू किया जाता है, जिससे दिवाला प्रक्रिया के दौरान कंपनी के विरुद्ध अधिकांश वसूली संबंधी कार्रवाइयों पर रोक लग जाती है।
  • दूसरी ओर, पीएमएलए का उद्देश्य अपराध से अर्जित संपत्तियों की पहचान करना, उन्हें कुर्क करना और आवश्यक होने पर जब्त करना है। इसके तहत ईडी को ऐसे मामलों में कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त है। 
  • इसी वजह से यह कानूनी प्रश्न सामने आया कि यदि कोई संपत्ति एक ओर दिवाला प्रक्रिया के तहत संरक्षित है और दूसरी ओर उसे अपराध से अर्जित संपत्ति बताया जा रहा है, तो ऐसी स्थिति में किस कानून को प्राथमिकता मिलेगी।

एनसीएलएटी का फैसला क्या कहता है? 

  • एनसीएलएटी ने स्पष्ट किया कि यह विवाद किसी परिसमापक और ईडी के बीच नहीं, बल्कि दो अलग-अलग कानूनों के बीच अधिकार-क्षेत्र का प्रश्न है। न्यायाधिकरण के अनुसार, दोनों कानून अपने-अपने उद्देश्य और क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से लागू होते हैं।
  • फैसले में कहा गया कि आईबीसी का उद्देश्य केवल कंपनी की वैध रूप से अर्जित संपत्तियों का अधिकतम मूल्य सुनिश्चित करना और लेनदारों के हितों की रक्षा करना है। इस कानून का प्रयोग अवैध तरीके से अर्जित संपत्ति को संरक्षण देने या उसे वैध बनाने के लिए नहीं किया जा सकता।
  • इसी आधार पर न्यायाधिकरण ने कहा कि आईबीसी की धारा 14 के तहत मिलने वाला मोराटोरियम केवल वैध परिसंपत्तियों तक सीमित है। जिन संपत्तियों को पीएमएलए के तहत अपराध से अर्जित संपत्ति माना गया है, वे इस संरक्षण के दायरे में नहीं आतीं।
  • न्यायाधिकरण ने यह भी माना कि दिवाला प्रक्रिया में लेनदारों को कई बार अपने दावों की पूरी राशि नहीं मिलती, फिर भी इस आधार पर पीएमएलए के पीछे निहित राष्ट्रीय हित को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 
  • इसी संदर्भ में पीठ ने कहा कि संसद ने आईबीसी को ऐसी पवित्र गंगा बनाने के उद्देश्य से नहीं बनाया, जो किसी कॉरपोरेट देनदार की कथित आपराधिक गतिविधियों को धोकर उसकी अवैध संपत्ति को वैधता प्रदान कर दे।  

न्यायिक अधिकार-क्षेत्र पर भी स्पष्टता 

  • एनसीएलएटी ने यह भी स्पष्ट किया कि एनसीएलटी और एनसीएलएटी जैसे दिवाला न्यायाधिकरणों को पीएमएलए के तहत ईडी द्वारा जारी कुर्की आदेशों की वैधता की जांच करने का अधिकार नहीं है। 
  • इस संबंध में न्यायाधिकरण ने एम्बेसी प्रॉपर्टी डेवलपमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम कर्नाटक राज्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि किसी पक्ष को ईडी की कार्रवाई को चुनौती देनी है, तो उसे पीएमएलए के तहत निर्धारित विशेष न्यायिक व्यवस्था का ही सहारा लेना होगा। 
  • साथ ही, न्यायाधिकरण ने वर्ष 2025 में भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड (आईबीबीआई) द्वारा जारी उस परिपत्र का भी उल्लेख किया, जिसमें दिवाला पेशेवरों को सलाह दी गई थी कि कुर्क की गई संपत्तियों की वापसी के लिए वे पीएमएलए के अंतर्गत गठित विशेष न्यायालय में आवेदन करें। 

निष्कर्ष 

एनसीएलएटी के इस निर्णय ने यह कानूनी स्थिति स्पष्ट कर दी है कि आईबीसी के तहत चल रही दिवाला प्रक्रिया ईडी को उन संपत्तियों पर कार्रवाई करने से नहीं रोक सकती, जिन्हें पीएमएलए के अंतर्गत अपराध से अर्जित संपत्ति माना गया है। दूसरे शब्दों में, मोराटोरियम का संरक्षण केवल वैध संपत्तियों तक सीमित है, जबकि कथित अवैध संपत्तियों पर ईडी की कार्रवाई जारी रह सकती है।  

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