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भारत-रूस लॉजिस्टिक्स समझौता (RELOS)

चर्चा में क्यों ?

हाल ही में भारत और रूस के बीच लागू हुए Reciprocal Exchange of Logistics Agreement (RELOS) को लेकर सोशल मीडिया पर यह दावा किया गया कि इसके तहत भारत में 3,000 रूसी सैनिकों की स्थायी तैनाती की अनुमति दी गई है। हालांकि, यह दावा भ्रामक है। वास्तव में RELOS एक लॉजिस्टिक सहयोग समझौता है, न कि कोई सैन्य गठबंधन या सैन्य अड्डा स्थापित करने का प्रावधान।

लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट (LSA) क्या हैं ?

  • लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट ऐसे प्रशासनिक एवं सैन्य सहयोग समझौते होते हैं जो दो देशों की सेनाओं को एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं का उपयोग करने की अनुमति देते हैं। 
  • इनके अंतर्गत ईंधन, भोजन, चिकित्सा सहायता, मरम्मत, रखरखाव, परिवहन, भंडारण तथा बंदरगाह सेवाएं जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
  • इनका उद्देश्य संयुक्त सैन्य अभ्यासों, प्रशिक्षण, मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) अभियानों तथा नौसैनिक यात्राओं को सुगम बनाना है। ऐसे समझौते किसी सैन्य गठबंधन का संकेत नहीं देते।

भारत के अन्य लॉजिस्टिक्स समझौते

  • भारत पहले से ही अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, वियतनाम और रूस सहित कई देशों के साथ इसी प्रकार के लॉजिस्टिक समझौते कर चुका है। 
  • ओमान के साथ भी व्यापक रक्षा सहयोग व्यवस्था के अंतर्गत ऐसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
  • भारत का पहला प्रमुख लॉजिस्टिक्स समझौता LEMOA (Logistics Exchange Memorandum of Agreement) था, जिसे 2016 में अमेरिका के साथ हस्ताक्षरित किया गया था। 
  • भारत सरकार ने स्पष्ट किया था कि LEMOA किसी भी प्रकार के विदेशी सैन्य अड्डे की स्थापना की अनुमति नहीं देता।

Reciprocal Exchange of Logistics Agreement (RELOS) क्या है ?

  • Reciprocal Exchange of Logistics Agreement (RELOS) भारत और रूस के बीच एक द्विपक्षीय लॉजिस्टिक सहयोग समझौता है।
  • भारत और रूस के बीच पारस्परिक लॉजिस्टिक सहायता समझौते (RELOS) पर 18 फरवरी 2025 को मॉस्को में हस्ताक्षर किए गए थे। 
  • इसके बाद रूस ने 15 दिसंबर 2025 को इसका अनुमोदन किया और यह समझौता जनवरी 2026 से प्रभावी हो गया।
  • इसकी प्रारंभिक वैधता अवधि 5 वर्ष निर्धारित की गई है।

RELOS के प्रमुख प्रावधान

  • इस समझौते के तहत दोनों देशों की सेनाएं निम्नलिखित सुविधाओं का पारस्परिक उपयोग कर सकेंगी-
  • सैन्य जहाजों की बंदरगाह यात्राएं (Port Calls)
  • सैन्य विमानों द्वारा हवाई अड्डों और एयरबेस का उपयोग
  • संयुक्त सैन्य अभ्यास और प्रशिक्षण
  • मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) अभियान
  • मरम्मत एवं रखरखाव सेवाएं
  • चिकित्सा सहायता
  • भोजन, ईंधन एवं तकनीकी संसाधनों की आपूर्ति
  • सैन्य कर्मियों एवं प्लेटफॉर्मों को लॉजिस्टिक सहायता

3,000 सैनिकों की तैनाती वाला दावा क्यों गलत है ?

  • RELOS में 3,000 सैनिकों की एक अधिकतम सीमा (Upper Ceiling) का उल्लेख अवश्य है, लेकिन इसका अर्थ स्थायी सैन्य तैनाती नहीं है।
  • यह सीमा उन परिस्थितियों के लिए निर्धारित की गई है जब संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण कार्यक्रम, नौसैनिक यात्राएं या अन्य सहमत गतिविधियां आयोजित की जाएं। 
  • इसमें जहाजों, विमानों और सैनिकों की संभावित संख्या को ध्यान में रखा गया है।
  • भारत और रूस दोनों पक्षों ने स्पष्ट किया है कि समझौते में किसी भी प्रकार की स्थायी या दीर्घकालिक सैन्य तैनाती का प्रावधान नहीं है। 
  • सैनिकों और सैन्य परिसंपत्तियों की मौजूदगी केवल पारस्परिक सहमति से होने वाले सीमित अवधि के कार्यक्रमों तक ही रहेगी।

RELOS का रणनीतिक महत्व: आर्कटिक आयाम

  • RELOS का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारत को रूस की आर्कटिक क्षेत्र स्थित सैन्य एवं लॉजिस्टिक सुविधाओं तक पहुंच प्रदान करना है।

इसका महत्व

  • जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक में नई समुद्री नौवहन मार्ग (Shipping Routes) खुल रहे हैं।
  • रूस आर्कटिक क्षेत्र में प्रमुख शक्ति है और वहां व्यापक सैन्य एवं बुनियादी ढांचा नेटवर्क रखता है।
  • भारत की आर्कटिक नीति (Arctic Policy) के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में यह समझौता सहायक होगा।
  • इससे ऊर्जा, व्यापार, समुद्री सुरक्षा तथा वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्रों में भारत-रूस सहयोग को नई गति मिलेगी।

व्यावहारिक उपयोगिता

  • भारत ने पहले भी ऐसे समझौतों का प्रभावी उपयोग किया है-
  • अदन की खाड़ी में एंटी-पाइरेसी अभियान के दौरान भारतीय नौसेना ने विदेशी लॉजिस्टिक सुविधाओं का उपयोग किया।
  • पूर्वी लद्दाख संकट (2020) के समय अमेरिका के साथ लॉजिस्टिक समझौते के माध्यम से उच्च ऊंचाई वाले विशेष सैन्य उपकरण और कपड़ों की उपलब्धता सुनिश्चित की गई।
  • ब्रिटिश नौसैनिक जहाजों ने भारतीय शिपयार्ड में मरम्मत और स्पेयर पार्ट्स सहायता प्राप्त की।

निष्कर्ष

भारत-रूस RELOS समझौता किसी सैन्य गठबंधन या विदेशी सैनिकों की स्थायी तैनाती का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक मानक लॉजिस्टिक सहयोग व्यवस्था है। भारत ऐसे कई समझौते पहले से अन्य देशों के साथ कर चुका है। इसलिए 3,000 रूसी सैनिकों की तैनाती संबंधी दावे तथ्यात्मक रूप से गलत हैं। इस समझौते का वास्तविक महत्व भारत की बढ़ती सामरिक पहुंच, विशेषकर आर्कटिक क्षेत्र में सहयोग और वैश्विक सैन्य-लॉजिस्टिक नेटवर्क को मजबूत करने में निहित है।

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