चर्चा में क्यों ?
- भारत ने अपनी समुद्री सुरक्षा क्षमताओं को और मजबूत करते हुए जून 2026 को भारतीय नौसेना में तीन अत्याधुनिक स्वदेशी युद्धपोतों-INS दुनागिरी, INS संशोधक और INS अग्रय-को शामिल किया। कोलकाता में आयोजित समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन तीनों जहाजों को नौसेना को समर्पित किया।
- इन जहाजों का निर्माण गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE), कोलकाता द्वारा किया गया है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार तीनों पोतों में 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है तथा इनके निर्माण में 200 से अधिक MSMEs की भागीदारी रही है।

क्यों खास है यह ‘ट्रिपल कमीशनिंग’ ?
- इन तीनों जहाजों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये भारतीय नौसेना को तीन अलग-अलग रणनीतिक क्षमताएं प्रदान करते हैं-
- गहरे समुद्र में युद्ध संचालन
- समुद्री सर्वेक्षण और निगरानी
- तटीय क्षेत्रों में पनडुब्बी रोधी सुरक्षा
- यही कारण है कि इसे भारतीय नौसेना की क्षमता निर्माण यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है।
3 स्वदेशी युद्धपोत बारे में
INS दुनागिरी: गहरे समुद्र का शक्तिशाली योद्धा
- INS दुनागिरी तीनों जहाजों में सबसे बड़ा और सबसे अधिक हथियारों से लैस युद्धपोत है। यह प्रोजेक्ट-17A के तहत निर्मित एक अत्याधुनिक स्टील्थ गाइडेड-मिसाइल फ्रिगेट है।
प्रमुख विशेषताएं
- ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल से लैस
- मध्यम दूरी की वायु रक्षा प्रणाली (MRSAM)
- MFSTAR मल्टी-फंक्शन रडार
- अत्याधुनिक सोनार एवं इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली
- पनडुब्बी रोधी हथियारों से सुसज्जित
- यह युद्धपोत गहरे समुद्र (Blue Water) में लंबी दूरी तक अभियान चलाने और विभिन्न प्रकार के खतरों का सामना करने में सक्षम है।
INS संशोधक: समुद्र का वैज्ञानिक मानचित्रकार
- INS संशोधक एक सर्वे वेसल-लार्ज (Survey Vessel Large - SVL) है, जिसका मुख्य कार्य समुद्र की गहराई, समुद्री तल, नौवहन मार्गों और महासागरीय परिस्थितियों का अध्ययन करना है।
प्रमुख विशेषताएं
- ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल (AUV)
- रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल (ROV)
- मल्टी-बीम इको साउंडर
- आधुनिक हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण प्रणाली
- यह जहाज नौसेना अभियानों के अलावा सुरक्षित नौवहन, समुद्री अनुसंधान, तटीय विकास और आपदा प्रबंधन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
INS अग्रय: तटीय क्षेत्रों का पनडुब्बी शिकारी
- INS अग्रय एक एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट (ASW-SWC) है। इसे विशेष रूप से तटीय क्षेत्रों, बंदरगाहों और नौसैनिक अड्डों के आसपास दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें नष्ट करने के लिए विकसित किया गया है।
प्रमुख विशेषताएं
- अत्याधुनिक सोनार प्रणाली
- हल्के टॉरपीडो
- स्वदेशी एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर
- उथले जलक्षेत्रों में प्रभावी संचालन क्षमता
- तटीय जलक्षेत्रों में पनडुब्बियों का पता लगाना अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि यहां समुद्री यातायात, मछली पकड़ने वाली नौकाएं और समुद्री भू-आकृतियां निगरानी को जटिल बना देती हैं। INS अग्रय इसी चुनौती से निपटने के लिए तैयार किया गया है।
भारतीय नौसेना को क्या मिलेगा लाभ ?
तीनों जहाजों के एक साथ शामिल होने से भारतीय नौसेना की क्षमता तीन स्तरों पर मजबूत होगी-
1. ब्लू-वॉटर ऑपरेशन
- INS दुनागिरी गहरे समुद्र में भारत की सैन्य उपस्थिति और शक्ति प्रदर्शन को मजबूत करेगा।
2. समुद्री क्षेत्र जागरूकता (Maritime Domain Awareness)
- INS संशोधक समुद्री भूगोल और नौवहन संबंधी सटीक जानकारी उपलब्ध कराएगा।
3. तटीय सुरक्षा
- INS अग्रय भारत के तटीय क्षेत्रों को पनडुब्बी खतरों से सुरक्षित बनाएगा।
भारतीय नौसेना की बढ़ती समुद्री शक्ति
- भारतीय नौसेना के पास वर्तमान में लगभग 140-145 सक्रिय युद्धपोत (Warships) हैं।
- नौसेना का लक्ष्य वर्ष 2030 तक युद्धपोतों की संख्या बढ़ाकर 150-160 करने का है, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की सामरिक उपस्थिति और अधिक मजबूत हो सके।
तैनाती और रणनीतिक महत्व
- पूर्वी नौसैनिक कमान (विशाखापट्टनम) के युद्धपोत बंगाल की खाड़ी, अंडमान सागर और मलक्का जलडमरूमध्य क्षेत्र में निगरानी रखते हैं तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक उपस्थिति को मजबूत करते हैं।
- पश्चिमी नौसैनिक कमान (मुंबई एवं कारवाड़) के जहाज अरब सागर में समुद्री सुरक्षा, पाकिस्तान की गतिविधियों पर निगरानी तथा समुद्री डकैती से व्यापारिक जहाजों की रक्षा का दायित्व निभाते हैं।
- अंडमान एवं निकोबार कमान भारत की एकमात्र त्रि-सेवा (Tri-Service) कमान है, जो मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित होने के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक भूमिका निभाती है।
युद्धपोत क्यों हैं महत्वपूर्ण ?
- वैश्विक व्यापार का लगभग 90% हिस्सा समुद्री मार्गों से संचालित होता है।
- युद्धपोत समुद्री व्यापार मार्गों, ऊर्जा आपूर्ति और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।
- आधुनिक युद्धपोत मिसाइल, रडार, हेलीकॉप्टर, ड्रोन और उन्नत संचार प्रणालियों से लैस होते हैं।
- इन्हें समुद्र में "तैरते हुए सैन्य अड्डे (Floating Military Bases)" माना जाता है, जो युद्ध, निगरानी, मानवीय सहायता और आपदा राहत जैसे अनेक कार्यों को अंजाम दे सकते हैं।
समुद्र में बढ़ी भारत की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता
- भारत की समुद्री परमाणु शक्ति लगातार मजबूत हो रही है। विशेष रूप से INS Arihant जैसी परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां देश की "सेकेंड स्ट्राइक कैपेसिटी" का महत्वपूर्ण आधार बन चुकी हैं।
- सेकेंड स्ट्राइक क्षमता का अर्थ है कि यदि किसी दुश्मन देश द्वारा पहले परमाणु हमला किया जाता है, तब भी भारत प्रभावी जवाबी परमाणु हमला करने में सक्षम रहेगा।
- भारत की परमाणु त्रयी (Nuclear Triad) का समुद्री घटक लगातार मजबूत हो रहा है।
- परमाणु पनडुब्बियां समुद्र में लंबे समय तक गुप्त रूप से तैनात रह सकती हैं, जिससे उनका पता लगाना कठिन होता है।
- Stockholm International Peace Research Institute (SIPRI) के अनुसार भारत अब शांतिकाल में भी सीमित संख्या में परमाणु हथियारों को बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों पर तैनात करने लगा है।
- इससे भारत की विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता (Credible Minimum Deterrence) और परमाणु सुरक्षा मजबूत होती है।
- समुद्र आधारित परमाणु हथियार भारत की 'नो फर्स्ट यूज़' (No First Use) नीति को प्रभावी समर्थन प्रदान करते हैं।
आत्मनिर्भर भारत की बड़ी सफलता
- तीनों जहाजों का स्वदेशी निर्माण भारत के रक्षा उत्पादन क्षेत्र की बढ़ती क्षमता को दर्शाता है। विभिन्न प्रकार के मिशनों के लिए अलग-अलग तकनीकों से लैस जहाजों का देश में निर्माण यह साबित करता है कि भारत अब उन्नत नौसैनिक प्लेटफॉर्म विकसित करने में आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रहा है।
निष्कर्ष
हिंद महासागर क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान की बढ़ती नौसैनिक गतिविधियों के बीच INS दुनागिरी, INS संशोधक और INS अग्रय का नौसेना में शामिल होना भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये तीनों जहाज मिलकर भारतीय नौसेना को गहरे समुद्र से लेकर तटीय क्षेत्रों तक एक मजबूत और बहुस्तरीय सुरक्षा कवच प्रदान करेंगे।