मध्य एशिया में भारत की बढ़ती रणनीतिक सक्रियता

संदर्भ  

  • प्रधानमंत्री मोदी मध्य एशिया के दौरे पर हैं। वे 29-30 अगस्त को द्विपक्षीय दौरे पर उज्बेकिस्तान की यात्रा के पश्चात वे 31 अगस्त से 1 सितंबर तक किर्गिज़ गणराज्य में आयोजित होने वाले 26वें शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे। 
  • मध्य एशिया भारत की विदेश नीति में एक महत्त्वपूर्ण विस्तारित पड़ोस (Extended Neighbourhood) के रूप में उभर रहा है। कजाखस्तान, किर्गिज गणराज्य, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान से मिलकर बना यह क्षेत्र भौगोलिक रूप से भारत से अपेक्षाकृत दूर होने के बावजूद ऊर्जा, खनिज संसाधन, सुरक्षा, संपर्क-सुविधा और सामरिक प्रतिस्पर्धा की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। 
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मध्य एशिया संबंधी सक्रियता इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है। भारत ने 2012 में ‘कनेक्ट सेंट्रल एशिया’ नीति के माध्यम से इस क्षेत्र के साथ अपने संबंधों को अधिक व्यवस्थित रूप दिया। वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा पाँचों मध्य एशियाई देशों की यात्रा ने इस नीति को नई गति प्रदान की।  

मध्य एशिया का बढ़ता वैश्विक महत्त्व  

  • सोवियत संघ के विघटन के बाद लंबे समय तक मध्य एशिया को मुख्यतः रूस के प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखा जाता रहा। रूसी भाषा और रूसी सांस्कृतिक प्रभाव आज भी क्षेत्र में मौजूद हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में चीन, अमेरिका, यूरोप, तुर्की और भारत जैसी शक्तियों की बढ़ती सक्रियता ने इस क्षेत्र को वैश्विक भू-राजनीति का महत्त्वपूर्ण केंद्र बना दिया है। 
  • चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के कारण मध्य एशिया में उसका आर्थिक एवं रणनीतिक प्रभाव तेजी से बढ़ा है। इसी प्रकार इस क्षेत्र की ऊर्जा और खनिज संपदा ने इसे वैश्विक शक्तियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना दिया है।

संसाधनों की दृष्टि से महत्त्व 

  • कजाखस्तान — यूरेनियम के विशाल भंडार के साथ कोयला, सोना, लौह अयस्क, सीसा और जस्ता।
  • किर्गिज गणराज्य — स्वर्ण संसाधन तथा जलविद्युत की पर्याप्त संभावनाएँ।
  • तुर्कमेनिस्तान — प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार।
  • ताजिकिस्तान — जलविद्युत उत्पादन की बड़ी क्षमता।
  • उज्बेकिस्तान — सोना, यूरेनियम और प्राकृतिक गैस के महत्त्वपूर्ण भंडार। 

इस संसाधन-संपन्नता के कारण मध्य एशिया भारत की ऊर्जा एवं आर्थिक सुरक्षा के लिए उपयोगी क्षेत्र बन जाता है।

भारत के लिए मध्य एशिया का रणनीतिक महत्त्व 

1. सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी सहयोग 

  • अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद मध्य एशिया की सुरक्षा परिस्थितियाँ भारत के लिए और महत्त्वपूर्ण हो गई हैं। अफगानिस्तान से उत्पन्न आतंकवाद, कट्टरपंथ, हथियारों एवं मादक पदार्थों की तस्करी तथा चरमपंथी संगठनों की गतिविधियाँ मध्य एशियाई देशों और भारत दोनों के लिए चुनौती हैं। इसलिए भारत के लिए क्षेत्रीय देशों के साथ खुफिया जानकारी साझा करना, आतंकवाद-रोधी सहयोग और सीमा सुरक्षा महत्त्वपूर्ण हैं।

2. चीन के बढ़ते प्रभाव का संतुलन 

  • चीन ने बीआरआई के माध्यम से मध्य एशिया में बुनियादी ढाँचे, परिवहन और ऊर्जा परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। भारत चीन के साथ प्रत्यक्ष टकराव के बजाय मध्य एशियाई देशों के साथ स्वतंत्र और बहुआयामी संबंधों को मजबूत करके अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करना चाहता है। 

3. ऊर्जा सुरक्षा

  • भारत की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकता को देखते हुए मध्य एशिया महत्त्वपूर्ण संभावनाएँ प्रस्तुत करता है। कजाखस्तान का यूरेनियम भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए उपयोगी है, जबकि तुर्कमेनिस्तान की गैस संपदा भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए आकर्षक है। TAPI (Turkmenistan-Afghanistan-Pakistan-India) गैस पाइपलाइन इस संदर्भ में एक महत्त्वाकांक्षी परियोजना है, हालांकि इसके सामने सुरक्षा और भू-राजनीतिक चुनौतियाँ बनी हुई हैं। 

4. संपर्क और कनेक्टिविटी 

  • भारत की सबसे बड़ी भौगोलिक चुनौती यह है कि पाकिस्तान के कारण मध्य एशिया तक उसका सीधा स्थलीय मार्ग उपलब्ध नहीं है। इस बाधा को दूर करने के लिए भारत अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) और ईरान के चाबहार बंदरगाह को महत्त्व देता है।  
  • चाबहार के माध्यम से भारत ईरान और आगे मध्य एशिया तक वैकल्पिक संपर्क विकसित कर सकता है। इससे व्यापार, ऊर्जा एवं सामरिक पहुँच को बढ़ावा मिल सकता है।  

5. ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंध 

  • भारत और मध्य एशिया के संबंध आधुनिक कूटनीति से कहीं पुराने हैं। व्यापार, बौद्ध धर्म, सूफी परंपराओं, कला, साहित्य और रेशम मार्ग के माध्यम से दोनों क्षेत्रों के बीच सदियों से संपर्क रहा है।
  • विशेष रूप से उज्बेकिस्तान के साथ भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध उल्लेखनीय हैं। उज्बेकिस्तान के तेरमेज क्षेत्र में स्थित कारा तेपा बौद्ध परंपरा से जुड़े प्राचीन स्थलों में शामिल है। भारत और उज्बेकिस्तान की भाषाओं तथा खान-पान में भी कई समानताएँ देखने को मिलती हैं। 

उज्बेकिस्तान का विशेष महत्त्व 

  • मध्य एशिया में उज्बेकिस्तान भारत के लिए विशेष रणनीतिक महत्त्व रखता है। यह क्षेत्र का जनसंख्या की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण देश है और मध्य एशिया के केंद्र में स्थित होने के कारण क्षेत्रीय संपर्क में इसकी भूमिका अहम है। 
  • भारत और उज्बेकिस्तान के बीच व्यापार एवं आर्थिक सहयोग में भी वृद्धि हुई है। दोनों देश सूचना प्रौद्योगिकी, फार्मास्यूटिकल्स, कृषि, शिक्षा, रक्षा तथा ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएँ तलाश रहे हैं। 

भारत के सामने प्रमुख चुनौतियाँ 

  • भौगोलिक बाधा: भारत और मध्य एशिया के बीच प्रत्यक्ष भूमि संपर्क का अभाव सबसे बड़ी चुनौती है। पाकिस्तान के साथ संबंधों के कारण पारंपरिक स्थलीय व्यापार मार्ग भारत के लिए उपलब्ध नहीं हैं।
  • चीन की आर्थिक बढ़त: चीन की विशाल वित्तीय क्षमता और बीआरआई के कारण मध्य एशिया में उसका आर्थिक प्रभाव भारत की तुलना में काफी अधिक है। भारत को सीमित संसाधनों के बावजूद प्रभावी और दीर्घकालिक साझेदारी विकसित करनी होगी।
  • अफगानिस्तान की अस्थिरता: अफगानिस्तान में अस्थिरता मध्य एशिया और भारत दोनों की सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है। आतंकवादी संगठनों की गतिविधियाँ तथा कट्टरपंथ का प्रसार क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती हैं।
  • रूस-यूक्रेन युद्ध का प्रभाव: रूस-यूक्रेन संघर्ष ने मध्य एशिया की भू-राजनीति और अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। रूस से लोगों का मध्य एशियाई देशों की ओर प्रवास कुछ देशों के लिए कौशल एवं पूंजी का स्रोत बन सकता है, लेकिन इससे सामाजिक और राजनीतिक दबाव भी पैदा हो सकते हैं। 
  • सीमित आर्थिक संपर्क: भारत-मध्य एशिया व्यापार अभी अपनी वास्तविक क्षमता से काफी नीचे है। परिवहन लागत, बैंकिंग एवं भुगतान तंत्र, निवेश बाधाएँ और सीमित संपर्क आर्थिक संबंधों के विस्तार में अड़चन हैं। 

बहुपक्षीय मंचों की भूमिका 

  • भारत मध्य एशियाई देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों के अलावा शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से भी जुड़ाव बढ़ा रहा है। इससे आतंकवाद-रोधी सहयोग, क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक संपर्क और राजनीतिक संवाद को बढ़ावा देने का अवसर मिलता है। 
  • जनवरी 2022 में मध्य एशियाई देशों के नेताओं को भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में आमंत्रित किया जाना भी भारत द्वारा इस क्षेत्र को दिए जा रहे महत्त्व का प्रतीक था। 

आगे की राह 

भारत को मध्य एशिया के साथ संबंधों को केवल चीन के प्रभाव को संतुलित करने के दृष्टिकोण तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इसके बजाय एक स्वतंत्र, बहुआयामी और दीर्घकालिक साझेदारी विकसित करनी चाहिए। इसके लिए भारत को - 

  • चाबहार और INSTC जैसी कनेक्टिविटी परियोजनाओं को तेज करना चाहिए।
  • ऊर्जा एवं खनिज संसाधनों के क्षेत्र में दीर्घकालिक समझौते बढ़ाने चाहिए।
  • फार्मास्यूटिकल्स, IT, डिजिटल तकनीक और शिक्षा में सहयोग बढ़ाना चाहिए।
  • आतंकवाद और कट्टरपंथ के विरुद्ध सुरक्षा सहयोग मजबूत करना चाहिए।
  • सांस्कृतिक और शैक्षिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना चाहिए।
  • SCO और अन्य क्षेत्रीय मंचों का प्रभावी उपयोग करना चाहिए।
  • मध्य एशिया के प्रत्येक देश की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप अलग-अलग रणनीति विकसित करनी चाहिए। 

निष्कर्ष 

  • मध्य एशिया भारत के लिए केवल ऊर्जा और खनिज संसाधनों का क्षेत्र नहीं, बल्कि सुरक्षा, कनेक्टिविटी, व्यापार और भू-राजनीतिक प्रभाव का महत्त्वपूर्ण केंद्र है। चीन का बढ़ता प्रभाव, अफगानिस्तान की अस्थिरता और रूस-यूक्रेन संघर्ष ने इस क्षेत्र के सामरिक महत्त्व को और बढ़ा दिया है। 
  • भारत की चुनौती यह है कि भौगोलिक दूरी और पाकिस्तान द्वारा उत्पन्न संपर्क बाधाओं के बावजूद वह इस क्षेत्र में अपनी आर्थिक एवं रणनीतिक उपस्थिति को प्रभावी बनाए। चाबहार, INSTC, SCO, ऊर्जा सहयोग तथा ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संबंध भारत को इसके लिए महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं। अतः मध्य एशिया में भारत की सक्रियता को केवल चीन के प्रभाव की प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि भारत की विस्तारित पड़ोस नीति, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की व्यापक रणनीति के रूप में देखा जाना चाहिए। 
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