चर्चा में क्यों ?
हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ को 50% से घटाकर 18% करने की घोषणा की।

प्रमुख बिन्दु:
- इसके साथ ही उन्होंने यह दावा किया कि भारत रूसी कच्चे तेल की खरीद बंद करने और इसके स्थान पर अमेरिका व वेनेजुएला से तेल आयात बढ़ाने पर सहमत हो गया है।
- हालाँकि भारत ने इस व्यापार समझौते का स्वागत किया है, लेकिन रूस से तेल आयात रोकने को लेकर कोई आधिकारिक प्रतिबद्धता नहीं जताई है।
- इससे भारत की ऊर्जा नीति, रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक दबावों पर एक नई बहस छिड़ गई है।
भारत का आधिकारिक रुख: ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि
- भारत सरकार ने ट्रम्प के दावे की सार्वजनिक रूप से पुष्टि नहीं की है।
- विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि 1.4 अरब लोगों के लिए ऊर्जा सुरक्षा भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता है।
- सरकार के अनुसार, भारत की ऊर्जा रणनीति निम्नलिखित आधारों पर टिकी है:
- ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण
- बाजार की स्थितियाँ और मूल्य प्रतिस्पर्धा
- विकसित होती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ
- आपूर्ति की निरंतरता और विश्वसनीयता
- महत्वपूर्ण बात यह है कि अब तक भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल आयात रोकने का कोई औपचारिक निर्देश नहीं दिया गया है।
रूसी तेल आयात पूरी तरह रुकने की संभावना क्यों कम है ?
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में रूस से तेल आयात को अचानक समाप्त करना व्यावहारिक नहीं है। इसके पीछे कई कारण हैं:
- तकनीकी चुनौतियाँ
- कच्चे तेल के ग्रेड को तुरंत बदलना आसान नहीं
- भारतीय रिफाइनरियाँ विशेष रूप से मध्यम खट्टे (Medium Sour) ग्रेड के लिए अनुकूलित हैं
- व्यावसायिक बाधाएँ
- दीर्घकालिक अनुबंध
- मूल्य निर्धारण और अग्रिम बुकिंग
- पहले से तय आपूर्ति श्रृंखला
- रसद और आपूर्ति सीमाएँ
- अमेरिका और वेनेजुएला से तेल लाने में
- अधिक समय
- अधिक परिवहन लागत
- रणनीतिक स्वायत्तता
- ऊर्जा व्यापार में बाहरी दबाव स्वीकार करना
- भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता को कमजोर कर सकता है
- विशेषज्ञों के अनुसार, वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं से आयात बढ़ाना “कहने में आसान, करने में कठिन” है और यह प्रक्रिया धीरे-धीरे ही संभव है।
आर्थिक तर्क: रूसी तेल क्यों अब भी आकर्षक है ?
- रूसी कच्चे तेल की आर्थिक उपयोगिता अभी भी भारत के लिए महत्वपूर्ण बनी हुई है:
- अगले 8-10 हफ्तों के लिए ऑर्डर पहले ही दिए जा चुके हैं।
- यूराल्स क्रूड को ICE ब्रेंट की तुलना में भारी छूट मिलती है।
- भारत की जटिल शोधन प्रणाली रूसी ग्रेड के लिए अनुकूल है।
- नायरा एनर्जी का मामला
- प्रतिदिन लगभग 4 लाख बैरल तेल का शोधन होता है।
- लगभग पूरी तरह रूसी तेल पर निर्भर है।
- रोसनेफ्ट (रूस) प्रमुख शेयरधारक है।
- EU और US प्रतिबंधों के कारण वैकल्पिक स्रोत सीमित हुए।
- इन कारणों से अचानक पूर्ण प्रतिबंध अव्यावहारिक हो जाता है।
संभावित कटौती: क्रमिक, शून्य नहीं
- ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार:
- भारत रूस से तेल आयात को शून्य तक नहीं लाएगा
- आयात
- 2025 में औसतन 1.6 मिलियन बैरल/दिन
- मध्यम अवधि में घटकर लगभग 5 लाख बैरल/दिन
- फिर भी यह भारत के कुल आयात का लगभग 10% रहेगा।
हाल के रुझान: गिरावट पहले से जारी
- अमेरिका द्वारा रोसनेफ्ट और लुकोइल पर प्रतिबंधों के बाद-
- जून 2025: 2.09 मिलियन बैरल/दिन (पीक)
- जनवरी 2026: 1.16 मिलियन बैरल/दिन
- हालाँकि गिरावट आई है, फिर भी जनवरी 2026 में रूस की हिस्सेदारी 22% रही है।
- पहले के 35-40% से कम, लेकिन अब भी महत्वपूर्ण है।
क्या अमेरिकी और वेनेजुएला तेल विकल्प बन सकते हैं ?
- अमेरिकी तेल: सीमाएँ
- परिवहन लागत पश्चिम एशिया की तुलना में दोगुनी से अधिक हुई है।
- अमेरिकी तेल हल्का और मीठा, भारतीय रिफाइनरियों के लिए कम अनुकूल है।
- वेनेजुएला तेल: सीमित क्षमता
- कुल उत्पादन लगभग 10 लाख बैरल/दिन है।
- इसकी अमेरिका में भी उच्च मांग है।
- इसका उत्पादन बढ़ाने में वर्षों और भारी निवेश की जरूरत है।
रणनीतिक और व्यापारिक स्वायत्तता का सवाल
- भारत ने लगातार यह दिखाया है कि वह ऊर्जा नीति में निर्देशित संरेखण नहीं चाहता है।
- वह रूस जैसे पुराने रणनीतिक साझेदार से संबंधों में संतुलन बनाए रखना चाहता है।
- महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हालिया कटौती अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण हुई न कि द्विपक्षीय राजनीतिक दबाव के कारण।
- विदेश मंत्रालय के हालिया संकेत बताते हैं कि भारत अपनी व्यापारिक और रणनीतिक स्वायत्तता से पीछे हटने वाला नहीं है।
निष्कर्ष:
भारत का रूसी कच्चे तेल आयात पूरी तरह समाप्त होने की संभावना नहीं रखता, भले ही आने वाले समय में इसकी मात्रा में क्रमिक कमी देखने को मिले। मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, लागत प्रतिस्पर्धा और आपूर्ति की निरंतरता सर्वोपरि बनी हुई है। रूसी तेल की उपलब्धता, उस पर मिलने वाली छूट, भारतीय रिफाइनरियों की तकनीकी अनुकूलता और पहले से किए गए दीर्घकालिक अनुबंध-ये सभी कारक भारत को अचानक किसी एक स्रोत से दूरी बनाने से रोकते हैं। साथ ही, अमेरिका या वेनेजुएला जैसे वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता पूरी तरह और तुरंत रूसी आपूर्ति का स्थान नहीं ले सकते।
भारत की ऊर्जा नीति का मूल आधार रणनीतिक स्वायत्तता और विविधीकरण है, न कि किसी एक देश या दबाव समूह के अनुरूप कठोर संरेखण। ऐसे में भारत का रुख स्पष्ट है-रूस से तेल आयात में संतुलित और व्यावहारिक कटौती हो सकती है, लेकिन ऊर्जा हितों से समझौता करते हुए इसे शून्य तक ले जाना न तो यथार्थवादी है और न ही राष्ट्रीय हित में।