New
Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 8th June 2026, 6:30 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 1st June 2026, 5:30 PM English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 7th June 2026, 8:00 AM Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 8th June 2026, 6:30 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 1st June 2026, 5:30 PM English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 7th June 2026, 8:00 AM

भारत का जल-ऊर्जा-खाद्य गठजोड़

चर्चा में क्यों ?

  • हाल ही में विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की रिपोर्टों ने यह चेतावनी दी है कि जल, ऊर्जा और खाद्य प्रणालियों के बीच असंतुलन एक बड़ा संकट बनता जा रहा है।
  • भारत जैसे देश के लिए, जहां बड़ी आबादी और तेज आर्थिक विकास का दबाव है, यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है।

क्या है मूल समस्या

  • समस्या संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि कुप्रबंधन (mismanagement) है।
  • भारत में कई बार कम पानी वाले क्षेत्रों में भी अधिक पानी वाली फसलें (जैसे चावल, गन्ना) उगाई जाती हैं, जिससे पानी की बर्बादी होती है।
  • इससे “आभासी जल (Virtual Water)” का निर्यात होता है, यानी हम खाद्य पदार्थों के साथ अपना पानी भी बाहर भेजते हैं।
  • इसके अलावा, पंजाब-हरियाणा मॉडल में मुफ्त या सस्ती बिजली के कारण किसान ज्यादा पानी निकालते हैं, जिससे भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है।
  • यहाँ एक बड़ी समस्या यह है कि ऊर्जा नीति (मुफ्त बिजली) + कृषि नीति (MSP) मिलकर पानी के अत्यधिक उपयोग को बढ़ावा देती हैं।

ऊर्जा-जल-खाद्य अंतर्संबंधों का बिगड़ता स्वरूप

ऊर्जा संकट और कृषि

  • खाद्य सुरक्षा काफी हद तक ऊर्जा की उपलब्धता और स्थिरता पर निर्भर करती है।
  • भारत अपने कच्चे तेल का लगभग 85–90% आयात करता है, इसलिए ऊर्जा झटकों के प्रति संवेदनशील है।
  • तेल महंगा होने पर :
    • डीजल की कीमत बढ़ती है। 
    • सिंचाई की लागत बढ़ती है। 
    • परिवहन महंगा होता है। 
  • बिजली की कमी से कृषि कार्य प्रभावित होते हैं।
  • मांग-पक्षीय उपाय (जैसे रिमोट वर्क, कम परिवहन) ऊर्जा दबाव कम कर सकते हैं, जिससे खाद्य महंगाई भी नियंत्रित होती है।

राजकोषीय और नीतिगत विकृतियाँ

  • भारत हर साल लगभग ₹1.5 लाख करोड़ बिजली सब्सिडी पर खर्च करता है।
  • यह सब्सिडी अक्सर अक्षमता (inefficiency) को बढ़ावा देती है, जैसे पानी और ऊर्जा का अत्यधिक उपयोग।
  • वैश्विक स्तर पर कृषि पर भारी खर्च के बावजूद सिंचाई अवसंरचना पर बहुत कम निवेश होता है।
  • तेल की कीमत बढ़ने से :
    • आयात बिल बढ़ता है
    • राजकोषीय घाटा बढ़ता है
    • मुद्रास्फीति बढ़ती है। 

परस्पर प्रभाव  

  • पानी का अक्षम उपयोग ऊर्जा की मांग बढ़ाता है। 
  • ऊर्जा संकट कृषि लागत बढ़ाता है। 
  • दोनों मिलकर खाद्य असुरक्षा को बढ़ाते हैं। 

जलवायु परिवर्तन  

  • अनियमित मानसून, सूखा और बाढ़ से कृषि चक्र बाधित होता है।
  • तेल संकट के साथ मिलकर यह स्थिति और गंभीर हो जाती है।
  • परिणाम: मौजूदा कमजोरियाँ और अधिक बढ़ जाती हैं।

प्रमुख चुनौतियाँ:

  • संरचनात्मक : जल, ऊर्जा और कृषि अलग-अलग विभागों में होने से तालमेल की कमी रहती है, और मुफ्त बिजली जैसी नीतियों से संसाधनों का गलत उपयोग बढ़ता है।
  • आर्थिक कारक : अधिक सब्सिडी के कारण सरकार पर वित्तीय बोझ बढ़ता है, तेल महंगा होने से आयात बिल और महंगाई बढ़ती है।
  • पर्यावरण संबंधी : भूजल का स्तर लगातार घट रहा है और कई जगह खेती के तरीके टिकाऊ नहीं हैं।
  • तकनीकी और संस्थागत : पानी के उपयोग का सही रिकॉर्ड (डेटा) नहीं है, और नवीकरणीय ऊर्जा का ठीक से प्रबंधन व समन्वय नहीं हो पा रहा है।

आगे का रास्ता

  • फसल विविधता : पानी की ज्यादा जरूरत वाली फसलों की जगह कम पानी वाली फसलें अपनानी चाहिए, ताकि पानी और ऊर्जा दोनों की बचत हो और लागत झटकों से बचाव हो सके।
  • ऊर्जा-जल मूल्य निर्धारण सुधार : मुफ्त बिजली की जगह लक्षित DBT और स्मार्ट मीटरिंग लागू करनी चाहिए, जिससे संसाधनों का सही उपयोग हो और छोटे किसानों को भी सुरक्षा मिल सके।
  • सटीक सिंचाई और सौर प्रणाली : ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा देना चाहिए और पीएम-कुसुम जैसी योजनाओं का विस्तार करना चाहिए, ताकि पानी और ऊर्जा का कुशल उपयोग हो सके।
  • शहरी ऊर्जा मांग प्रबंधन : पब्लिक ट्रांसपोर्ट, रिमोट वर्क और बेहतर लॉजिस्टिक्स को बढ़ावा देना चाहिए, जिससे तेल की खपत कम हो और खाद्य महंगाई पर दबाव घटे।
  • संस्थागत समन्वय : जल, ऊर्जा और कृषि से जुड़े विभागों को एक साथ जोड़कर एकीकृत नीति और डेटा सिस्टम विकसित करना चाहिए, ताकि बेहतर योजना और प्रबंधन हो सके।

निष्कर्ष

भारत की असली चुनौती केवल जल की कमी या ऊर्जा पर निर्भरता नहीं है, बल्कि इन दोनों और खाद्य प्रणाली के बीच गहरे संबंध को सही तरीके से प्रबंधित करना है। इसलिए, सतत कृषि, ऊर्जा सुरक्षा और मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए एक एकीकृत (nexus-based) दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। जब तक नीतियों में समन्वय नहीं होगा—जैसे सब्सिडी सुधार, सही प्रोत्साहन और तकनीक का उपयोग—तब तक समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR