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रुपए का अवमूल्यन और भारत पर बढ़ता दबाव

संदर्भ 

  • हाल के दिनों में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक गिरावट दर्ज करते हुए लगभग 97 रुपये के स्तर पर बंद हुआ है। लगातार हो रही इस गिरावट के थमने के आसार फिलहाल नजर नहीं आ रहे हैं। कच्चे तेल की बढ़ती वैश्विक कीमतें और बाहरी मुद्रास्फीति (इंपोर्टेड इन्फ्लेशन) का खतरा आने वाले समय में रुपये पर दबाव को और बढ़ा सकता है। ऐसे संकट के समय में यह बहस तेज हो गई है कि क्या भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को बाजार में हस्तक्षेप कर रुपये को संभालना चाहिए, या इसे अपने हाल पर छोड़ देना चाहिए? 

हस्तक्षेप बनाम मुक्त बाजार: गोपीनाथ दृष्टिकोण और उसका तर्क 

  • इस संकट के बीच, हार्वर्ड की प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रोफेसर गीता गोपीनाथ जैसी विचारकों का मानना है कि केंद्रीय बैंक को मुद्रा बाजार में दखल नहीं देना चाहिए। उनके अनुसार, रुपये को अपने वास्तविक स्तर पर आने देना ही दीर्घकालिक समाधान है। इस विचारधारा के पीछे दो मुख्य तर्क हैं: 
  • स्वतः समायोजन (Self-Correction) : जब रुपया कमजोर होता है, तो विदेशों के लिए भारतीय सामान सस्ता हो जाता है, जिससे निर्यात को बढ़ावा मिलता है। इसके विपरीत, आयात महंगा होने के कारण देश में विदेशी सामानों की मांग स्वतः कम हो जाती है। 
  • मुक्त बाजार का प्रवाह : कृत्रिम रूप से रुपये को सहारा देना केवल अपरिहार्य (जो होना तय है) को कुछ समय के लिए टालने जैसा है। हस्तक्षेप करने से बाजार की वे स्वाभाविक शक्तियां रुक जाती हैं जो चालू खाता घाटे (CAD) को संतुलित करने का काम करती हैं। 

अवमूल्यन का अर्थ  

  • अवमूल्यन का अर्थ है वस्तुओं, सेवाओं या अन्य मौद्रिक इकाइयों के सापेक्ष मुद्रा के मूल्य में कमी आना, जिनके साथ उस मुद्रा का विनिमय किया जा सकता है। 
  • उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि रुपये और डॉलर की विनिमय दर 50 रुपये = 1 डॉलर है। यदि यह विनिमय दर स्थिर होकर 55 रुपये = 1 डॉलर हो जाती है, तो इसे रुपये का अवमूल्यन कहा जाता है। 
  • यह एक मौद्रिक नीति उपकरण है जिसका उपयोग स्थिर या अर्ध-स्थिर विनिमय दर वाले देश करते हैं। कोई देश व्यापार संतुलन को बेहतर बनाने के लिए अपनी मुद्रा का अवमूल्यन कर सकता है। 
  • इसका अर्थ है कि निर्यात कम महंगा और वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाता है, जबकि आयात अधिक महंगा हो जाता है, ताकि लोग घरेलू उत्पादों का उपयोग करें।
  • अवमूल्यन, मूल्यह्रास से भिन्न है क्योंकि रुपये का मूल्य मुद्रा की मांग और आपूर्ति में परिवर्तन के कारण घटता है। लेकिन अवमूल्यन सरकार द्वारा भुगतान संतुलन को सुधारने के लिए किया जाता है।
  • भारतीय मुद्रा के अवमूल्यन का भारतीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव पड़ता है। मुद्रा का अवमूल्यन सरकार द्वारा किया जाता है। 
  • रुपये का अवमूल्यन 1966 में हुआ, जब इसका मूल्य 4.76 रुपये से घटकर 7.50 रुपये प्रति अमेरिकी डॉलर हो गया। 1991 में रुपये का एक बार फिर अवमूल्यन हुआ, जब इसका मूल्य 20.5 रुपये से घटकर 24.5 रुपये प्रति अमेरिकी डॉलर हो गया।  

कमजोर और गिरते रुपये का बारीक अंतर  

  • मुक्त बाजार का यह मॉडल सैद्धांतिक रूप से सही लग सकता है, लेकिन यह व्यावहारिक धरातल पर तब विफल हो जाता है जब रुपया स्थिर होने के बजाय लगातार गिर रहा हो। इन दोनों स्थितियों में एक बड़ा मनोवैज्ञानिक और आर्थिक अंतर है: 
  • निर्यात पर प्रभाव : यदि रुपया केवल कमजोर है, तो निर्यात बढ़ता है। लेकिन यदि रुपया लगातार गिर रहा है, तो विदेशी खरीदार अपने ऑर्डर रोक देते हैं। उन्हें उम्मीद होती है कि आने वाले दिनों में रुपया और टूटेगा, जिससे उन्हें सामान और भी सस्ते दामों पर मिल सकेगा। 
  • आयात पर प्रभाव : भारत तेल जैसी अनिवार्य वस्तुओं का बड़े पैमाने पर आयात करता है। यदि उपभोक्ताओं और व्यापारियों को यह अंदेशा हो कि कल रुपया और गिरेगा (जिससे कीमतें बढ़ेंगी), तो वे भविष्य की महंगाई से बचने के लिए आज ही भारी मात्रा में आयात और खरीदारी शुरू कर देते हैं। इसे हम पेट्रोल की कीमतें बढ़ने की आशंका के दौरान पेट्रोल पंपों पर लगने वाली उपभोक्ताओं की भीड़ के रूप में समझ सकते हैं। 
  • परिणाम : इस अनिश्चितता के कारण आयात का बिल तो बढ़ जाता है, लेकिन निर्यात में अपेक्षित वृद्धि नहीं होती। नतीजतन, चालू खाता घाटा कम होने के बजाय और अधिक गहरा जाता है।  

सट्टेबाजी और पूँजी प्रवाह (Capital Outflow) की भूमिका 

  • बाजार के पारंपरिक मॉडल यह मानकर चलते हैं कि मुद्रा का मूल्य केवल आयात-निर्यात (वास्तविक उपभोग मांग) से तय होता है। लेकिन यह दृष्टिकोण विदेशी सट्टेबाजी पूँजी (Speculative Capital) के प्रभाव को नजरअंदाज करता है। 
  • वर्तमान में रुपये की गिरावट का एक बड़ा कारण विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) द्वारा भारतीय संपत्तियों को बेचकर पैसा बाहर निकालना है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं:
    • विकसित देशों (जैसे अमेरिका) के केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी के संकेत।
    • भारतीय शेयर बाजार में टिकाऊ विकास या उच्च रिटर्न को लेकर वैश्विक निवेशकों का बदलता नजरिया। 
    • जब बड़े पैमाने पर सट्टा आधारित पूँजी देश से बाहर निकलती है, तो रुपये का मूल्य उसकी वास्तविक आर्थिक मजबूती से नहीं, बल्कि वित्तीय बाजारों की सट्टेबाजी और निवेशकों के सेंटिमेंट्स (भावनाओं) से तय होने लगता है। 

वैश्विक अनुभव: जापान का उदाहरण  

  • मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करने की नीति कोई नई नहीं है; विकसित देश भी इसका सहारा लेते रहे हैं।
  • इस वर्ष अप्रैल में जब येन - डॉलर के मुकाबले अत्यधिक कमजोर हुआ, तो जापान की वित्त मंत्री सात्सुकी कातायामा ने वित्तीय बाजारों में निर्णायक कार्रवाई (Decisive Action) करने के संकेत दिए थे। 
  • इस घोषणा के तुरंत बाद येन ने शुरुआती तौर पर अपनी गिरावट को कुछ हद तक संभाला। हालांकि, बाद में वास्तविक स्तर पर सीमित हस्तक्षेप के कारण येन में कमजोरी का सिलसिला जारी रहा। यह दर्शाता है कि सिर्फ बयानों से सट्टेबाजी को रोकना नामुमकिन है; इसके लिए ठोस आर्थिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है। 

निष्कर्ष: क्या हस्तक्षेप ही एकमात्र रास्ता है ? 

  • निश्चित रूप से, सट्टेबाजी से संचालित पूँजी के भारी प्रवाह को रोकना बेहद जटिल कार्य है। यदि सरकारें पूरी प्रतिबद्धता और पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार के साथ बाजार में नहीं उतरती हैं, तो इसके विपरीत परिणाम भी हो सकते हैं। 
  • लेकिन रुपये को पूरी तरह बाजार के भरोसे छोड़ देना भी एक आत्मघाती कदम साबित हो सकता है। आवश्यक वस्तुओं के महंगे होने से घरेलू अर्थव्यवस्था में जो मुद्रास्फीति (महंगाई) आएगी, वह आम नागरिकों के वास्तविक वेतन और क्रय शक्ति (Purchasing Power) को सीधे तौर पर प्रभावित करेगी। 
  • चूंकि रुपये की यह गिरावट किसी बुनियादी आर्थिक कमजोरी के बजाय सट्टेबाजी और वैश्विक अनिश्चितता के कारण है, इसलिए आरबीआई का रणनीतिक हस्तक्षेप बेहद जरूरी हो जाता है। इसके साथ ही, अब वह समय आ गया है जब भारत को अपने आर्थिक विकास में विदेशी सट्टा पूँजी की वास्तविक भूमिका और इसकी सीमाओं पर नए सिरे से गंभीरता से विचार करना चाहिए।
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