संदर्भ
हाल ही में फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य के निकटवर्ती क्षेत्रों में वाणिज्यिक जहाजों पर हुए अमेरिकी मिसाइल हमलों ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक नया संकट पैदा कर दिया है। 8 से 11 जून के बीच अमेरिकी नौसेना द्वारा हेलफायर मिसाइलों से किए गए इन सटीक हमलों में तीन वाणिज्यिक टैंकरों को निशाना बनाया गया, जिन पर भारतीय चालक दल तैनात था। इस घटनाक्रम ने न केवल भारत और अमेरिका के राजनयिक संबंधों में तनाव बढ़ा दिया है, बल्कि वैश्विक मर्चेंट नेवी में कार्यरत लाखों भारतीय नाविकों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
राजनयिक गतिरोध और अमेरिकी नाकेबंदी की पृष्ठभूमि
- इस संकट की शुरुआत तब खुलकर सामने आई जब भारत ने नई दिल्ली में अमेरिकी दूतावास के प्रतिनिधि जेसन मीक्स (Jason Meeks) को तलब कर वाणिज्यिक जहाजों पर हुए हमलों के खिलाफ अपना अत्यंत कड़ा विरोध दर्ज कराया। इसके प्रतिउत्तर में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बीच हुई वार्ता ने इस विवाद के भू-राजनीतिक आयाम को स्पष्ट कर दिया।
- अमेरिका का पक्ष: अमेरिका का तर्क है कि प्रभावित जहाजों ने उसकी नौसैनिक नाकेबंदी का उल्लंघन किया और ईरानी तेल का अवैध परिवहन कर रहे थे। अमेरिकी केंद्रीय कमान (Centcom) के अनुसार, जहाजों के चालक दल ने उनके निर्देशों की अनदेखी की थी।
- भारत का रुख: विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया कि वाणिज्यिक जहाजरानी (Commercial Shipping) के विरुद्ध इस प्रकार की घातक और हिंसक सैन्य कार्रवाई को किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। इन हमलों में तीन भारतीय नाविकों (एक मुख्य अभियंता, एक इंजन फिटर और एक डेक कैडेट) की असामयिक मृत्यु ने भारत की चिंताओं को और गहरा कर दिया है।
वैश्विक जहाजरानी में भारतीय नाविकों का योगदान और संकट का पैमाना
वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा माने जाने वाले समुद्री परिवहन में भारतीय जनशक्ति का योगदान अतुलनीय है।
- आंकड़े: दुनिया भर में लगभग 3.5 लाख भारतीय नाविक विभिन्न अंतरराष्ट्रीय जहाजों पर कार्यरत हैं, जिनमें से आधे से अधिक सक्रिय सेवा में हैं। वैश्विक वाणिज्यिक जहाजों पर तैनात प्रत्येक छह नाविकों में से एक भारतीय है।
- क्षेत्रीय संकट: इंटरनेशनल मरीन ऑर्गेनाइजेशन (IMO) के अनुसार, वर्तमान में फारस की खाड़ी क्षेत्र में विभिन्न देशों के लगभग 20,000 नाविक फंसे हुए हैं। भारत के जहाजरानी महानिदेशालय (DG Shipping) के अनुसार, इस संकट के प्रारंभ में लगभग 23,000 भारतीय नाविक इस व्यापक क्षेत्र में तैनात थे, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में कार्यरत था।
हमलों की प्रकृति और जहाजों की स्थिति
अमेरिकी नौसेना द्वारा मारिवेक्स, सेटेबेलो, और जलवीर नामक तीन जहाजों को निशाना बनाया गया। इन हमलों की प्रकृति रणनीतिक थी:
- लक्षित प्रहार: सेंटकॉम द्वारा जारी वीडियो के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि मिसाइलों ने जहाजों के इंजन कक्ष (Engine Room) और स्टीयरिंग कंपार्टमेंट को जलरेखा के ऊपर (Above the Waterline) निशाना बनाया। इसका उद्देश्य जहाजों को डुबाना नहीं, बल्कि उनकी स्वयं चलने और दिशा नियंत्रित करने की क्षमता को पंगु बनाना था।
- विरोधाभासी दावे: जहाँ अमेरिका ने दावा किया कि मारिवेक्स ईरानी बंदरगाह की ओर बढ़ रहा था, वहीं जहाजों के प्रबंधन (जैसे IOS Marine FZE) और चालक दल ने इन दावों का खंडन किया है। उनके अनुसार, जहाज कई दिनों से स्थिर (लंगर डाले) थे, उन्हें कोई अमेरिकी संदेश प्राप्त नहीं हुआ था, और उनका ईरानी तेल से कोई संबंध नहीं था।
प्रतिबंधों का अर्थशास्त्र और फ्लैग ऑफ कन्वीनियंस (FOC) की चुनौती
इस पूरे विवाद के केंद्र में अमेरिकी प्रतिबंध और जहाजों के पंजीकरण की प्रणाली है।
- प्रतिबंधों का प्रभाव: मारिवेक्स पर दिसंबर 2025 में अमेरिका द्वारा प्रतिबंध लगाए गए थे, जबकि सेटेबेलो (Settebello) को एक अमेरिकी गैर-लाभकारी संगठन की रिपोर्ट के आधार पर चिन्हित किया गया था। यद्यपि अमेरिकी प्रतिबंध कानूनी रूप से केवल उसके अपने अधिकार क्षेत्र में बाध्यकारी होते हैं, परंतु वैश्विक वित्तीय प्रणाली पर अमेरिकी नियंत्रण के कारण ऐसे जहाजों का बीमा कवरेज समाप्त हो जाता है, जिससे उन्हें किसी भी अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह में प्रवेश मिलना असंभव हो जाता है।
- फ्लैग ऑफ कन्वीनियंस का रणनीतिक उपयोग: ये तीनों जहाज पानामा, मार्शल आइलैंड्स या लाइबेरिया जैसे फ्लैग ऑफ कन्वीनियंस (FOC) के तहत पंजीकृत थे। वाणिज्यिक जहाजरानी में कंपनियां कर छूट और शिथिल नियमों के लिए इन देशों के ध्वज का उपयोग करती हैं। तकनीकी रूप से, विदेशी ध्वज होने के कारण भारत के लिए सीधे कानूनी हस्तक्षेप के विकल्प सीमित हो जाते हैं, हालांकि स्वामित्व और चालक दल के स्तर पर इन जहाजों के संबंध भारत से बेहद गहरे थे।
सैन्य बल बनाम कानून प्रवर्तन के अन्य विकल्प
इस घटनाक्रम ने यह यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या अमेरिका के पास मिसाइल हमलों के अतिरिक्त अन्य विकल्प उपलब्ध थे?
- असैन्य विकल्प बनाम घातक बल: वाणिज्यिक जहाज पूर्णतः निहत्थे होते हैं और स्थापित समुद्री नियमों के तहत किसी भी संप्रभु राष्ट्र की नौसेना या तटरक्षक बल के निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य होते हैं। इतिहास गवाह है कि छोटे हथियारों से लैस सोमाली समुद्री डाकू भी पानी की बौछारों (Water Jets) के अलावा किसी रक्षा प्रणाली से विहीन इन विशाल टैंकरों पर आसानी से नियंत्रण स्थापित कर लेते हैं।
- इससे पूर्व, अप्रैल के अंतिम सप्ताह में अमेरिकी नौसेना ने हिंद महासागर में प्रतिबंधित तेल टैंकर Tifani पर और ब्रिटिश बलों ने इंग्लिश चैनल में Smyrtos जहाज पर सफलतापूर्वक बोर्डिंग (जहाज पर चढ़कर नियंत्रण स्थापित करना) की थी। अतः, निहत्थे नाविकों पर सीधे मिसाइल दागने के स्थान पर असैन्य और सुरक्षित बल प्रयोग के विकल्प उपलब्ध थे।
अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून की सीमाएं और भारत के समक्ष चुनौतियां
यह संकट अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के क्रियान्वयन में मौजूद एक बड़े शून्य को प्रदर्शित करता है:
- इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन की लाचारी: संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी होने के बावजूद, इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन (IMO) के पास सदस्य देशों द्वारा एकतरफा की जाने वाली सैन्य कार्रवाइयों को रोकने या उन पर दंडात्मक कार्रवाई करने की कोई संप्रभु शक्ति नहीं है।
- यूएनसीएलओएस की विफलता: समुद्रों को नियंत्रित करने वाला सबसे विस्तृत ढांचा यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द सी (UNCLOS) है। विडंबना यह है कि इस संकट के दोनों मुख्य विरोधी पक्षों में से अमेरिका ने इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं (क्योंकि वह गहरे समुद्री तल को वैश्विक साझा संपत्ति मानने का विरोधी है), और ईरान ने हस्ताक्षर करने के बावजूद अब तक इसका अनुसमर्थन (Ratification) नहीं किया है।
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संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून अभिसमय (United Nations Convention on the Law of the Sea - UNCLOS) के बारे में
- संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून अभिसमय (United Nations Convention on the Law of the Sea - UNCLOS) को 1982 में अपनाया गया था और यह 1994 में प्रभाव में आया।
- यह विश्व के महासागरों के लिए कानून और व्यवस्था का एक व्यापक ढाँचा स्थापित करता है, जिसके तहत समुद्री क्षेत्रों में राज्यों के अधिकारों और अधिकार-क्षेत्र के आवंटन, महासागरों के शांतिपूर्ण उपयोग तथा उनके संसाधनों के प्रबंधन से संबंधित नियम निर्धारित किए गए हैं।
- यह अभिसमय समुद्री कानून के विभिन्न विशिष्ट क्षेत्रों के आगे विकास के लिए भी एक रूपरेखा प्रदान करता है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) जैसे सक्षम अंतरराष्ट्रीय संगठनों का कार्य भी शामिल है।
- अभिसमय में मूल रूप से निर्धारित व्यवस्था को बाद में निम्नलिखित समझौतों के माध्यम से और विस्तारित किया गया है, ताकि राज्यों की प्राथमिकताओं को शामिल किया जा सके और नियामक ढांचे में मौजूद कमियों को पूरा किया जा सके:
- संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून अभिसमय के भाग XI के कार्यान्वयन से संबंधित समझौता
- संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून अभिसमय के प्रावधानों के कार्यान्वयन हेतु समझौता, जो सीमांत (straddling) मत्स्य भंडार और अत्यधिक प्रवासी मत्स्य प्रजातियों के संरक्षण और प्रबंधन से संबंधित है (UN Fish Stocks Agreement)
- संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून अभिसमय के अंतर्गत राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से परे क्षेत्रों में समुद्री जैव विविधता के संरक्षण और सतत उपयोग से संबंधित समझौता (BBNJ Agreement)
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भारत के लिए नीतिगत राह:
भारत ने अतीत में हूती विद्रोहियों और सोमाली समुद्री डाकुओं से अपने नाकेबंदी क्षेत्र और नाविकों की रक्षा के लिए ऑपरेशन संकल्प जैसी प्रभावी सैन्य कार्रवाइयां की हैं। परंतु, फारस की खाड़ी का वर्तमान संकट दो बड़े देशों- अमेरिका और ईरान के बीच का सीधा भू-राजनीतिक संघर्ष है। ऐसी स्थिति में भारत के लिए प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप की राह अत्यंत जटिल है।
निष्कर्ष
- फारस की खाड़ी की यह घटना यह दर्शाती है कि जब महाशक्तियां भू-राजनीतिक हितों के लिए अंतरराष्ट्रीय नियमों की अनदेखी करती हैं, तो वैश्विक नागरिक (जैसे भारतीय नाविक) उसका शिकार बनते हैं।
- समुद्री कानूनों के प्रवर्तन के लिए किसी वैश्विक संस्था के अभाव में, अब भारत को अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बहुपक्षीय कूटनीति, द्विपक्षीय सुरक्षा समझौतों और फ्लैग ऑफ कन्वीनियंस व्यवस्था के अंतर्गत भारतीय नाविकों के लिए नए कानूनी सुरक्षा उपाय तलाशने होंगे।