संदर्भ
- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया चीन यात्रा के कुछ ही समय बाद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का बीजिंग पहुँचाना इस बात का संकेत है कि चीन वैश्विक कूटनीति का एक प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है। एक ओर अमेरिका चीन के साथ अपने तनावपूर्ण संबंधों को नियंत्रित और स्थिर करने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर रूस बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बीच चीन से आर्थिक सहयोग बनाए रखने और अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने का प्रयास कर रहा है।
- चूँकि अमेरिका, चीन और रूस विश्व राजनीति की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में शामिल हैं, इसलिए इनके बीच बनने वाले समीकरण भविष्य की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को गहराई से प्रभावित करेंगे। ऐसे में पुतिन की बीजिंग यात्रा केवल रूस-चीन संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक और क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन पर भी पड़ सकता है।
रूस और चीन के संबंधों का ऐतिहासिक विकास
- रूस और चीन के रिश्तों ने अलग-अलग ऐतिहासिक चरणों से गुजरते हुए वर्तमान स्वरूप हासिल किया है। इन संबंधों को मुख्य रूप से साम्राज्यवादी दौर, सोवियत काल और सोवियत संघ के विघटन के बाद के समय में बाँटा जा सकता है।
- करीब 4,300 किलोमीटर लंबी साझा सीमा होने के बावजूद दोनों देशों के संबंध लंबे समय तक अपेक्षाकृत स्थिर रहे। हालांकि चीन आज भी 19वीं शताब्दी में रूस को खोए गए क्षेत्रों को अपने अपमान के युग का हिस्सा मानता है।
- चीन में कम्युनिस्ट शासन स्थापित होने के बाद दोनों देशों के बीच निकटता बढ़ी और 1950 में मैत्री संधि पर हस्ताक्षर हुए। लेकिन बाद में वैचारिक मतभेद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगी, जिसके परिणामस्वरूप चीन-सोवियत विभाजन हुआ और 1969 में सीमा पर सैन्य संघर्ष भी देखने को मिला।
- इसी पृष्ठभूमि ने 1970 के दशक में अमेरिका और चीन के बीच संबंध सुधारने का रास्ता खोला, जिसका प्रभाव भारत की सुरक्षा रणनीति पर भी पड़ा।
- सोवियत संघ के टूटने के बाद रूस और चीन के रिश्तों में फिर सुधार शुरू हुआ। 1992 की रणनीतिक साझेदारी संधि के बाद यह संबंध लगातार मजबूत होते गए और शी जिनपिंग तथा पुतिन के नेतृत्व में 2022 में दोनों देशों ने नो-लिमिट्स पार्टनरशिप की घोषणा की।
क्यों मजबूत हो रही है रूस-चीन साझेदारी ?
- रूस और चीन की साझेदारी का आधार उनकी पूरक आर्थिक और रणनीतिक जरूरतें हैं।
- चीन रूस को बाजार, पूँजी और आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराता है।
- रूस चीन को ऊर्जा संसाधन और रक्षा उपकरण प्रदान करता है।
- यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने रूस को चीन के और करीब ला दिया है। अब चीन रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन चुका है और दोनों देशों के बीच व्यापार तेजी से बढ़ा है।
- पश्चिमी कंपनियों के रूस से बाहर निकलने के बाद चीनी कंपनियों ने ऑटोमोबाइल, दूरसंचार और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में अपनी जगह मजबूत की है। वहीं रूस अब चीनी तकनीक और सेमीकंडक्टर पर अधिक निर्भर होता जा रहा है।
- ऊर्जा क्षेत्र में भी दोनों देशों का सहयोग बढ़ा है। पावर ऑफ साइबेरिया गैस पाइपलाइन परियोजना इस साझेदारी का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
- राजनीतिक स्तर पर भी दोनों देशों के नेताओं के बीच लगातार संपर्क उनकी रणनीतिक निकटता को दर्शाता है। साथ ही युआन और रूबल में बढ़ता व्यापार यह संकेत देता है कि दोनों देश डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
पुतिन-शी शिखर वार्ता के प्रमुख निष्कर्ष
सहयोग के नए समझौते
साझा रणनीतिक दृष्टिकोण
बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थन
पश्चिमी प्रभाव का संतुलन
क्या रूस और चीन सैन्य गठबंधन बना सकते हैं ?
- हाल के वर्षों में रूस और चीन के संबंध पहले की तुलना में अधिक निकट हुए हैं। दोनों देशों की साझा चिंता अमेरिका की बढ़ती वैश्विक भूमिका और उसके प्रभाव को लेकर है।
- इसके बावजूद, दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, वैचारिक और ऐतिहासिक स्तर पर गहरे अंतर मौजूद हैं। इसलिए उन्हें स्वाभाविक सैन्य सहयोगी नहीं माना जाता।
- किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन का अर्थ होता है कि दोनों देश बाहरी खतरे की स्थिति में एक-दूसरे की रक्षा करने के लिए बाध्य होंगे। फिलहाल रूस और चीन ऐसी कठोर प्रतिबद्धताओं से बचना चाहते हैं।
- चीन नहीं चाहता कि वह यूक्रेन मुद्दे पर रूस और पश्चिम के टकराव में सीधे शामिल हो। रूस भी ताइवान को लेकर चीन और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव में फंसने से बचना चाहता है।
- यद्यपि दोनों देशों के बीच रक्षा और रणनीतिक सहयोग आगे और बढ़ सकता है, लेकिन निकट भविष्य में औपचारिक सैन्य गठबंधन बनने की संभावना सीमित दिखाई देती है। हाल में अमेरिका और चीन के बीच बढ़े कूटनीतिक संवाद ने भी ऐसी संभावना को कुछ हद तक कम किया है।
भारत के लिए रणनीतिक चुनौतियाँ
रूस की चीन पर बढ़ती निर्भरता भारत के लिए नई रणनीतिक चुनौतियां पैदा कर सकती है।
- पिछले दो दशकों में भारत ने एक संतुलनकारी विदेश नीति अपनाई थी, जिसके तहत उसने अमेरिका के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ रूस के साथ भी मजबूत संबंध बनाए रखे।
- लेकिन अब यह संतुलन बनाए रखना कठिन होता जा रहा है, क्योंकि मॉस्को और वॉशिंगटन, दोनों ही बीजिंग के साथ अपने संबंधों को नए रूप में विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं।
- ऐसी स्थिति में भारत को अपनी सुरक्षा और विदेश नीति की प्राथमिकताओं का पुनर्मूल्यांकन करना पड़ सकता है। मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों में केवल अमेरिका पर रणनीतिक संतुलन के लिए निर्भर रहना भारत के लिए पर्याप्त या स्थायी विकल्प नहीं माना जा सकता।