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भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124ए

संदर्भ 

  • हाल ही में देश भर की अदालतों में पिछले चार साल से स्थगित पड़े राजद्रोह (Sedition) के मामलों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने एक बेहद महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण जारी किया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि यदि आरोपी को कोई आपत्ति नहीं है, तो अदालतें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124ए के तहत दर्ज राजद्रोह के मामलों की सुनवाई, मुकदमों और अपीलों को आगे बढ़ा सकती हैं।

क्या है पूरा मामला ? 

  • यह स्पष्टीकरण एक ऐसे याचिकाकर्ता की अर्जी पर सुनवाई के दौरान आया, जो राजद्रोह और अन्य संगीन आरोपों में पिछले 17 वर्षों से जेल में बंद है। 2017 में एक निचली अदालत ने उसे IPC की धारा 124ए (राजद्रोह), शत्रुता को बढ़ावा देने, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), 1967 और शस्त्र अधिनियम, 1959 के तहत दोषी ठहराया था। तब से वह भोपाल की केंद्रीय जेल में बंद है।
  • याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष इच्छा जताई थी कि यदि उसकी आपराधिक अपील पर धारा 124ए सहित पूरे मामले पर सुनवाई की जाती है, तो उसे इस पर कोई आपत्ति नहीं है। 

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी 

  • याचिकाकर्ता की दलील को स्वीकार करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि जहाँ भी आरोपी को धारा 124ए आईपीसी के तहत आरोपपत्र दायर किए गए मुकदमे, अपील या किसी अन्य कार्यवाही को जारी रखने पर कोई आपत्ति नहीं है, वहाँ न्यायालयों को ऐसे मामलों का गुण-दोष और कानून के अनुसार निर्णय लेने में कोई बाधा नहीं होगी।
  • इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता की अपील और उससे जुड़े मामलों पर तत्काल विचार करे और गुण-दोष के आधार पर फैसला सुनाए।

भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124ए 

  • भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 के अंतर्गत राजद्रोह को एक गंभीर अपराध माना गया है। मूल संहिता में यह प्रावधान शामिल नहीं था; इसे बाद में वर्ष 1870 में जेम्स स्टीफन द्वारा प्रस्तुत एक संशोधन के माध्यम से धारा 124ए (Section 124A) के रूप में जोड़ा गया। 

राजद्रोह की वैधानिक परिभाषा 

  • आईपीसी की धारा 124ए के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति निम्नलिखित कृत्यों में संलिप्त पाया जाता है, तो उसे राजद्रोह का दोषी माना जा सकता है:
  • घृणा या अवमानना : देश में कानून द्वारा स्थापित सरकार के विरुद्ध नफरत या तिरस्कार की भावना पैदा करना अथवा ऐसा करने का प्रयास करना।
  • असंतोष भड़काना : मौखिक या लिखित शब्दों, संकेतों, दृश्यात्मक प्रस्तुतियों (Visual Representations) या किसी अन्य माध्यम से सरकार के प्रति दुर्भावना या असंतोष (Disaffection) उत्पन्न करना या उसका प्रयास करना।

धारा 124ए के मुख्य घटक (Essential Elements) 

  • अभिव्यक्ति के माध्यम : राजद्रोही गतिविधियों को अंजाम देने के लिए विभिन्न माध्यमों का उपयोग किया जा सकता है, जैसे - बोले गए या लिखे गए शब्द, शारीरिक संकेत, तस्वीरें/वीडियो (दृश्य प्रस्तुति), या अन्य कोई समान तरीका।
  • दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य : इन माध्यमों का उपयोग इस प्रकार किया गया हो जिसका सीधा उद्देश्य सरकार के प्रति समाज में नफरत, असंतोष या अवमानना की भावना को भड़काना हो।
  • असंतोष का दायरा : इस धारा के तहत असंतोष शब्द में सरकार के प्रति निष्ठाहीनता (Disloyalty) और हर तरह की शत्रुतापूर्ण भावनाएं शामिल हैं।

चार साल से क्यों रुकी थी सुनवाई ?  

  • इससे पहले 11 मई, 2022 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने एक अंतरिम आदेश जारी किया था। उस आदेश में देश भर की अदालतों में लंबित राजद्रोह के मामलों की सुनवाई पर तब तक के लिए रोक लगा दी गई थी, जब तक कि केंद्र सरकार इस औपनिवेशिक काल के कानून पर पुनः जांच और पुनर्विचार की प्रक्रिया पूरी नहीं कर लेती।
  • उस समय अदालत ने केंद्र और राज्यों से यह अपेक्षा भी की थी कि इस कानून के तहत नई एफआईआर (FIR) दर्ज करने या दंडात्मक कार्रवाई करने से परहेज किया जाए, ताकि राज्य के सुरक्षा हितों और नागरिकों की नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बना रहे।  

भारतीय न्याय संहिता (BNS) और राजद्रोह पर बहस 

  • इस साल फरवरी में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मौखिक रूप से टिप्पणी की थी कि पुरानी आईपीसी के तहत राजद्रोह कानून की समीक्षा करने का कार्यपालिका का निर्णय, संसद को भारतीय न्याय संहिता (BNS) में इसी तरह का प्रावधान लाने से नहीं रोक सकता, क्योंकि विधायिका पूरी तरह स्वतंत्र है।
  • वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट बीएनएस (BNS) के खिलाफ दायर कई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। इनमें मुख्य रूप से धारा 152 को चुनौती दी गई है, जो देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों को अपराध घोषित करती है। 

याचिकाकर्ताओं का तर्क: 

  • याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बीएनएस की धारा 152 असल में पुराने राजद्रोह कानून का ही एक बदला हुआ रूप है।
  • याचिकाओं में कहा गया है कि भले ही कानून की भाषा बदल दी गई हो, लेकिन इसकी मूल सामग्री जैसे 'विध्वंसक गतिविधि', 'अलगाववादी भावनाओं को बढ़ावा देना' और 'भारत की अखंडता को खतरा' जैसी शब्दावली बेहद अस्पष्ट और व्यापक हैं, जो अभिव्यक्ति की आजादी को प्रभावित कर सकती हैं।

निष्कर्ष 

  • सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा फैसला कानूनी प्रक्रिया को सुचारू बनाने की दिशा में एक व्यावहारिक कदम है। यह उन कैदियों के लिए राहत की बात है जो वर्षों से बिना सुनवाई के जेलों में बंद हैं। हालांकि, दीर्घकालिक चुनौती अभी भी बनी हुई है कि एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में राज्य की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा करते हुए नागरिकों की असहमति और अभिव्यक्ति के अधिकार को कैसे सुरक्षित रखा जाए ?
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