संदर्भ
वर्ष 2026 में भारत में बांझपन (Infertility) एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में उभर रहा है। विशेषज्ञ अब इस बात पर जोर दे रहे हैं कि मानसिक स्वास्थ्य केवल बांझपन का परिणाम नहीं है बल्कि यह सभी लिंगों में प्रजनन विफलता का शारीरिक कारण (Physiological Driver) भी है।
भारत में बांझपन
परिभाषा
- भारत में बांझपन को उस स्थिति के रूप में देखा जाता है जब कोई दंपत्ति 12 महीने तक नियमित और असुरक्षित यौन संबंध के बावजूद गर्भधारण नहीं कर पाता है। परंपरागत रूप से इसे महिलाओं की समस्या माना जाता रहा है क्योंकि समाज में गहरे पितृसत्तात्मक मानदंड हैं।
- हालाँकि, हाल के आंकड़े दर्शाते हैं कि पुरुष और महिला कारकों का योगदान लगभग समान है। वर्ष 2026 तक ध्यान पुरुष बांझपन के मौन संकट और मानसिक तनाव के प्रजनन कोशिकाओं (गैमीट्स) पर जैविक प्रभाव की ओर केंद्रित हो गया है।
प्रमुख रुझान और आंकड़े
- राष्ट्रीय प्रसार: भारत में लगभग 15–20% दंपत्ति (करीब 3 करोड़) बांझपन से प्रभावित हैं जिनकी दर शहरी क्षेत्रों में अधिक है।
- कुल प्रजनन दर (TFR) में गिरावट: भारत की TFR घटकर 1.9 हो गई है जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से कम है। इसका कारण स्वैच्छिक विलंब और अनैच्छिक बांझपन दोनों हैं।
- पुरुष कारक में वृद्धि: अब 40–50% मामलों में पुरुष कारक जिम्मेदार हैं जो पर्यावरणीय विषाक्त पदार्थों और तनाव से शुक्राणु गुणवत्ता में गिरावट से जुड़ा है।
- शहरी–ग्रामीण अंतर: शहरी क्षेत्रों में प्राथमिक बांझपन (कभी गर्भधारण न होना) अधिक है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में द्वितीयक बांझपन अधिक है जो प्राय: अनुपचारित संक्रमणों के कारण होता है।
- IVF का विस्तार: भारतीय IVF बाजार 2024 में 90 करोड़ डॉलर का था जिसके 2029 तक 1.8 अरब डॉलर तक बढ़ने का अनुमान है जोकि चिकित्सा सहायता की बढ़ती मांग को दर्शाता है।
भारत में बांझपन के बढ़ने के कारण
- विलंबित मातृत्व और पितृत्व : करियर प्राथमिकताओं और आर्थिक स्थिरता की चाह में पहली बार माता-पिता बनने की औसत आयु जैविक रूप से अनुकूल आयु से आगे बढ़ रही है। उदाहरण: बेंगलुरु एवं मुंबई में 2025–26 के दौरान 35 वर्ष की आयु के बाद प्रजनन उपचार लेने वाली महिलाओं की संख्या में 25% वृद्धि दर्ज की गई।
- पर्यावरणीय प्रदूषण : हवा और पानी में मौजूद एंडोक्राइन-डिसरप्टिंग केमिकल्स (EDCs) हार्मोनल संतुलन को प्रभावित कर रहे हैं। उदाहरण: दिल्ली में अध्ययन के अनुसार खराब वायु गुणवत्ता वाले दिनों में स्वस्थ युवा पुरुषों की शुक्राणु गतिशीलता अस्थायी रूप से घट गई।
- जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ : मोटापा एवं पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) निष्क्रिय जीवनशैली और प्रसंस्कृत आहार के कारण व्यापक हो चुके हैं। उदाहरण: वर्ष 2026 में अनुमानित रूप से हर पाँच में से एक भारतीय महिला PCOS से पीड़ित है जो एनोव्यूलेटरी बांझपन का प्रमुख कारण है।
- दीर्घकालिक मानसिक तनाव : कार्यस्थल का दबाव कोर्टिसोल स्तर बढ़ाता है जो HPA अक्ष को बाधित कर ओव्यूलेशन एवं शुक्राणु निर्माण को प्रभावित करता है। उदाहरण: Frontiers in Endocrinology (2024) में प्रकाशित शोध में पाया गया कि भारतीय पुरुषों में अवसाद का संबंध शुक्राणु घनत्व में कमी से है।
- अनुपचारित प्रजनन संक्रमण : ग्रामीण क्षेत्रों में STI और पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज (PID) से जुड़ा कलंक फैलोपियन ट्यूब अवरोध का कारण बनता है। उदाहरण: बिहार जैसे राज्यों में कई ट्यूबल फैक्टर बांझपन के मामले अनुपचारित प्रसवोत्तर संक्रमण या तपेदिक से जुड़े पाए गए।
बांझपन से जुड़ी प्रमुख चुनौतियाँ
- सामाजिक कलंक और बहिष्कार : गर्भधारण न कर पाने वाली महिलाओं को अपमानजनक नामों से पुकारा जाता है और सामाजिक–धार्मिक आयोजनों से बाहर किया जाता है। उदाहरण: तमिलनाडु के कई ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी ‘मालदी’ शब्द महिलाओं को सामाजिक रूप से अलग करने के लिए इस्तेमाल होता है।
- उपचार की अत्यधिक लागत : IVF एवं ART प्रक्रियाएँ मध्यम और निम्न वर्ग के लिए भारी आर्थिक बोझ हैं। उदाहरण: वर्ष 2026 में एक IVF चक्र की औसत लागत ₹1.5–3 लाख है जबकि 90% से अधिक स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में बांझपन शामिल नहीं है।
- पुरुष बांझपन पर चुप्पी : पितृसत्तात्मक सोच पुरुषों को जांच से रोकती है जिससे महिलाओं को अनावश्यक व आक्रामक परीक्षणों से गुजरना पड़ता है। उदाहरण: 2025 की क्लिनिकल समीक्षा में पाया गया कि पुरुष औसतन महिलाओं की तुलना में 3–5 वर्ष बाद पहली बार प्रजनन जांच कराते हैं।
- मनोवैज्ञानिक दुष्चक्र : गर्भधारण में असफलता का तनाव स्वयं जैविक बाधा बन जाता है। उदाहरण: IVF मरीजों में आशा और निराशा के मासिक चक्र को सैलिवरी अल्फा-अमाइलेज के बढ़े स्तर से जोड़ा गया, जिससे इम्प्लांटेशन की संभावना घटती है।
- टियर-II/III शहरों में नियामकीय कमी : छोटे शहरों में तेजी से खुल रहे क्लिनिक मानकीकृत प्रोटोकॉल और पारदर्शी सफलता दर के बिना काम कर रहे हैं। उदाहरण: वर्ष 2025 के ART दिशानिर्देशों के तहत उत्तर भारत में कई अवैध क्लिनिक बंद किए गए।
सरकार द्वारा उठाए गए कदम
- ART एवं सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम: वर्ष 2025 के दिशानिर्देशों के तहत सभी क्लिनिकों का पंजीकरण अनिवार्य और दाताओं के शोषण पर रोक
- बजट 2026 का स्वास्थ्य फोकस: NIMHANS-2 और क्षेत्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों के उन्नयन का प्रस्ताव
- प्रोजेक्ट संजीवनी: पाँच राज्यों में प्रजनन स्वास्थ्य जागरूकता के लिए पायलट परियोजना
- राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्ट्री: ART परिणामों की निगरानी के लिए पारदर्शी व्यवस्था
आगे की राह
- स्वास्थ्य का एकीकरण: प्रत्येक IVF चक्र में अनिवार्य परामर्श
- बीमा कवरेज: IRDAI द्वारा बांझपन के लिए आंशिक बीमा अनिवार्य करना
- कार्यस्थल संवेदनशीलता: फर्टिलिटी लीव और एग फ्रीजिंग समर्थन
- पुरुष-केंद्रित अभियान: पुरुष बांझपन से जुड़े कलंक को समाप्त करना
- सामुदायिक जागरूकता: ASHA कार्यकर्ताओं के माध्यम से ग्रामीण शिक्षा
निष्कर्ष
वर्ष 2026 में बांझपन केवल जैविक समस्या नहीं, बल्कि गहरी सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है। लिंग-निरपेक्ष दृष्टिकोण अपनाकर और वैज्ञानिक प्रगति को संवेदनशील सामाजिक विमर्श से जोड़कर भारत प्रजनन देखभाल को मौन पीड़ा की यात्रा से गरिमा की प्रक्रिया में बदल सकता है। वास्तविक उपचार तभी संभव है जब मन एवं शरीर दोनों को समान प्राथमिकता दी जाए।