संदर्भ
देश की सर्वोच्च अदालत ने घरेलू कामगार महिलाओं के हक में एक युगांतकारी निर्णय सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि घर संभालने वाली महिलाओं (Homemakers) का श्रम अदृश्य जरूर है, लेकिन उसका मूल्य अमूल्य है। कोर्ट ने उन्हें राष्ट्र निर्माता का दर्जा देते हुए व्यवस्था दी है कि सड़क हादसों में होने वाली मौतों के मामलों में मुआवजे की गणना के दौरान उनके अवैतनिक घरेलू कार्यों का मूल्य न्यूनतम ₹30,000 प्रति माह आंका जाना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
- यह ऐतिहासिक निर्णय पंजाब की एक दुखद सड़क दुर्घटना से उपजे मामले में आया है। नवंबर 2001 में रेशमा नाम की एक महिला की सड़क हादसे में मृत्यु हो गई थी। उनके पति और तीन बच्चों ने मुआवजे के लिए मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) का दरवाजा खटखटाया।
- वर्ष 2003 में न्यायाधिकरण द्वारा दिए गए फैसले से असंतुष्ट होकर परिवार ने राशि बढ़ाने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया। हाई कोर्ट ने मुआवजे को बढ़ाकर ₹8.43 लाख (7.5% ब्याज के साथ) कर दिया था, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी व्यवस्था को एक नया और व्यापक आयाम दे दिया है।
राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान
- जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन.के. सिंह की खंडपीठ ने इस बात पर गहरा क्षोभ जताया कि महिलाओं के घरेलू श्रम को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
- पीठ ने कहा कि हमारा स्पष्ट मानना है कि एक गृहिणी न केवल किसी मनुष्य के विकास में, बल्कि पूरे राष्ट्र के विकास में योगदान देती है। उनका दायरा सिर्फ चारदीवारी तक सीमित नहीं है।
- अदालत ने समाज की रूढ़िवादी मानसिकता पर चोट करते हुए दैनिक बोलचाल में हाउसवाइफ की जगह सम्मानजनक शब्द होममेकर का उपयोग करने की आवश्यकता पर बल दिया। इसके साथ ही, कोर्ट ने घरेलू देखभाल का नुकसान (Loss of Domestic Care) को मुआवजे की गणना के लिए एक नया और अनिवार्य कानूनी आधार घोषित किया है।
फैसले की मुख्य बातें और शर्तें
न्यायालय ने भविष्य के लिए कुछ बेहद कड़े और स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं
- अनिवार्य अतिरिक्त मुआवजा: भविष्य में किसी भी होममेकर की दुर्घटना में मृत्यु होने पर, मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण को घरेलू देखभाल मद के तहत कम से कम ₹30,000 प्रति माह की दर से अलग मुआवजा तय करना होगा।
- समय-समय पर बढ़ोतरी: यह ₹30,000 की राशि आधार मूल्य (Base Value) होगी, जिसमें हर तीन साल में 10% की स्वतः वृद्धि की जाएगी।
- सवेतन नौकरी पर दोहरा लाभ: यदि मृत महिला घर संभालने के साथ-साथ कोई नौकरी या बिजनेस भी करती थी, तो यह राशि उसकी वास्तविक मासिक आय के अलावा (In Addition To) जोड़ी जाएगी।
- पारंपरिक छवि तक सीमित: कोर्ट ने साफ किया कि यद्यपि कई बार पुरुष भी होममेकर की भूमिका निभाते हैं और उनके प्रयास भी सराहनीय हैं, लेकिन वर्तमान कानूनी और सामाजिक परिदृश्य (विशेषकर मुआवजे के निर्धारण) को देखते हुए इस नियम का लाभ पारंपरिक तौर पर महिलाओं तक ही सीमित रखा गया है।
- समय सीमा: सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि मोटर दुर्घटना से जुड़े मुआवजे के दावों का निपटारा आमतौर पर एक वर्ष के भीतर सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
टाइम यूज़ सर्वे और कम महिला श्रम भागीदारी पर चिंता
अपने फैसले को सांख्यिकीय मजबूती देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2019 के टाइम यूज़ सर्वे का विशेष उल्लेख किया। आंकड़ों के अनुसार,
- 15 से 59 वर्ष की भारतीय महिलाएं प्रतिदिन औसतन 7 घंटे से अधिक का समय बिना किसी भुगतान के घरेलू और देखभाल के कार्यों में बिताती हैं, जबकि पुरुष इसके लिए 3 घंटे से भी कम समय देते हैं।
- महिलाएं कामकाजी होने के बावजूद पुरुषों की तुलना में 2.6 गुना अधिक अवैतनिक घरेलू श्रम करती हैं।
- अदालत ने रेखांकित किया कि देश में महिला श्रम बल की भागीदारी (Female Labour Force Participation) का महज 31.7% होना इस बात का प्रमाण है कि हमारा सामाजिक ढाँचा यह मानकर चलता है कि घर की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं की ही है।
- अनुमानों के मुताबिक, महिलाओं का यह अवैतनिक श्रम देश की जीडीपी (GDP) में 15% से 17% का योगदान देता है, लेकिन दुखद रूप से इसे कभी आर्थिक पहचान नहीं मिली। वस्तुतः सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इसी ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।