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लिविंग रूट ब्रिज

भारत ने मेघालय के प्रसिद्ध लिविंग रूट ब्रिज (Living Root Bridge) को विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने के उद्देश्य से यूनेस्को के समक्ष प्रस्ताव के रूप में प्रस्तुत किया है। 

लिविंग रूट ब्रिज के बारे में 

  • लिविंग रूट ब्रिज को स्थानीय भाषा में ‘जिंगकिएंग ज्री’ या ‘ल्यू चराई’ कहा जाता है। ये पुल मेघालय की खासी व जयंतिया पहाड़ियों के सघन एवं हरित दक्षिणी ढलानों में स्थित हैं। 
  • स्वदेशी समुदायों द्वारा विकसित ये संरचनाएँ जैव-इंजीनियरिंग की एक अनूठी एवं उत्कृष्ट मिसाल मानी जाती हैं।
  • इन पुलों को खासी और जयंतिया जनजातियों द्वारा 15 से 30 वर्षों की लंबी अवधि में प्राकृतिक रूप से विकसित (संरक्षित) किया जाता है। 
  • इनकी लंबाई लगभग 15 फीट से लेकर 250 फीट तक हो सकती है और उचित देखरेख के साथ ये कई सदियों तक उपयोगी बने रहते हैं। 

जीवित जड़ पुलों के निर्माण की प्रक्रिया 

  • इन पुलों का निर्माण फिकस इलास्टिका (भारतीय रबर अंजीर या रबर वृक्ष) की वायवी जड़ों (Aerial Roots) को विशेष वृक्षाकार तकनीकों से प्रशिक्षित करके किया जाता है। 
  • इस प्रक्रिया में वायवी जड़ों को किसी नदी या घाटी के ऊपर आपस में मोड़ा, बांधा एवं आपस में पिरोया जाता है जिससे धीरे-धीरे एक सुदृढ़ संरचना विकसित हो जाती है।
  • निर्माण की शुरुआती अवस्था में युवा और लचीली वायवी जड़ों को सुपारी (अरेका कैटेचू) के खोखले तनों के भीतर मार्गदर्शित किया जाता है। ये तने जड़ों को आवश्यक पोषण प्रदान करने के साथ-साथ मौसम के प्रतिकूल प्रभावों से सुरक्षा भी देते हैं और एक प्राकृतिक मार्गदर्शन प्रणाली के रूप में कार्य करते हैं। 
  • इसके अतिरिक्त पूरी संरचना को बांस से बने मचान का सहारा दिया जाता है जो नदी के ऊपर फैला होता है और इस दौरान स्थानीय लोगों के लिए अस्थायी रूप से नदी पार करने का साधन भी बनता है। 
  • समय के साथ जब वायवी जड़ें मजबूत और मोटी हो जाती हैं तब सुपारी के तनों की भूमिका समाप्त हो जाती है तथा पुल स्वयं सहारा देने योग्य बन जाता है। 
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