ईरान का परमाणु कार्यक्रम केवल एक तकनीकी विवाद नहीं है, बल्कि यह सुरक्षा चिंताओं, क्षेत्रीय वर्चस्व और महाशक्तियों की कूटनीति का एक जटिल केंद्र बिंदु है। सतह पर जो बहस परमाणु क्षमता को लेकर दिखती है, वह वास्तव में पश्चिम एशिया में प्रभाव (Influence), प्रतिरोध (Deterrence) और राजनीतिक वैधता की एक व्यापक जंग है।
इतिहास गवाह है कि इस मुद्दे पर अमेरिकी नीति एक चक्र की तरह घूमती रही है। वस्तुतः वार्ता से शुरू होकर, समझौते से वापसी, फिर अत्यधिक दबाव और अंततः पुनः कूटनीति की ओर वापसी। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि शत्रुतापूर्ण संबंधों को केवल सैन्य बल से नहीं सुलझाया जा सकता; अंततः समाधान राजनीतिक मेज पर ही निकलता है।
कूटनीति का उदय: JCPOA (2015)
2015 का Joint Comprehensive Plan of Action (JCPOA), ईरान और P5+1 देशों (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी) के बीच वर्षों की मेहनत का परिणाम था।
मुख्य उद्देश्य:पश्चिमी देशों को संदेह था कि ईरान परमाणु हथियार बना रहा है, जबकि तेहरान इसे केवल नागरिक ऊर्जा कार्यक्रम बताता था।
समझौते का आधार:यह समझौता 'भरोसे' पर नहीं, बल्कि 'सत्यापन' (Verification) पर टिका था, जिसमें कठोर निरीक्षण और यूरेनियम संवर्धन पर सीमाएं तय की गई थीं।
परिणाम:ईरान को आर्थिक प्रतिबंधों से राहत मिली और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने परमाणु हथियारों की दौड़ को थामने में सफलता पाई। यह व्यावहारिक कूटनीति का एक उत्कृष्ट उदाहरण था।
दबाव की नीति और सैन्य टकराव (2018-2025)
2018 में डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिका का इस समझौते से बाहर निकलना एक बड़ा मोड़ साबित हुआ। इसे "अधिकतम दबाव" (Maximum Pressure) की नीति कहा गया।
2025 तक आते-आते स्थितियां इतनी बिगड़ गईं कि ईरान की परमाणु और वायु-रक्षा प्रणालियों पर सैन्य हमले भी देखे गए, जिन्हें इज़राइल का समर्थन प्राप्त था।
इन हमलों ने बुनियादी ढांचे को तो नुकसान पहुँचाया, लेकिन ईरान के तकनीकी ज्ञान या उसके भू-राजनीतिक इरादों को खत्म नहीं कर सके। इससे यह सिद्ध हो गया कि संवाद का कोई विकल्प नहीं है।
प्रमुख हितधारकों का दृष्टिकोण
1. इज़राइल: अस्तित्व की रक्षा
इज़राइल के लिए ईरान का परमाणु संपन्न होना एक 'अस्तित्वगत खतरा' है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू की नीति स्पष्ट रही है: ईरान को परमाणु क्षमता की दहलीज तक पहुंचने से हर हाल में रोका जाए। इज़राइल केवल 'नियंत्रण' नहीं, बल्कि पूर्ण 'रोकथाम' (Prevention) पर जोर देता है।
2. खाड़ी देश: स्थिरता की प्राथमिकता
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश ईरान के साथ प्रतिस्पर्धा तो रखते हैं, लेकिन वे पूर्ण युद्ध के पक्ष में नहीं हैं। उनकी अर्थव्यवस्थाएं तेल निर्यात और वैश्विक व्यापार मार्गों पर टिकी हैं। कोई भी बड़ा संघर्ष वैश्विक ऊर्जा बाजार और क्षेत्रीय बुनियादी ढांचे को तबाह कर सकता है।
3. ईरान की आंतरिक राजनीति
ईरान के भीतर की आर्थिक स्थिति और विरोध प्रदर्शन वहां की विदेश नीति को प्रभावित करते हैं। अक्सर बाहरी सैन्य दबाव वहां के कट्टरपंथी गुटों को मजबूत कर देता है, जिससे सुधारवादी ताकतों के लिए समझौते की गुंजाइश कम हो जाती है।
भारत के रणनीतिक और आर्थिक सरोकार
भारत के लिए यह विवाद केवल दूर का मामला नहीं है, बल्कि सीधा प्रभाव डालने वाला मुद्दा है:
ऊर्जा सुरक्षा:ईरान ऐतिहासिक रूप से भारत का एक प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता रहा है।
कनेक्टिविटी (Chabahar Port):चाबहार बंदरगाह भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँचने का गेटवे है, जो पाकिस्तान को बाईपास करता है।
क्षेत्रीय संतुलन:ईरान की भूमिका अफगानिस्तान और मध्य एशिया की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है। प्रतिबंधों के कारण भारत का व्यापार और रणनीतिक निवेश बाधित होता है, इसलिए भारत हमेशा कूटनीतिक समाधान का पक्षधर रहा है।
निष्कर्ष
ईरान का परमाणु मुद्दा अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के एक शाश्वत सत्य को पुष्ट करता है। वस्तुतः टकराव चाहे कितना भी गहरा हो, समाधान अंततः वार्ता से ही निकलता है। JCPOA जैसे समझौते भले ही त्रुटिहीन न हों, लेकिन वे अनियंत्रित संघर्ष की तुलना में जोखिमों को बेहतर ढंग से प्रबंधित करते हैं। स्थायी सुरक्षा केवल निरंतर कूटनीति से ही संभव है, क्योंकि युद्ध और प्रतिशोध का विकल्प न केवल अनिश्चित है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत विनाशकारी भी है।