संदर्भ
लीनियर नो-थ्रेशोल्ड (LNT) मॉडल और ALARA सिद्धांत लंबे समय से अंतर्राष्ट्रीय विकिरण सुरक्षा व्यवस्था की बुनियाद रहे हैं। दशकों तक इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर नीतियाँ और मानक तय किए जाते रहे। किंतु 12 जनवरी को अमेरिकी ऊर्जा विभाग (DOE) ने अपने नियमों और दिशानिर्देशों से ALARA को हटाने की घोषणा की, जो स्थापित राष्ट्रीय और वैश्विक प्रथाओं से एक महत्वपूर्ण विचलन माना जा रहा है।
LNT मॉडल की अवधारणा
- LNT अर्थात “Linear No-Threshold” मॉडल एक जोखिम मूल्यांकन पद्धति है। इसके अनुसार आयनकारी विकिरण की कोई भी मात्रा, चाहे वह अत्यंत कम ही क्यों न हो, स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकती है, विशेषकर कैंसर का।
- इस मॉडल का मूल सिद्धांत यह है कि विकिरण का ऐसा कोई न्यूनतम स्तर नहीं है जिसे पूरी तरह सुरक्षित माना जा सके। साथ ही, जैसे-जैसे विकिरण की मात्रा बढ़ती है, वैसे-वैसे जोखिम भी सीधे अनुपात में बढ़ता है।
ALARA सिद्धांत क्या है ?
- ALARA का अर्थ है — “As Low As Reasonably Achievable”, यानी विकिरण के संपर्क को यथासंभव न्यूनतम रखना। यहाँ “reasonably” शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सुरक्षा उपायों को व्यवहारिकता, लागत और सामाजिक आवश्यकताओं के साथ संतुलित करता है।
- इस सिद्धांत का उद्देश्य केवल सीमा तय करना नहीं, बल्कि सुरक्षा मानकों में निरंतर सुधार करना है — बेहतर सुरक्षा कवच, स्पष्ट प्रशासनिक प्रक्रियाएँ और प्रभावी प्रशिक्षण इसके उदाहरण हैं।
- व्यावहारिक रूप से ALARA अनावश्यक विकिरण जोखिम को कम करने के लिए तकनीकी और प्रबंधकीय उपायों को प्रोत्साहित करता है तथा संस्थागत स्तर पर सुरक्षा संस्कृति विकसित करने पर बल देता है। हालांकि, कई बार इसके अत्यधिक या गलत प्रयोग से अनावश्यक जटिलताएँ भी उत्पन्न हुई हैं। यही कारण है कि इंटरनेशनल कमीशन ऑन रेडियोलॉजिकल प्रोटेक्शन (ICRP) सहित कई विशेषज्ञ मानते हैं कि आधुनिक परिस्थितियों में विकिरण सुरक्षा की समीक्षा आवश्यक हो सकती है।
अमेरिका का निर्णय और उसके निहितार्थ
- अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने एक ज्ञापन में, जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देशों के बाद जारी किया गया, कहा कि दशकों के परमाणु संचालन अनुभव से यह स्पष्ट हुआ है कि परमाणु नवाचार और उन्नत तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए वर्तमान विकिरण ढांचे में सुधार आवश्यक है।
- हालांकि इस निर्णय पर गंभीर प्रश्न भी उठाए गए हैं। आलोचकों का कहना है कि यह कदम राजनीतिक प्रेरणाओं से प्रभावित हो सकता है और गैर-समीक्षित आंतरिक रिपोर्टों पर आधारित है। उनके अनुसार, इससे कर्मचारियों की सुरक्षा, जनविश्वास और नियामक समन्वय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
- वर्तमान परिदृश्य में अमेरिका का रुख ICRP, संयुक्त राष्ट्र की परमाणु विकिरण प्रभाव वैज्ञानिक समिति (UNSCEAR) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जैसे अंतर्राष्ट्रीय निकायों से भिन्न दिखाई देता है। ये संस्थाएँ अब भी विकिरण सुरक्षा के लिए LNT मॉडल को आधार मानती हैं।
- अब तक ऐसा कोई व्यापक और उच्च गुणवत्ता वाला वैज्ञानिक साक्ष्य सामने नहीं आया है, जो LNT को किसी वैकल्पिक मॉडल से प्रतिस्थापित करने का ठोस आधार प्रदान करे। ‘हॉर्मेसिस’ सिद्धांत, जो कम मात्रा में विकिरण को संभावित रूप से हानिरहित या लाभकारी मानता है, सैद्धांतिक रूप से संभव अवश्य है, लेकिन विभिन्न आबादियों में इसके प्रभावों की असमानता, नैतिक सीमाएँ और पर्याप्त मानवीय प्रमाणों की कमी इसे नीति निर्माण के लिए अविश्वसनीय बनाती है।
आगे की दिशा
- फिलहाल ICRP ने विकिरण डोज़ सीमाओं में बदलाव के संकेत नहीं दिए हैं। संभव है कि भविष्य में ऐसे न्यूनतम स्तरों पर विचार हो, जिनके नीचे नियमन की आवश्यकता न समझी जाए। लेकिन इस पूरी बहस में सार्वजनिक धारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- यदि ALARA और LNT जैसे स्थापित सिद्धांतों को अचानक छोड़ा जाता है, तो आम जनता इसे सुरक्षा मानकों में कमी के रूप में देख सकती है, भले ही वैज्ञानिक समुदाय में कुछ लोग इसे तार्किक संशोधन मानें। विशेष रूप से परमाणु संयंत्रों के आसपास रहने वाले लोगों के लिए यह संदेश संवेदनशील हो सकता है।
- पारदर्शी संवाद, वैज्ञानिक सहमति और जनभागीदारी के बिना ऐसे नीति परिवर्तन अविश्वास को बढ़ा सकते हैं तथा मौजूदा और प्रस्तावित परमाणु परियोजनाओं के प्रति विरोध को प्रबल कर सकते हैं।
- हालिया शोध भी इस बहस को जटिल बनाते हैं। ‘मिलियन पर्सन स्टडी’ जैसे अध्ययनों में कम डोज़ विकिरण से संभावित कैंसर और अन्य प्रभावों के संकेत मिले हैं। 2023 में Nature Medicine में प्रकाशित लगभग दस लाख युवाओं पर आधारित अध्ययन में भी निम्न डोज़ पर रक्त संबंधी कैंसर का सीमित लेकिन उल्लेखनीय जोखिम सामने आया। ऐसे निष्कर्षों पर अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा गंभीरता से विचार किया जाना अपेक्षित है।
- भारत ने अब तक अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप विकिरण सुरक्षा उपायों का पालन किया है। भविष्य में भी उसे वैज्ञानिक सहमति और वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखनी चाहिए।