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आदर्श आचार संहिता (MCC)

संदर्भ 

  • भारत में निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए आदर्श आचार संहिता (MCC) को एक अचूक हथियार माना जाता है। लेकिन हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन ने एक नई कानूनी और नैतिक बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि क्या सरकारी मशीनरी और सार्वजनिक प्रसारकों का उपयोग चुनाव प्रचार के लिए करना आचार संहिता और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन है? 

आदर्श आचार संहिता: विकास और शक्ति का स्रोत 

  • आचार संहिता की जड़ें 1960 के केरल विधानसभा चुनावों में मिलती हैं। 1968 में चुनाव आयोग द्वारा इसे औपचारिक रूप दिया गया और 1979 में इसमें सत्ताधारी दल के आचरण से संबंधित महत्वपूर्ण भाग-7 जोड़ा गया। वर्ष 1991 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने इसे लागू करने में जो सख्ती दिखाई, उसने भारतीय चुनाव प्रक्रिया की तस्वीर बदल दी। 
  • वस्तुतः सर्वोच्च न्यायालय ने मोहिंदर सिंह गिल (1978) मामले में स्पष्ट किया था कि संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को उन क्षेत्रों में भी कार्रवाई का अधिकार देता है जहाँ संसद ने स्पष्ट कानून नहीं बनाया है।  

संबोधन और विवाद का केंद्र   

  • प्रधानमंत्री ने दूरदर्शन, संसद टीवी और ऑल इंडिया रेडियो के माध्यम से देश को संबोधित किया। इस संबोधन में उन्होंने सीधे तौर पर चार विपक्षी दलों का नाम लिया और तमिलनाडु व पश्चिम बंगाल की महिला मतदाताओं से अपील की कि वे 23 अप्रैल को होने वाले मतदान में इन दलों को करारा जवाब दें। 

विवाद के दो प्रमुख बिंदु हैं 

  • सरकारी तंत्र का उपयोग : क्या चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री कार्यालय और सार्वजनिक मीडिया (दूरदर्शन आदि) का उपयोग राजनीतिक विरोधियों पर निशाना साधने के लिए किया जा सकता है? 
  • पक्षपातपूर्ण कवरेज : एमसीसी का भाग VII स्पष्ट रूप से सत्ताधारी दल को चुनाव प्रचार के लिए सरकारी खजाने से चलने वाले जनसंचार माध्यमों के दुरुपयोग से रोकता है। 

कानूनी पेच: धारा 123(3) बनाम 123(7) 

  • धारा 123(3) - सांप्रदायिक अपील : लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की यह धारा धर्म, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर वोट मांगने को भ्रष्ट आचरण मानती है। हालांकि, प्रधानमंत्री के भाषण में लिंग (महिला मतदाता) और राजनीतिक दल को आधार बनाया गया, जो इस धारा की पांच श्रेणियों में सीधे तौर पर फिट नहीं बैठते। 
  • धारा 123(7) - सरकारी कर्मचारियों की सहायता : केरल के पूर्व सांसद टी.एन. प्रथापन द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका (2026) एक नया दृष्टिकोण पेश करती है। तर्क यह दिया गया है कि चुनाव के दौरान राजपत्रित अधिकारियों या सरकारी कर्मचारियों (जैसे दूरदर्शन और पीएमओ के कर्मचारी) की सहायता लेकर चुनावी संभावनाओं को बढ़ाना एक भ्रष्ट आचरण है। यहाँ मुख्य मुद्दा अपील का आधार नहीं, बल्कि प्रसारण में प्रयुक्त कार्यबल है। 

चुनाव आयोग की चुप्पी और भविष्य की चुनौतियां 

  • आदर्श आचार संहिता को कानून की तुलना में अधिक व्यापक और लचीला बनाया गया था ताकि वह उन परिस्थितियों में भी कार्रवाई कर सके जहाँ लिखित कानून सीमित हो जाता है। 
  • एमसीसी का भाग VII यह नहीं पूछता कि आपने क्या कहा, बल्कि यह पूछता है कि सत्ताधारी दल ने सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग कैसे किया। 
  • वर्तमान में, चुनाव आयोग ने इस मामले में प्राप्त शिकायतों पर मौन साध रखा है। यदि सर्वोच्च न्यायालय टी.एन. प्रथापन की याचिका को स्वीकार कर आयोग से जवाब मांगता है, तो यह भारतीय चुनावी विनियमन के इतिहास में आदर्श आचार संहिता के प्रवर्तन की सबसे कठिन परीक्षा होगी। 

निष्कर्ष 

  • चुनाव केवल मतों की गिनती नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का नाम है। यदि सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित मीडिया का उपयोग किसी एक दल के पक्ष में चुनावी माहौल बनाने के लिए किया जाता है, तो यह उस लेवल प्लेइंग फील्ड (समान अवसर) के सिद्धांत को चोट पहुँचाता है, जिसकी रक्षा की शपथ चुनाव आयोग ने ली है।
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