- भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या वर्ष 2025 तक 1 अरब से अधिक होने का अनुमान है, लेकिन राष्ट्रीय अनुप्रयुक्त आर्थिक अनुसंधान परिषद (NCAER) की हालिया रिपोर्ट “The Evolving Landscape of Digital Inclusion in India” बताती है कि देश में डिजिटल क्रांति के बावजूद डिजिटल समावेशन की राह अभी अधूरी है।
- रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने मोबाइल फोन की पहुंच को लगभग सार्वभौमिक बना दिया है, लेकिन शिक्षा, रोजगार, वित्तीय सेवाओं और सरकारी योजनाओं तक डिजिटल माध्यमों से समान पहुंच सुनिश्चित करने में अभी भी बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं।

मोबाइल पहुंच बढ़ी, लेकिन कंप्यूटर अब भी दुर्लभ
- रिपोर्ट के अनुसार देश के 95.1 प्रतिशत परिवारों के पास मोबाइल फोन है और 74.8 प्रतिशत परिवार स्मार्टफोन या इंटरनेट-सक्षम फोन का उपयोग करते हैं।
- इसके विपरीत केवल 8 प्रतिशत परिवारों के पास कंप्यूटर या लैपटॉप तथा मात्र 2.3 प्रतिशत परिवारों के पास टैबलेट उपलब्ध है।
- इससे अधिकांश भारतीयों का इंटरनेट अनुभव केवल मोबाइल तक सीमित रह जाता है, जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, ऑनलाइन कार्य और कौशल विकास जैसी गतिविधियों के लिए पर्याप्त नहीं माना जाता।
इंटरनेट पहुंच में ग्रामीण-शहरी और आर्थिक खाई बरकरार
- रिपोर्ट बताती है कि देश के 27.5 प्रतिशत परिवार अभी भी इंटरनेट से पूरी तरह वंचित हैं।
- ग्रामीण भारत में यह आंकड़ा 32.2 प्रतिशत है, जबकि शहरी क्षेत्रों में 17.2 प्रतिशत परिवार ऑफलाइन हैं।
- सबसे गरीब उपभोग वर्ग के 52.1 प्रतिशत परिवारों के पास इंटरनेट कनेक्टिविटी नहीं है, जो डिजिटल असमानता की गंभीरता को दर्शाता है।
मनोरंजन तक सीमित इंटरनेट उपयोग
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अध्ययन के अनुसार इंटरनेट का उपयोग मुख्य रूप से मनोरंजन और सोशल मीडिया के लिए किया जा रहा है। लगभग 66 प्रतिशत उपयोगकर्ता फिल्में, टीवी कार्यक्रम और समाचार देखने के लिए इंटरनेट का उपयोग करते हैं तथा 53.8 प्रतिशत सोशल मीडिया से जुड़े हुए हैं।
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इसके विपरीत केवल 16.1 प्रतिशत परिवार ऑनलाइन शिक्षा के लिए और मात्र 11.4 प्रतिशत परिवार सरकारी सेवाओं तक पहुंचने के लिए इंटरनेट का उपयोग करते हैं। यह स्थिति बताती है कि डिजिटल पहुंच का लाभ अभी उत्पादक क्षेत्रों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुंच पाया है।
‘हिडन डिजिटल डिवाइड’ की बड़ी चुनौती
- रिपोर्ट ने एक नई समस्या को “हिडन डिजिटल डिवाइड” यानी छिपी हुई डिजिटल खाई बताया है।
- लगभग 20.4 प्रतिशत परिवारों को डिजिटल सेवाओं का उपयोग करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति की सहायता लेनी पड़ती है।
- जिन परिवारों में औपचारिक शिक्षा का अभाव है, वहां यह निर्भरता और अधिक बढ़ जाती है। इससे स्पष्ट है कि केवल इंटरनेट कनेक्शन उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं, बल्कि डिजिटल साक्षरता और तकनीकी समझ भी आवश्यक है।
महिलाएं और बुजुर्ग सबसे अधिक प्रभावित
- डिजिटल समावेशन में लैंगिक असमानता अब भी गंभीर बनी हुई है। कार्यशील आयु वर्ग में 57.6 प्रतिशत पुरुष इंटरनेट का उपयोग करते हैं, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा केवल 35.6 प्रतिशत है।
- इसी प्रकार 60 वर्ष से अधिक आयु के केवल 9.4 प्रतिशत बुजुर्ग ही इंटरनेट का उपयोग करते हैं। यह दर्शाता है कि डिजिटल क्रांति का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंच पाया है।
भारत की अगली डिजिटल चुनौती
- रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि भारत की पहली डिजिटल चुनौती लोगों तक मोबाइल फोन पहुंचाना थी, जिसे काफी हद तक पूरा कर लिया गया है।
- अब दूसरी और अधिक महत्वपूर्ण चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि नागरिक डिजिटल तकनीकों का उपयोग शिक्षा, रोजगार, वित्तीय समावेशन, सरकारी सेवाओं और सामाजिक अवसरों तक पहुंच के लिए प्रभावी ढंग से कर सकें।
- यदि यह सुनिश्चित नहीं किया गया, तो डिजिटल परिवर्तन मौजूदा सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को कम करने के बजाय उन्हें और गहरा कर सकता है।
क्या हैं रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें ?
- रिपोर्ट में सस्ती ब्रॉडबैंड सेवाओं और सार्वजनिक वाई-फाई नेटवर्क के विस्तार, कंप्यूटर और साझा डिजिटल उपकरणों की उपलब्धता बढ़ाने, स्कूल स्तर पर डिजिटल साक्षरता को मजबूत करने, महिलाओं और ग्रामीण समुदायों के लिए विशेष डिजिटल समावेशन कार्यक्रम चलाने तथा बुजुर्गों के लिए सहायता आधारित डिजिटल सेवा केंद्र स्थापित करने की सिफारिश की गई है।
निष्कर्ष
- NCAER की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि भारत में डिजिटल क्रांति का अगला चरण केवल इंटरनेट पहुंच बढ़ाने का नहीं, बल्कि “सार्थक डिजिटल भागीदारी” सुनिश्चित करने का है।
- मोबाइल फोन तक पहुंच ने डिजिटल दरवाजे तो खोल दिए हैं, लेकिन वास्तविक डिजिटल सशक्तिकरण तभी संभव होगा जब प्रत्येक नागरिक डिजिटल संसाधनों का उपयोग शिक्षा, रोजगार, शासन और आर्थिक अवसरों के लिए समान रूप से कर सके।
एनसीएईआर (NCAER) राष्ट्रीय अनुप्रयुक्त आर्थिक अनुसंधान परिषद(National Council of Applied Economic Research)
- यह भारत का सबसे पुराना और सबसे बड़ा स्वतंत्र, गैर-लाभकारी आर्थिक नीति अनुसंधान संस्थान (Think Tank) है, जिसकी स्थापना 1956 में नई दिल्ली में हुई थी
- इसका मुख्य उद्देश्य केंद्र और राज्य सरकारों, नागरिक समाज और निजी क्षेत्र को आर्थिक नीतियों और फैसलों को लेने में मदद करना है
- यह भारत के सामाजिक और आर्थिक विकास से जुड़े डेटा का विश्लेषण कर सटीक रिपोर्ट तैयार करता है .
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