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दलबदल विरोधी कानून पर अध्यक्ष की शक्तियाँ

(प्रारंभिक परीक्षा : भारतीय राजतंत्र और शासन- संविधान राजनीतिक प्रणाली)
(मुख्य परीक्षा; सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2, संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य,-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय) 

    संदर्भ

  • दल-बदल विरोधी कानून के तहत अध्यक्ष की शक्तियों को सीमित करने के संबंध में हाल ही में आयोजित ‘अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन’ (AIPOC) किसी आम सहमति पर पहुँचे बिना ही समाप्त हो गया। सम्मेलन के दौरान पारित प्रस्तावों में प्रश्नकाल के दौरान व्यवधानों के विरुद्ध संकल्प तथा राष्ट्रपति व राज्यपाल के अभिभाषण शामिल थे।
  • दल-बदल विरोधी कानून की समीक्षा के लिये राजस्थान विधान सभा अध्यक्ष सी.पी. जोशी की अध्यक्षता में गठित समिति की रिपोर्ट को पीठासीन अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत किया गया था, किंतु इस पर कोई सहमति नहीं बन सकी। इस समिति का गठन वर्ष 2019 में संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल के आधार पर अयोग्यता के मामलों में अध्यक्ष की भूमिका की जाँच करने के लिये किया गया था।
  • लोकसभा अध्यक्ष ने एक प्रेस कॉन्फ्रेस में कहा है कि अयोग्यता के मामलों में पीठासीन अधिकारियों की शक्तियों को सीमित करने की आवश्यकता है। 

‘अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन’

  • शिमला में आयोजित 82वें ‘अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन’ (AIPOC) में प्रधानमंत्री ने ‘एक राष्ट्र, एक विधायी मंच’ का विचार प्रस्तुत किया। इसकी अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की गई थी।
  • ‘एक राष्ट्र, एक विधायी मंच’ का उद्देश्य एक ऐसा डिजिटल प्लेटफॉर्म या पोर्टल विकसित करना है, जो संसदीय व्यवस्था को मज़बूती प्रदान करने के साथ-साथ देश की सभी लोकतांत्रिक इकाइयों को जोड़ने का कार्य भी करे।
  • इस सम्मेलन में पीठासीन अधिकारियों के संविधान, सदन तथा लोगों के प्रति दायित्व जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई।
  • इसके अतिरिक्त, लोकसभा अध्यक्ष ने सम्मेलन के समापन भाषण में महत्त्वपूर्ण सुझाव भी दिये जो निम्नलिखित हैं-
    • विधायी निकायों की बैठकों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए इसके लिये एक निश्चित कार्य योजना बनाने का सुझाव दिया। इससे सदस्यों को अधिकतम समय और अवसर प्रदान किये जा सकेंगे और वे राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय प्रमुख मुद्दों पर व्यापक रूप से चर्चा कर सकेंगें।
    • स्थायी समितियों के कामकाज में बड़े बदलाव किये जाएँ, पीठासीन अधिकारियों द्वारा वर्ष में एक बार समितियों के कार्यों का मूल्यांकन किया जाए तथा लोगों के प्रति अधिक जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
    • शून्यकाल की परंपरा सभी राज्यों की विधानसभाओं में शुरू की जानी चाहिये ताकि सदस्यों को अपने निर्वाचन क्षेत्रों से संबंधित मामलों को उठाने का मौका मिल सके।
    • वर्ष 2022 तक सभी विधायिकाओं के लिये एक मंच बनाने का कार्य किया जाएगा।
    • विदित है कि ए.आई.पी.ओ.सी. का पहला सम्मेलन वर्ष 1921 में शिमला में ही आयोजित किया गया था। ए.आई.पी.ओ.सी. सम्मेलन का आयोजन शिमला में 7वीं बार किया जा रहा है। वर्ष 2021 में ए.आई.पी.ओ.सी. अपने सौ वर्ष पूरे कर रहा है।

दल-बदल विरोधी कानून

  • दल-बदल विरोधी कानून का उल्लेख संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत किया गया है, जो सांसदों व विधायकों को दल परिवर्तन के आधार पर अपने दल की सदस्यता छोड़ने के लिये दंडित करने का प्रावधान करता है। इसके तहत दल-बदल के आधार पर निर्णय लेने की शक्ति विधायिका के अध्यक्ष को प्रदान की गई है।
  • इसे 92वें संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1985 के माध्यम से जोड़ा गया था। यह विधि संसद तथा राज्य विधानमंडल दोनों पर लागू होती है।
  • यह कानून एक सांसद या विधायक द्वारा राजनीतिक दलों को बदलने के संबंध में तीन परिदृश्यों को शामिल करता है-
  • पहला, किसी राजनीतिक दल की टिकट पर निर्वाचित सदस्य जब ‘स्वेच्छा से अपनी सदस्यता छोड़ देता है’ या पार्टी की इच्छा के विरुद्ध सदन में मतदान करता है, तो ऐसा व्यक्ति अपनी सदस्यता खो देता है।
  • दूसरा, जब कोई विधायक, जिसने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अपनी सीट जीती है, चुनाव के पश्चात् किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है, तो वह विधायक, किसी दल में शामिल होने पर विधायिका में अपनी सदस्यता खो देता है।
  • नामांकित सदस्यों के मामले में नामांकन के पश्चात् उन्हें छह माह के भीतर किसी राजनीतिक दल में शामिल होना होता है। यदि वे छह माह के भीतर किसी पार्टी में शामिल नहीं होते हैं, तो वे सदन में अपनी सदस्यता खो देते हैं।
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