संदर्भ
भारत ‘विकसित भारत’ (2047) की अपनी यात्रा को समर्थन देने हेतु एक सुरक्षित, टिकाऊ और आत्मनिर्भर ऊर्जा भविष्य के निर्माण के लिए दृढ़ संकल्पित है। देश में स्वच्छ, विश्वसनीय और स्थिर बेसलोड बिजली की लगातार बढ़ती मांग को देखते हुए, भारत सरकार ने परमाणु ऊर्जा को अपनी दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति के केंद्र में रखा है। परमाणु ऊर्जा न केवल ग्रिड स्थिरता सुनिश्चित करती है और नवीकरणीय ऊर्जा के एक आदर्श पूरक के रूप में चौबीसों घंटे कम कार्बन वाली बिजली प्रदान करती है, बल्कि यह आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को कम कर भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं को भी बल देती है।
वर्तमान क्षमता और आगामी विस्तार योजनाएं
- वर्तमान स्थिति: भारत वर्तमान में 8.78 गीगावाट (GW) की कुल स्थापित क्षमता वाले 24 परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों का सफलतापूर्वक संचालन कर रहा है।
- निर्माणाधीन इकाइयां: वर्तमान में 7.5 गीगावाट की संयुक्त क्षमता वाली नौ रिएक्टर इकाइयां निर्माणाधीन हैं।
भविष्य की महत्वाकांक्षाएं:
- सरकार ने फ्लीट मोड में 10 स्वदेशी प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टरों (PHWRs) और दो 500 मेगावाट के फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों (FBRs) के लिए परियोजना-पूर्व गतिविधियों को मंजूरी दी है।
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बेसलोड बिजली
- स्थिर बेसलोड बिजली वह न्यूनतम, निर्बाध विद्युत मात्रा है जिसकी किसी पावर ग्रिड को चालू रहने के लिए आवश्यकता होती है।
- यह हमारी विद्युत आपूर्ति की रीढ़ के रूप में कार्य करती है, जो अस्पतालों, संचार नेटवर्क, रक्षा प्रतिष्ठानों, उद्योगों और अन्य आवश्यक सेवाओं के लिए विश्वसनीय बिजली सुनिश्चित करती है। विश्वसनीय बेसलोड बिजली आर्थिक विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा और आपदा से निपटने की क्षमता के लिए आवश्यक है।
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- परमाणु ऊर्जा मिशन (2025–26) और शांति (SHANTI) अधिनियम, 2025 जैसी हालिया नीतिगत पहलों से क्षमता विस्तार में तेजी आई है, घरेलू विनिर्माण मजबूत हुआ है, नवाचार को बढ़ावा मिला है और निजी क्षेत्र की भागीदारी सुनिश्चित हुई है।
- इन सभी पहलों का अंतिम लक्ष्य 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करना है।
परमाणु ऊर्जा की मूल कार्यप्रणाली: एक अवलोकन
परमाणु ऊर्जा संयंत्र 'परमाणु विखंडन' (Nuclear Fission) नामक एक नियंत्रित प्रक्रिया के माध्यम से ऊष्मा (गर्मी) उत्पन्न करते हैं।
- ऊष्मा उत्पादन: विखंडन से उत्पन्न ऊष्मा पानी को उच्च दबाव वाली भाप में बदलती है।
- बिजली का जनरेशन: यह भाप टरबाइन को चलाती है, जो जनरेटर से जुड़ी होती है, जिससे घरों, उद्योगों और आवश्यक सेवाओं के लिए बिजली का उत्पादन होता है।
- सुरक्षा: यह संपूर्ण प्रक्रिया कड़े इंजीनियर-डिज़ाइन किए गए सुरक्षा तंत्रों और मजबूत नियामक ढांचे के अंतर्गत संचालित होती है।
परमाणु ईंधन (Nuclear Fuel) और इसके प्रकार
- परमाणु ईंधन वह सामग्री है जिसे रिएक्टर के भीतर रखा जाता है जिसके विखंडन से भारी मात्रा में ऊष्मा निकलती है।
फिसाइल (Fissile) और फर्टाइल (Fertile) ईंधन:
- फिसाइल: जो सीधे श्रृंखला अभिक्रिया (Chain Reaction) को जारी रखते हैं।
- फर्टाइल: जिन्हें पहले रिएक्टर के भीतर विखंडनीय ईंधन में परिवर्तित किया जाता है।
- प्रमुख ईंधन के प्रकार: प्राकृतिक यूरेनियम, यूरेनियम-235 (U-235), लो-एनरिच्ड यूरेनियम (LEU), प्लूटोनियम-239 (Pu-239) और मिक्स्ड ऑक्साइड (MOX) ईंधन।
वैश्विक बनाम भारतीय दृष्टिकोण:
- अमेरिका, फ्रांस, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, कनाडा और रूस जैसे देश लाइट वाटर रिएक्टरों (LWRs) में लो-एनरिच्ड यूरेनियम (LEU) का उपयोग करते हैं।
- इसके विपरीत, भारत मुख्य रूप से प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टरों (PHWRs) में प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग करता है, जिसमें संवर्धन (Enrichment) की आवश्यकता नहीं होती। भारत अपने प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) में MOX ईंधन का भी उपयोग करता है।
यूरेनियम और थोरियम की स्थिति:
- भारत के यूरेनियम भंडार निम्न ग्रेड के हैं, इसलिए इसे आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। हालांकि, भारत के पास थोरियम (Th-232) का प्रचुर भंडार है, जो एक फर्टाइल रेडियोधर्मी पदार्थ है। यह मुख्य रूप से केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और झारखंड की तटीय रेत में पाया जाता है। रिएक्टर के अंदर Th-232 न्यूट्रॉन को अवशोषित कर विखंडनीय यूरेनियम-233 में बदल जाता है।
भारत का तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम (Three-Stage Nuclear Power Programme)
- भारत के स्वदेशी संसाधनों का अधिकतम उपयोग और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा प्राप्त करने के लिए डॉ. होमी जे. भाभा ने 1954 में इस दूरदर्शी कार्यक्रम का प्रस्ताव रखा था।
- ऐतिहासिक मील का पत्थर (अप्रैल 2026): कलपक्कम स्थित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने प्रथम क्रिटिकैलिटी (First Criticality) प्राप्त की। ब्रीडर रिएक्टर वह होता है जो बिजली उत्पादन के साथ-साथ अतिरिक्त विखंडनीय सामग्री/ईंधन का उत्पादन भी करता है। इस उपलब्धि ने भारत के तीन-चरणीय कार्यक्रम के दूसरे चरण की शुरुआत की है।
- इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) की भूमिका: आईजीसीएआर ने पीएफबीआर के डिजाइन, विकास, परीक्षण, सुरक्षा मूल्यांकन, कमीशनिंग और स्वदेशीकरण का नेतृत्व किया। भारतीय उद्योग के सहयोग से रिएक्टर के उपकरणों और प्रणालियों का लगभग 90 प्रतिशत घरेलू विनिर्माण हासिल किया गया, जो 'आत्मनिर्भर भारत' का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
तीन चरणों का विवरण:
प्रथम चरण:
- प्रौद्योगिकी: प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWRs)।
- कार्य: बिजली पैदा करने के लिए प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग। प्रयुक्त ईंधन (Spent Fuel) को रीप्रोसेस करके प्लूटोनियम प्राप्त किया जाता है, जो दूसरे चरण का इनपुट बनता है।

दूसरा चरण:
- प्रौद्योगिकी: फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBRs)।
- कार्य: पहले चरण से प्राप्त प्लूटोनियम का उपयोग कर बिजली उत्पन्न करना और साथ ही अतिरिक्त विखंडनीय सामग्री का उत्पादन करना। यह चरण थोरियम से यूरेनियम-233 का निर्माण भी करता है, जो तीसरे चरण की नींव है।
तीसरा चरण:
- प्रौद्योगिकी: थोरियम-आधारित रिएक्टर।
- कार्य: भारत के प्रचुर थोरियम भंडारों का दोहन करने के लिए यूरेनियम-233 का उपयोग करना। प्रत्येक चरण अगले चरण को ईंधन प्रदान करता है, जिससे सतत ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
परमाणु रिएक्शन और रिएक्टर तकनीक
- परमाणु रिएक्शन के प्रकार: परमाणु विखंडन (Fission) और संलयन (Fusion)। परमाणु ऊर्जा संयंत्र परमाणु विखंडन का उपयोग करते हैं जिसमें एक न्यूट्रॉन यूरेनियम या प्लूटोनियम के नाभिक से टकराकर उसे दो छोटे परमाणुओं में तोड़ता है, जिससे विशाल मात्रा में ऊष्मा और अतिरिक्त न्यूट्रॉन निकलते हैं (नियंत्रित चेन रिएक्शन)।
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परमाणु फ्यूजन
परमाणु फ्यूजन दो हल्के परमाणुओं को मिलाकर एक भारी परमाणु बनाता है। फ्यूजन ही सूर्य और तारों को ऊर्जा प्रदान करता है। यह विखंडन (फिशन) की तुलना में कहीं अधिक ऊर्जा उत्पन्न कर सकता है। हालांकि, व्यावसायिक बिजली उत्पादन के लिए फ्यूजन प्रौद्योगिकी अभी भी विकास के चरण में है।
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भारत में प्रयुक्त विभिन्न रिएक्टर:
- PHWRs (प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर): देश का मुख्य आधार, जो प्राकृतिक यूरेनियम पर चलते हैं।
- BWRs (बॉयलिंग वाटर रिएक्टर) और PWRs (प्रेशराइज्ड वाटर रिएक्टर): देश में अन्य संचालित रिएक्टर तकनीकें।
- FBRs (फास्ट ब्रीडर रिएक्टर): प्लूटोनियम के उपयोग और थोरियम-आधारित रिएक्टरों में बदलाव को समर्थन देने के लिए।
- SMRs (स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर): भारत द्वारा विकसित की जा रही अगली पीढ़ी की परमाणु तकनीक।
परमाणु अपशिष्ट प्रबंधन और क्लोज्ड न्यूक्लियर फ्यूल साइकिल
क्लोज्ड न्यूक्लियर फ्यूल साइकिल (Closed Nuclear Fuel Cycle):
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विट्रीफिकेशन प्रौद्योगिकी
भारत उच्च-स्तरीय रेडियोधर्मी कचरे के लिए विट्रीफिकेशन तकनीक वाले चुनिंदा देशों में शामिल है। यह प्रक्रिया उच्च-स्तरीय रेडियोधर्मी कचरे को एक स्थिर कांच के रूप में परिवर्तित करती है, जिससे यह दीर्घकालिक भंडारण, परिवहन और अंतिम निपटान के लिए अधिक सुरक्षित हो जाता है।
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- शेष उच्च-स्तरीय रेडियोधर्मी कचरे को इमोबिलाइज (Immobilize) कर सुरक्षित रूप से संग्रहीत किया जाता है, जिससे अपशिष्ट न्यूनतम होता है और देश के तीन-चरणीय कार्यक्रम को सुदृढ़ समर्थन मिलता है।
निष्कर्ष
भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम नवाचार, सुरक्षा, स्थिरता और आत्मनिर्भरता की त्रिवेणी है। कठोर सुरक्षा मानकों, स्वदेशी क्षमताओं (जैसे 90% स्वदेशी विनिर्माण वाला PFBR) और आधुनिक नीतियों के साथ, परमाणु ऊर्जा देश के आर्थिक विकास, पर्यावरणीय स्थिरता और 2047 तक ‘विकसित भारत’ के विजन को प्राप्त करने में अन्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की एक मजबूत और अनिवार्य कड़ी बनी हुई है।