संदर्भ
- मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के संघर्षों को दर्शाने वाली फिल्म सतलुज सेंसरशिप की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार जी5 (ZEE5) पर रिलीज तो हुई, लेकिन भारत में इसका सफर मात्र दो दिन ही चल सका। वस्तुतः सरकार द्वारा सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए इस पर भारत में पाबंदी लगा दी गई, हालांकि विदेशी दर्शकों के लिए यह अब भी उपलब्ध है।
- इस विषय की विस्तृत समीक्षा के लिए आईटी नियम, 2021 के अंतर्गत एक अंतर-विभागीय समिति का गठन किया गया है। इस पूरे मामले ने भारत में मनोरंजन सामग्री को नियंत्रित करने वाली दोहरी व्यवस्था को बहस के केंद्र में ला दिया है। यद्यपि भारत में सिनेमाघरों के लिए चलचित्र अधिनियम लागू होता है, वहीं ओटीटी प्लेटफॉर्म्स आईटी नियमों के तहत आते हैं।
फिल्म की पृष्ठभूमि: पाबंदी की मुख्य वजह
- कथावस्तु : यह फिल्म अमृतसर के प्रसिद्ध एक्टिविस्ट जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर केंद्रित है, जिन्होंने पंजाब में अशांति के दौर में पुलिस द्वारा हजारों लावारिस शवों के अवैध रूप से अंतिम संस्कार किए जाने का पर्दाफाश किया था। साल 1995 में उनका अपहरण कर मर्डर कर दिया गया था, जिसमें बाद में कई पुलिसकर्मियों को सजा सुनाई गई।
- नाम और सेंसरशिप का सफर : शुरुआत में इस सिनेमा का नाम घल्लूघारा रखा गया था। जब यह सेंसर बोर्ड (CBFC) के पास पहुंची, तो बोर्ड ने थियेटर्स में रिलीज के लिए इसमें 127 कट लगाने की शर्त रखी, जिसके बाद इसका नाम पंजाब 95 किया गया। मेकर्स इन कट्स के लिए राजी नहीं हुए, जिससे फिल्म बड़े पर्दे पर नहीं आ सकी। बाद में, मेकर्स ने बिना किसी कट के इसे सतलुज नाम से सीधे ओटीटी पर रिलीज कर दिया। हालांकि, 2023 में बॉम्बे हाई कोर्ट में बोर्ड के खिलाफ दायर अपनी याचिका को निर्माताओं ने बाद में वापस ले लिया था।
सिनेमाघरों के लिए केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की सेंसरशिप प्रणाली
सिनेमाघरों में दिखाई जाने वाली हर फिल्म चलचित्र अधिनियम, 1952 के कानूनी नियमों से बंधी होती है :
- सर्टिफिकेट की अनिवार्यता : अधिनियम की धारा 4 के अनुसार, देश में किसी भी फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधीन काम करने वाले वैधानिक निकाय (CBFC) से अनुमति लेना कानूनी रूप से अनिवार्य है। बिना सेंसर सर्टिफिकेट के थियेटर में फिल्म चलाना एक दंडनीय अपराध है।
- वर्गीकरण के प्रकार : बोर्ड फिल्मों को मुख्य रूप से चार श्रेणियों में बांटता है: U (सभी के लिए), UA (अभिभावकों की देखरेख में बच्चों के लिए), A (केवल वयस्कों के लिए), और S (विशेषज्ञों या खास वर्गों के लिए)।
- 2023 के नए बदलाव : हालिया संशोधनों के बाद, यूए श्रेणी को उम्र के हिसाब से और उप-श्रेणियों में वर्गीकृत कर दिया गया है। साथ ही, पहले जहां सर्टिफिकेट सिर्फ 10 साल के लिए वैध होता था, वहीं अब इसे हमेशा के लिए मान्य कर दिया गया है।
- पाबंदी लगाने के संवैधानिक आधार : संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत तय उचित प्रतिबंधों की तर्ज पर, यदि कोई फिल्म देश की एकता, अखंडता, संप्रभुता, सुरक्षा, विदेशी संबंधों, पब्लिक ऑर्डर या नैतिकता को नुकसान पहुंचाती है, या कोर्ट की अवमानना करती है, तो सीबीएफसी उस पर रोक लगा सकता है।
- अपीलीय ट्रिब्यूनल (FCAT) की समाप्ति : साल 2021 तक फिल्मों से जुड़े विवादों के त्वरित निपटारे के लिए फिल्म प्रमाणन अपीलीय अधिकरण (FCAT) हुआ करता था, जिसे अब भंग करके यह अधिकार सीधे हाई कोर्ट्स को दे दिया गया है। इससे कानूनी प्रक्रिया न सिर्फ महंगी और लंबी हो गई है, बल्कि सिनेमाई मामलों के विशेषज्ञ मंच की कमी भी खलने लगी है।
ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स की नियामक व्यवस्था
पारंपरिक रूप से स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स सरकारी सेंसरशिप से काफी हद तक मुक्त रहे हैं, क्योंकि पुराना चलचित्र कानून सिर्फ सार्वजनिक प्रदर्शन पर लागू होता है, न कि व्यक्तिगत या निजी स्क्रीन पर।
- अदालती रुख : वर्ष 2019 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने डिजिटल कंटेंट को चलचित्र कानून के दायरे में लाने की मांग को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि घर में बैठकर निजी तौर पर देखना और थियेटर में सामूहिक रूप से देखना दो अलग बातें हैं।
- आईटी नियम, 2021 का प्रभाव : वर्तमान में ओटीटी कंटेंट को नियंत्रित करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 का भाग III लागू है। इसके तहत एक आचार संहिता और त्रि-स्तरीय शिकायत निवारण तंत्र (सेल्फ-रेगुलेशन, प्रकाशकों की संस्था और मंत्रालय की निगरानी) बनाया गया है। हालांकि, मद्रास और बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा इस पर रोक लगाए जाने के कारण यह प्रावधान अभी कानूनी पचड़ों में फंसा है।
- 69A का इस्तेमाल : सतलुज को डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटाने के लिए सरकार ने आईटी अधिनियम की धारा 69A के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग किया है।
क्या है सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A ?
- यह कानूनी प्रावधान सरकार को देश की सुरक्षा के हित में किसी भी ऑनलाइन या डिजिटल सामग्री को ब्लॉक करने की शक्ति देता है, जिसका संचालन 2009 के नियमों के तहत होता है।
- इसके तहत सरकार के लिए कंटेंट ब्लॉक करने की ठोस वजहों को लिखित रूप में दर्ज करना अनिवार्य है, जिसकी पड़ताल एक विशेष रिव्यू कमेटी करती है।
- वर्तमान मामले में, सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने आईटी नियमों के नियम 14 के तहत एक उच्च-स्तरीय अंतर-विभागीय समिति को फिल्म की समीक्षा का जिम्मा सौंपा है।
- यह कमेटी सामग्री का आकलन करने के बाद चेतावनी देने, डिस्क्लेमर लगवाने, कंटेंट में बदलाव करने या धारा 69A के तहत उसे पूरी तरह से प्रतिबंधित रखने की सिफारिश कर सकती है।
निष्कर्ष
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सतलुज फिल्म का यह प्रकरण भारतीय फिल्म जगत के एक बड़े नीतिगत लूपहोल (Regulatory Gap) को सामने लाता है। फिल्म निर्माता सिनेमाघरों की सख्त सेंसरशिप से बचने के लिए ओटीटी का रास्ता तो चुन सकते हैं, लेकिन वहां भी उन्हें आईटी नियमों के एक अस्पष्ट और समानांतर सरकारी नियंत्रण का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति देश में एक ऐसे समेकित और संतुलित कानूनी ढांचे की जरूरत को रेखांकित करती है, जो रचनात्मक अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान करने के साथ-साथ देश की वास्तविक सुरक्षा चिंताओं के बीच एक सही सामंजस्य स्थापित कर सके।