चर्चा में क्यों ?
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने Commercial Banks – Resolution of Stressed Assets Directions, 2025 (Third Amendment Directions, 2026) के माध्यम से Specified Non-Financial Assets (SNFAs) के लिए एक व्यापक प्रूडेंशियल (सावधानीपूर्ण) ढांचा जारी किया है।
- यह नया ढांचा डिफॉल्ट करने वाले उधारकर्ताओं से प्राप्त अचल संपत्तियों के अधिग्रहण, मूल्यांकन, प्रबंधन, लेखांकन, प्रकटीकरण (Disclosure) तथा निपटान (Disposal) के लिए एक समान नियम निर्धारित करता है।
- इसका उद्देश्य तनावग्रस्त परिसंपत्तियों (Stressed Assets) की वसूली को अधिक पारदर्शी एवं प्रभावी बनाना, सुशासन (Governance) को मजबूत करना तथा यह सुनिश्चित करना है कि बैंक अचल संपत्तियों के प्रबंधन के बजाय अपने मूल बैंकिंग कार्यों पर केंद्रित रहें।

स्पेसिफाइड नॉन-फाइनेंशियल एसेट्स (SNFAs) क्या हैं ?(Specified Non-Financial Assets)
- Specified Non-Financial Assets (SNFAs) आरबीआई द्वारा शुरू की गई एक नई परिसंपत्ति श्रेणी है।
- इसमें वे अचल संपत्तियाँ (Immovable Properties) शामिल होती हैं जिन्हें बैंक गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) बन चुके ऋणों के पूर्ण या आंशिक निपटान के बदले प्राप्त करते हैं।
- ये परिसंपत्तियाँ बैंकों के सामान्य व्यवसाय का हिस्सा नहीं होतीं, बल्कि केवल ऋण वसूली के उद्देश्य से प्राप्त की जाती हैं।
- आरबीआई के अनुसार, कोई संपत्ति तभी SNFA मानी जाएगी जब उसका वैधानिक स्वामित्व (Legal Title) बैंक के नाम स्थानांतरित हो जाए।
SNFA के उदाहरण
SNFA में निम्नलिखित अचल संपत्तियाँ शामिल हो सकती हैं —
- आवासीय भवन (Residential Buildings)
- वाणिज्यिक भवन (Commercial Buildings)
- औद्योगिक भूमि (Industrial Land)
- गोदाम (Warehouses)
- कार्यालय परिसर (Office Spaces)
- कारखाना परिसर (Factory Premises)
- ऋण निपटान के बदले बैंकों को हस्तांतरित अन्य अचल संपत्तियाँ
नए फ्रेमवर्क की आवश्यकता क्यों पड़ी ?
SNFA ढांचा लागू होने से पहले, बैंक खराब ऋणों की वसूली के दौरान अचल संपत्तियाँ तो प्राप्त करते थे, लेकिन इनके मूल्यांकन, प्रबंधन, लेखांकन और बिक्री के लिए कोई एक समान नियामकीय व्यवस्था नहीं थी।
इसके कारण कई समस्याएँ उत्पन्न हुईं —
- विभिन्न बैंकों द्वारा अलग-अलग मूल्यांकन पद्धतियाँ अपनाना।
- संपत्तियों का आवश्यकता से अधिक मूल्यांकन (Overvaluation)।
- गैर-प्रमुख (Non-core) अचल संपत्तियों को लंबे समय तक अपने पास रखना।
- संपत्तियों की बिक्री में पारदर्शिता का अभाव।
- अलग-अलग लेखांकन पद्धतियाँ अपनाई जाना।
- कमजोर कॉरपोरेट गवर्नेंस।
- वित्तीय विवरणों की तुलना करना कठिन होना।
आरबीआई का मानना है कि बैंकों का मुख्य कार्य वित्तीय मध्यस्थ (Financial Intermediary) के रूप में कार्य करना है, न कि बड़े पैमाने पर रियल एस्टेट संपत्तियों का स्वामित्व रखना। इसलिए एक समान प्रूडेंशियल फ्रेमवर्क आवश्यक था।
SNFA फ्रेमवर्क के उद्देश्य
इस नए ढांचे का उद्देश्य है —
- डिफॉल्टरों से प्राप्त अचल संपत्तियों के प्रबंधन को मानकीकृत करना।
- मूल्यांकन एवं बिक्री प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाना।
- सावधानीपूर्ण लेखांकन (Prudent Accounting) सुनिश्चित करना।
- गवर्नेंस एवं नियामकीय निगरानी को मजबूत करना।
- तनावग्रस्त परिसंपत्तियों की शीघ्र वसूली को प्रोत्साहित करना।
- जब्त संपत्तियों के दुरुपयोग को रोकना।
- बैंकों को संपत्ति प्रबंधन के बजाय ऋण वितरण एवं वित्तीय मध्यस्थता पर केंद्रित रखना।
आरबीआई के SNFA फ्रेमवर्क की प्रमुख विशेषताएँ
1. अधिग्रहण (Acquisition) की पात्रता
बैंक केवल निम्नलिखित सभी शर्तें पूरी होने पर ही SNFA प्राप्त कर सकता है —
- उधारकर्ता का ऋण खाता पहले से NPA घोषित हो।
- संपत्ति का हस्तांतरण ऋण के पूर्ण या आंशिक निपटान के रूप में हो।
- बैंक को संपत्ति का वैधानिक स्वामित्व प्राप्त हो।
- कानूनी स्वामित्व हस्तांतरित होने के बाद ही संपत्ति SNFA मानी जाएगी।
यदि संपत्ति से केवल ऋण का कुछ हिस्सा ही चुकाया जाता है —
- शेष ऋण जारी रहेगा।
- शेष ऋण को पुनर्गठित ऋण (Restructured Loan) माना जाएगा।
- उस पर सभी प्रूडेंशियल मानदंड एवं प्रावधान (Provisioning) लागू रहेंगे।
2. रूढ़िवादी (Conservative) मूल्यांकन मानदंड
अधिक मूल्यांकन रोकने और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए आरबीआई ने स्पष्ट मूल्यांकन नियम निर्धारित किए हैं।
प्रत्येक SNFA को निम्नलिखित दोनों में से कम मूल्य पर दर्ज किया जाएगा -
- समाप्त (Extinguished) किए गए ऋण का नेट बुक वैल्यू (NBV) अथवा
- कम-से-कम दो स्वतंत्र बाहरी मूल्यांककों द्वारा निर्धारित डिस्ट्रेस सेल वैल्यू (DSV)
इससे -
- यथार्थवादी मूल्यांकन होगा।
- बैलेंस शीट में परिसंपत्तियों का कृत्रिम रूप से अधिक मूल्य नहीं दिखेगा।
- वित्तीय रिपोर्टिंग बेहतर होगी।
- निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा।
3. बोर्ड द्वारा अनुमोदित SNFA नीति
प्रत्येक वाणिज्यिक बैंक को SNFA के अधिग्रहण एवं निपटान के लिए बोर्ड द्वारा अनुमोदित नीति बनानी होगी।
इस नीति में शामिल होंगे —
- पात्रता मानदंड
- स्वीकृति की शक्तियों का प्रत्यायोजन
- अधिग्रहण से पहले वसूली के प्रयास
- SNFA में अधिकतम निवेश सीमा
- मूल्यांकन प्रक्रिया
- निपटान रणनीति
- बिक्री की समय-सीमा
- आंतरिक निगरानी व्यवस्था
आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि अचल संपत्ति का अधिग्रहण केवल असाधारण वसूली उपाय होना चाहिए, नियमित व्यवसाय नहीं।
4. अधिकतम होल्डिंग अवधि
- बैंकों को SNFA का यथाशीघ्र निपटान करना होगा।
- अधिकतम होल्डिंग अवधि अधिग्रहण की तिथि से 7 वर्ष होगी।
इसका उद्देश्य बैंकों के पास रियल एस्टेट परिसंपत्तियों का अनावश्यक संचय रोकना है।
5. सार्वजनिक नीलामी द्वारा बिक्री
- आरबीआई ने निर्देश दिया है कि SNFA का निपटान मुख्यतः सार्वजनिक नीलामी (Public Auction) के माध्यम से किया जाएगा।
- बैंकों को SARFAESI Act, 2002 के नीलामी सिद्धांतों का पालन करना होगा।
इससे सुनिश्चित होगा -
- पारदर्शिता
- उचित मूल्य निर्धारण
- प्रतिस्पर्धी बोली
- सभी खरीदारों को समान अवसर
- पक्षपात एवं हेरफेर की संभावना में कमी
6. डिफॉल्टर को पुनः बिक्री पर रोक
आरबीआई ने महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय के रूप में SNFA की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया है —
- मूल उधारकर्ता (Original Borrower) को
- Insolvency and Bankruptcy Code (IBC), 2016 के अनुसार संबंधित पक्षों (Related Parties) को
यह प्रतिबंध तब भी लागू रहेगा जब संपत्ति बाद में SNFA की श्रेणी से बाहर हो जाए।
इसका उद्देश्य -
- वसूली प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना।
- डिफॉल्टरों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से संपत्ति दोबारा प्राप्त करने से रोकना।
- परिसंपत्ति वसूली प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखना।
7. लेखांकन (Accounting Treatment)
- आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि SNFA को- सकल NPA (Gross NPA) ,शुद्ध NPA (Net NPA) ,तनावग्रस्त परिसंपत्ति (Stressed Asset) नहीं माना जाएगा।
- इसी प्रकार SNFA का प्रभाव Provisioning Coverage Ratio (PCR) पर भी नहीं पड़ेगा।
- इनका अलग से बैलेंस शीट में निम्न शीर्षक के अंतर्गत प्रकटीकरण किया जाएगा "Non-banking assets acquired in satisfaction of claims"
8. प्रकटीकरण (Disclosure) आवश्यकताएँ
- बैंकों को SNFA संबंधी वार्षिक जानकारी आरबीआई के Centralised Information Management System (CIMS) के माध्यम से प्रस्तुत करनी होगी।
- इसमें शामिल होंगे
- प्राप्त SNFA की संख्या
- बेचे गए SNFA की संख्या
- आयु-आधारित वर्गीकरण
- बैंक द्वारा स्वयं उपयोग हेतु रखी गई संपत्तियाँ
- आरबीआई द्वारा निर्धारित अन्य विवरण इससे नियामकीय निगरानी और बाजार पारदर्शिता दोनों मजबूत होंगी।
कार्यान्वयन (Implementation Timeline)
- यह नया ढांचा 1 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होगा।
- 30 सितंबर 2026 तक बैंकों के पास मौजूद सभी पुरानी SNFA परिसंपत्तियों को 30 सितंबर 2027 तक नए नियमों के अनुरूप लाना होगा।
- इस प्रकार बैंकों को एक वर्ष का संक्रमण काल (Transition Period) दिया गया है।
नए फ्रेमवर्क का महत्व
आरबीआई का SNFA ढांचा भारतीय बैंकिंग प्रणाली को निम्न प्रकार से मजबूत करेगा —
- डिफॉल्टरों से प्राप्त अचल संपत्तियों के प्रबंधन का मानकीकरण।
- मूल्यांकन एवं बिक्री प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता।
- गवर्नेंस मानकों में सुधार।
- परिसंपत्तियों के कृत्रिम मूल्यांकन पर रोक।
- वित्तीय रिपोर्टिंग की गुणवत्ता में सुधार।
- डिफॉल्टरों को जब्त संपत्ति दोबारा प्राप्त करने से रोकना।
- तनावग्रस्त परिसंपत्तियों की शीघ्र वसूली।
- गैर-प्रमुख रियल एस्टेट परिसंपत्तियों का संचय कम करना।
- बैंकों को ऋण वितरण एवं बैंकिंग गतिविधियों पर अधिक केंद्रित करना।
- SARFAESI Act, 2002, IBC, 2016 तथा आरबीआई के प्रूडेंशियल नियमों के साथ भारत की परिसंपत्ति समाधान प्रणाली को और मजबूत बनाना।
निष्कर्ष
- Specified Non-Financial Assets (SNFA) फ्रेमवर्क भारतीय बैंकिंग प्रणाली में प्रूडेंशियल विनियमन को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
- अचल संपत्तियों के अधिग्रहण, मूल्यांकन, लेखांकन तथा निपटान के लिए एक समान नियम बनाकर आरबीआई पारदर्शिता, वित्तीय अनुशासन और सुशासन को बढ़ावा देना चाहता है।
- यह ढांचा बैंकों को गैर-प्रमुख अचल संपत्तियों को लंबे समय तक रखने से हतोत्साहित करेगा तथा तनावग्रस्त ऋणों की शीघ्र वसूली को प्रोत्साहित करेगा।
- समग्र रूप से यह सुधार परिसंपत्ति समाधान प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाएगा, बैंकों की बैलेंस शीट की गुणवत्ता सुधारेगा तथा भारतीय बैंकिंग प्रणाली में निवेशकों और जनता का विश्वास मजबूत करेगा।