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सुरक्षित फुटपाथों पर चलने का अधिकार: सर्वोच्च न्यायालय ने इसे मौलिक अधिकार घोषित किया

  • हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय में कहा कि सुरक्षित एवं चिन्हित (demarcated) फुटपाथों पर चलने का अधिकार संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है। 
  • न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों से इस अधिकार को कानूनी मान्यता देने तथा फुटपाथों के निर्माण, रखरखाव और सुरक्षा के लिए एक व्यापक कानून बनाने पर विचार करने को कहा।

मामला क्या था ?

  • यह फैसला एक मोटर दुर्घटना मुआवजा मामले में दिया गया, जिसमें एक 5 वर्षीय बालक अपने पिता के साथ स्कूल जा रहा था। 
  • रास्ते में एक टैंकर ने उसे पीछे से टक्कर मार दी, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। दुर्घटना स्थल पर न तो फुटपाथ था और न ही पैदल पार पथ (Pedestrian Crossing)।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल पीड़ित परिवार के मुआवजे को बढ़ाकर 11.44 लाख रुपये किया, बल्कि पैदल यात्रियों की सुरक्षा को लेकर व्यापक संवैधानिक टिप्पणियाँ भी कीं।

न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ

  • अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत देश में स्वतंत्र रूप से आवागमन का अधिकार, पैदल चलने के अधिकार को भी शामिल करता है। 
  • सुरक्षित फुटपाथों तक पहुंच अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) से भी जुड़ी हुई है। 
  • पैदल चलने का अधिकार मोटर वाहनों के आवागमन से कम महत्वपूर्ण नहीं है; बल्कि यह प्राथमिक अधिकार है। 
  • सड़क होने पर स्थानीय निकायों, नगर निगमों, विकास प्राधिकरणों और पंचायतों का कर्तव्य है कि वे फुटपाथों का निर्माण, सीमांकन और रखरखाव सुनिश्चित करें। 
  • यदि किसी नागरिक के सुरक्षित पैदल चलने के अधिकार का उल्लंघन होता है, तो वह संवैधानिक और कानूनी उपचार तथा मुआवजे की मांग कर सकता है। 

मोटर वाहन अधिनियम पर टिप्पणी

  • न्यायालय ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 मुख्यतः वाहनों के संचालन पर केंद्रित है और पैदल यात्रियों के अधिकारों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं देता। कई मामलों में यह पैदल यात्रियों के हितों की उपेक्षा का कारण भी बना है।

कानून बनाने की आवश्यकता

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि वर्तमान में सुरक्षित फुटपाथों पर चलने के अधिकार के लिए कोई विशेष कानून नहीं है। इसलिए एक ऐसा वैधानिक ढांचा बनाया जाना चाहिए जो :

  • इस अधिकार को स्पष्ट रूप से मान्यता दे, 
  • जिम्मेदार संस्थाओं (Duty Bearers) को निर्धारित करे, 
  • उल्लंघन की स्थिति में त्वरित राहत और मुआवजे की व्यवस्था करे, 
  • तथा इसके क्रियान्वयन के लिए एक नियामक संस्था स्थापित करे। 

महत्व

  • यह निर्णय भारत में पैदल यात्रियों के अधिकारों, समावेशी शहरी विकास, सड़क सुरक्षा और मानव-केंद्रित परिवहन व्यवस्था को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। 
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सड़कें केवल मोटर वाहनों के लिए नहीं, बल्कि पैदल चलने वाले नागरिकों के लिए भी समान रूप से सुरक्षित और सुलभ होनी चाहिए।
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