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एसिड हमले के पीड़ितों की परिभाषा का दायरा बढ़ाया

चर्चा में क्यों ?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एसिड अटैक पीड़ितों के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि केवल चेहरे या शरीर पर तेजाब फेंके जाने वाले पीड़ित ही नहीं, बल्कि जिन लोगों को जबरन तेजाब पिलाया गया और जिनके शरीर के अंदरूनी अंग गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं, उन्हें भी दिव्यांगता कानून के तहत संरक्षण और सरकारी सहायता मिलेगी। यह फैसला एसिड अटैक सर्वाइवर शाहीन मलिक की याचिका पर दिया गया।

क्या था कानूनी विवाद ?

RPwD Act, 2016 की सीमित परिभाषा

  • Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 के तहत एसिड अटैक पीड़ितों को दिव्यांग व्यक्ति माना गया है।
  • लेकिन कानून की परिभाषा मुख्य रूप से उन लोगों पर केंद्रित थी जिनके शरीर या चेहरे पर तेजाब से “बाहरी विकृति” (disfigurement) हुई हो।
  • इस कारण ऐसे पीड़ित, जिन्हें तेजाब पिलाया गया और जिनके अंदरूनी अंग जल गए, कानून के दायरे से बाहर रह जाते थे।

तेजाब पीने से होने वाली गंभीर क्षति

  • तेजाब निगलने से शरीर के कई महत्वपूर्ण हिस्से गंभीर रूप से प्रभावित हो जाते हैं, जैसे : 
    • मुंह और गला
    • भोजन नली
    • पेट और पाचन तंत्र
  • इन चोटों का असर अक्सर स्थायी होता है। पीड़ितों को जीवनभर खाने, निगलने और पाचन से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

यह कानूनी बदलाव क्यों जरूरी था ?

  • पहले तेजाब पिलाकर हमला झेलने वाले पीड़ितों को दिव्यांगता प्रमाण पत्र नहीं मिल पाता था।
  • दिव्यांगता प्रमाण पत्र न होने के कारण वे कई सरकारी सुविधाओं और अधिकारों से वंचित रह जाते थे।
  • ऐसे पीड़ितों को आर्थिक सहायता, पुनर्वास योजनाओं और चिकित्सा सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पाता था।
  • उन्हें सरकारी मुआवजा और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक पहुंच में भी कठिनाई होती थी।
  • याचिका में कहा गया कि केवल हमले के तरीके के आधार पर पीड़ितों के साथ अलग व्यवहार करना अनुचित और भेदभावपूर्ण है।

संविधान से जुड़ा मुद्दा : अनुच्छेद 14 का उल्लंघन

  • याचिका में कहा गया कि यह व्यवस्था संविधान के Article 14 का उल्लंघन करती है।
  • क्योंकि समान पीड़ा और गंभीर नुकसान झेलने वाले एसिड अटैक पीड़ितों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया जा रहा था।
  • केवल हमले के तरीके - तेजाब फेंकने और तेजाब पिलाने के आधार पर कानूनी अधिकारों में भेद किया गया था।
  • याचिकाकर्ता के अनुसार, यह समानता के संवैधानिक सिद्धांत के खिलाफ था।

सभी एसिड हिंसा पीड़ित एक समान वर्ग

  • सुप्रीम कोर्ट ने माना कि तेजाब फेंकने और तेजाब पिलाने — दोनों प्रकार के हमलों में पीड़ितों को गंभीर शारीरिक और मानसिक पीड़ा होती है।
  • दोनों स्थितियों में पीड़ितों को लंबे समय तक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और सामाजिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
  • इसलिए सभी एसिड हिंसा पीड़ितों को एक समान वर्ग माना जाना चाहिए।
  • कोर्ट ने कहा कि सभी पीड़ितों को समान कानूनी संरक्षण और सरकारी सहायता मिलनी चाहिए।

Article 21 और गरिमा का अधिकार

  • कोर्ट ने कहा कि पुनर्वास, इलाज और मुआवजा न मिलना पीड़ितों के सम्मानपूर्वक जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन है।
  • यह अधिकार संविधान के Article 21 से जुड़ा हुआ है।
  • Article 21 प्रत्येक व्यक्ति को गरिमा और सुरक्षा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है।
  • इसलिए एसिड अटैक पीड़ितों को आवश्यक सहायता और संरक्षण उपलब्ध कराना राज्य की जिम्मेदारी है।

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौजूदा सजा व्यवस्था एसिड अटैक जैसी घटनाओं को रोकने में पूरी तरह प्रभावी साबित नहीं हो रही है।
  • कोर्ट ने सुझाव दिया कि अवैध रूप से एसिड बेचने वालों को भी मामले में सह-आरोपी बनाया जा सकता है।
  • अदालत ने यह भी कहा कि गंभीर मामलों में आरोपियों पर सबूत का भार (Burden of Proof) डालने जैसे कठोर कानूनी उपायों पर विचार किया जाना चाहिए।
  • कोर्ट के अनुसार, एसिड हमलों को रोकने के लिए सख्त कानून और प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला कानून लागू होने की तारीख से प्रभावी माना जाएगा।

बढ़ते एसिड अटैक और लंबित मामले

सुप्रीम कोर्ट ने एसिड अटैक मामलों में ट्रायल में देरी पर भी चिंता जताई। कोर्ट ने लंबी न्यायिक प्रक्रिया को “व्यवस्था का मजाक” बताया।

सबसे अधिक लंबित मामले वाले राज्य

राज्य

लंबित मामले

उत्तर प्रदेश

198

पश्चिम बंगाल

160

गुजरात

114

बिहार

68

कम लंबित मामले वाले क्षेत्र

क्षेत्र

लंबित मामले

उत्तराखंड

3

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख

5

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एसिड अटैक पीड़ितों के अधिकारों की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे उन पीड़ितों को भी कानूनी पहचान और सरकारी सहायता मिल सकेगी जो अब तक कानून की सीमित परिभाषा के कारण वंचित थे। यह निर्णय समानता, गरिमा और न्याय के संवैधानिक सिद्धांतों को मजबूत करता है।

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