संदर्भ
- हाल ही में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली संसाधन केंद्र (NHSRC) के तहत काम करने वाले राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा तकनीकी सचिवालय (NHATS) द्वारा राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा (NHA) 2022-23 अनुमान रिपोर्ट जारी की गई है। यह इस श्रृंखला की 10वीं रिपोर्ट है, जो स्वास्थ्य लेखा प्रणाली (SHA 2011) के वैश्विक ढाँचे पर आधारित है।
- यह रिपोर्ट पिछले एक दशक (2013-14 से 2022-23) में भारत के स्वास्थ्य सेवा पर सार्वजनिक निवेश, सरकारी प्राथमिकताओं और नागरिकों के वित्तीय बोझ में आए सकारात्मक बदलावों को सांख्यिकीय रूप से प्रमाणित करती है।
रिपोर्ट के प्रमुख सांख्यिकीय निष्कर्ष (Core Data Trends)
विगत एक दशक में भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र के वित्तीय ढाँचे में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए हैं:
सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और सरकारी व्यय में वृद्धि
- जीडीपी में हिस्सेदारी: देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में सरकारी स्वास्थ्य व्यय (GHE) का हिस्सा वर्ष 2013-14 के 1.15% से बढ़कर 2022-23 में 1.43% हो गया है। नई जीडीपी श्रृंखला (2022-23 को आधार वर्ष मानते हुए) के अनुसार यह 1.48% है।
- सामान्य सरकारी व्यय (GGE) में हिस्सेदारी: कुल सरकारी खर्च में स्वास्थ्य को दी जाने वाली प्राथमिकता बढ़ी है। यह हिस्सा 2013-14 के 3.78% से बढ़कर 2022-23 में 4.89% हो गया है।
- प्रति व्यक्ति सरकारी स्वास्थ्य व्यय: प्रति व्यक्ति के स्तर पर सरकारी खर्च में लगभग 2.7 गुना की भारी वृद्धि दर्ज की गई है। यह 2013-14 के ₹1,042 से बढ़कर 2022-23 में ₹2,786 हो गया है।
कुल स्वास्थ्य व्यय (THE) का बदलता स्वरूप
- सरकारी हिस्सेदारी में उछाल: कुल स्वास्थ्य व्यय (THE) में सरकारी स्वास्थ्य व्यय की हिस्सेदारी में लगभग 15 प्रतिशत अंकों की वृद्धि हुई है। यह 2013-14 के 28.6% से बढ़कर 2022-23 में 43.7% हो गई है।
- जेब से होने वाले खर्च में कमी: भारतीय परिवारों पर स्वास्थ्य के कारण पड़ने वाले अतिरिक्त वित्तीय बोझ में महत्वपूर्ण गिरावट आई है। कुल स्वास्थ्य व्यय में जेब से होने वाले व्यय (ओओपीई) का हिस्सा 2013-14 के 64.2% से घटकर 2022-23 में 43.4% (लगभग 21 प्रतिशत अंकों की कमी) पर आ गया है।
- विशेष नोट (महामारी के दौरान सरकारी हस्तक्षेप): कोविड-19 महामारी के दौरान आपातकालीन प्रतिक्रिया (ECRP-I और II) और विश्व के सबसे बड़े मुफ्त टीकाकरण कार्यक्रम के कारण सरकार ने 2021-22 में स्वास्थ्य व्यय को जीडीपी के 1.84% तक बढ़ा दिया था, जिसके परिणामस्वरूप उस दौरान ओओपीई घटकर 39.4% के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया था।
सामाजिक और निजी सुरक्षा नेट का विस्तार
- सामाजिक सुरक्षा व्यय (SSE): आयुष्मान भारत (AB PM-JAY) जैसी योजनाओं, सामाजिक स्वास्थ्य बीमा और चिकित्सा प्रतिपूर्ति के कारण कुल स्वास्थ्य व्यय में सामाजिक सुरक्षा की हिस्सेदारी 2013-14 के 6% से बढ़कर 9.9% हो गई है।
- निजी स्वास्थ्य बीमा: जागरूकता और क्रय शक्ति में वृद्धि के कारण निजी स्वास्थ्य बीमा की हिस्सेदारी भी 3.4% से बढ़कर 9.2% हो गई है।
नीतिगत विश्लेषण (Policy Analysis)
I. चिकित्सा इमरजेंसी और निर्धनता के दुष्चक्र पर रोक
- भारत में स्वास्थ्य पर होने वाला आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च (OOPE) परिवारों को गरीबी रेखा के नीचे धकेलने का एक प्रमुख कारण रहा है।
- यद्यपि फिलहाल आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च का 64.2% से घटकर 43.4% पर आना यह दर्शाता है कि जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता (जन औषधि केंद्र), मुफ्त स्वास्थ्य बीमा (PM-JAY) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (आयुष्मान आरोग्य मंदिर) के सुदृढ़ीकरण से आम नागरिकों को वित्तीय सुरक्षा मिली है।
II. सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की ओर बढ़ते कदम
- कुल स्वास्थ्य व्यय में सामाजिक सुरक्षा व्यय (SSE) का लगभग 10% तक पहुंचना यह दर्शाता है कि भारत एक कल्याणकारी राज्य के रूप में राइट टू हेल्थ (स्वास्थ्य के अधिकार) और सतत विकास लक्ष्य-3 (Good Health and Well-being) को प्राप्त करने की दिशा में सही नीतिगत मार्ग पर है।
III. महामारी के बाद संरचनात्मक सुधार
- कोविड-19 के दौरान बढ़ाए गए आपातकालीन बजटीय आवंटन ने न केवल तात्कालिक संकट से रक्षा की, बल्कि देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे (जैसे- ऑक्सीजन संयंत्र, जिला अस्पतालों में आईसीयू बेड और डायग्नोस्टिक नेटवर्क) को दीर्घकालिक मजबूती प्रदान की है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा (एनएचए) के बारे में
- एनएचए अनुमानों की तैयारी को वर्ष 2014 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली संसाधन केंद्र (NHSRC) में संस्थागत रूप दिया गया था।
- यह रिपोर्ट स्वास्थ्य लेखा प्रणाली 2011 (SHA 2011) के अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाती है, जिससे भारत के आंकड़ों की वैश्विक स्तर पर तुलना की जा सके।
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा के लिए विशेषज्ञ समूह में सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एमओएसपीआई) , नीति आयोग, जल शक्ति मंत्रालय, अनुसंधान संस्थानों - राष्ट्रीय सार्वजनिक वित्त और नीति संस्थान (एनआईपीएफपी), राष्ट्रीय अनुप्रयुक्त आर्थिक अनुसंधान परिषद (एनसीएईआर), और आर्थिक विकास संस्थान (आईईजी) और राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण के विशेषज्ञ शामिल हैं, जो इन आंकड़ों की सटीकता और निष्पक्षता सुनिश्चित करते हैं।
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चुनौतियाँ
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (NHP 2017) का लक्ष्य: राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 में सरकारी स्वास्थ्य व्यय को जीडीपी के 2.5% तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। वर्तमान का 1.43% (या नई श्रृंखला में 1.48%) इस लक्ष्य से अभी भी काफी पीछे है। बजटीय आवंटन को और तेज गति से बढ़ाने की आवश्यकता है।
- प्राथमिक बनाम तृतीयक स्वास्थ्य सेवा: सार्वजनिक व्यय का एक बड़ा हिस्सा प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा (Primary Healthcare) पर केंद्रित होना चाहिए ताकि बीमारियों को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सके और बड़े अस्पतालों पर बोझ कम हो।
- मानव संसाधन की कमी: बुनियादी ढांचे के साथ-साथ डॉक्टरों, नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ की ग्रामीण क्षेत्रों में कमी को दूर करना होगा।
निष्कर्ष
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा (NHA) 2022-23 के आंकड़े इस बात के स्पष्ट संकेतक हैं कि भारत की स्वास्थ्य प्रणाली अधिक किफायती, न्यायसंगत और सुलभ होने की दिशा में अग्रसर है। स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ते सरकारी निवेश ने नागरिकों को वित्तीय संकट से बचाया है।
- यद्यपि आगे का मार्ग इस गति को बनाए रखने और स्वास्थ्य अवसंरचना को डिजिटल सुशासन (Digital Health Mission) के साथ जोड़कर अंतिम छोर तक गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुनिश्चित करने में निहित है।